टीपाखोल तक दिखता धुआँ, धूल में ढँकती हरियाली : रायगढ़ में विकास की कीमत कौन चुका रहा है? (देखें वीडियो)

रायगढ़। टीपाखोल की ऊँचाई से जब नज़र जाती है तो जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड, पतरापाली की चिमनियों से उठता धुआँ साफ दिखाई देता है। यह केवल धुआँ नहीं, बल्कि रायगढ़ के भविष्य पर मंडराता एक सवाल है। सवाल यह कि विकास की जिस राह पर हम बढ़ रहे हैं, उसकी कीमत क्या सिर्फ आम नागरिक, किसान और पर्यावरण ही चुकाएंगे?
जिस क्षेत्र को कभी हरे-भरे पेड़-पौधों और खुली हवा के लिए जाना जाता था, वहाँ आज धूल की एक मोटी परत हर पत्ते पर जमी दिखती है। सड़क किनारे लगे पेड़ हों या खेतों की मेढ़ पर उगी हरियाली—सब पर राख और धूल की चादर सी बिछ गई है। स्थानीय लोग बताते हैं कि सुबह पौधों पर जो ओस गिरती थी, अब वह भी धूल में बदल जाती है।
रायगढ़ को विकास का प्रतीक बताने वाली इस औद्योगिक रफ्तार में सवाल यह भी उठता है कि क्या विकास का अर्थ केवल ऊँची चिमनियाँ, भारी उत्पादन और बढ़ता मुनाफा भर रह गया है? जब हवा साँस लेने लायक न रहे, जब हरियाली मुरझाने लगे और जब गाँव-कस्बों तक धुएँ की परछाईं पहुँच जाए, तब विकास की परिभाषा पर पुनर्विचार ज़रूरी हो जाता है।
टीपाखोल से दिखता धुआँ इस बात का संकेत है कि प्रदूषण केवल कारखाने की चारदीवारी तक सीमित नहीं है। इसका असर दूर-दराज़ के इलाकों तक फैल चुका है। खेतों में काम करने वाले किसान हों या सुबह-शाम टहलने निकलने वाले बुज़ुर्ग—सबकी शिकायत एक जैसी है: हवा भारी हो चली है, आँखों में जलन और साँस में दिक्कत आम बात हो गई है।
यह भी सच है कि जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड ने रायगढ़ को औद्योगिक पहचान दी है, रोज़गार दिए हैं और राजस्व में योगदान किया है। लेकिन सवाल योगदान का नहीं, संतुलन का है। क्या पर्यावरणीय मानकों की सख़्ती, नियमित निगरानी और पारदर्शिता के बिना यह विकास टिकाऊ कहा जा सकता है?
आज रायगढ़ के लोग यह पूछने को मजबूर हैं कि उन्हें और कितना “विकास” चाहिए—और किस कीमत पर? अगर विकास का रास्ता हरी धरती को धूसर बना दे, तो यह आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय होगा। ज़रूरत इस बात की है कि उद्योग, प्रशासन और समाज—तीनों मिलकर यह तय करें कि रायगढ़ की तरक्की केवल आँकड़ों में नहीं, बल्कि साफ हवा, सुरक्षित पर्यावरण और स्वस्थ जीवन में भी दिखाई दे।




