धान गया कहां…? बोरे कहां हैं…?

सूरजपुर में धान खरीदी का बड़ा खेल, 7–8 समितियों में हजारों क्विंटल गायब
करोड़ों की गड़बड़ी का अंदेशा, जांच रिपोर्ट दबाए बैठा प्रशासन
सूरजपुर। जिले में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी का सीजन अंतिम दौर में है, लेकिन इससे पहले ही एक सनसनीखेज गड़बड़ी सामने आ गई है। औचक भौतिक सत्यापन में 7–8 सहकारी समितियों में हजारों क्विंटल धान की भारी कमी पाई गई है। प्रारंभिक आकलन इस गड़बड़ी को करोड़ों रुपये के घोटाले की ओर इशारा कर रहा है, जिससे प्रशासनिक दावों की पोल खुलती नजर आ रही है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि धान आखिर गया कहां…?
यदि यह सिर्फ कागजी खरीदी है तो गिरदावरी से लेकर खरीदी तक की पूरी चेन में जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की जा रही? और यदि धान वास्तव में गायब है, तो उससे जुड़े वारदाने (बोरे) कहां हैं? इन अहम सवालों पर अब तक प्रशासन की चुप्पी कई संदेह खड़े कर रही है।
सूत्रों के मुताबिक, जांच का ठीकरा केवल सहकारी समितियों पर फोड़ने की तैयारी की जा रही है, जबकि नियमों के अनुसार जवाबदेही कहीं अधिक व्यापक है। गिरदावरी में राजस्व विभाग की भूमिका, खरीदी नीति के तहत त्रिस्तरीय अनुबंध, जिला प्रशासन द्वारा नियुक्त नोडल अधिकारियों की निगरानी और उठाव व्यवस्था की खामियां—हर कड़ी सवालों के घेरे में है।
हैरानी की बात यह है कि कुछ समितियों के भौतिक सत्यापन को 10 दिन से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन जांच रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई। इस चुप्पी से किसानों में भ्रम और अविश्वास की स्थिति बनती जा रही है।
उधर, 31 जनवरी की अंतिम तिथि नजदीक आते ही खरीदी केंद्रों पर हालात बेकाबू होते दिख रहे हैं। उठाव की धीमी रफ्तार के कारण कई केंद्रों पर जाम की स्थिति है। अनेक किसानों को अब तक टोकन तक नहीं मिल पाए हैं। प्रशासनिक निर्देशों के अनुसार 30–31 जनवरी के टोकनधारियों को 29 जनवरी को ही धान बेचने को कहा गया, जिससे अव्यवस्था और बढ़ गई है।
किसानों का कहना है कि वे पहले ही गिरदावरी, पटवारी जांच, एग्री-स्टेक पोर्टल और ऑनलाइन प्रक्रियाओं से गुजर चुके हैं। अब बार-बार सत्यापन कर उन्हें परेशान किया जा रहा है। आरोप है कि गलत करने वालों पर कार्रवाई के बजाय असली किसानों को ही रोका-टोका जा रहा है।
इसी बीच टोकन सत्यापन के दौरान अवैध वसूली के आरोप भी सामने आए हैं। किसान आक्रोशित हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से अब तक कोई ठोस और स्पष्ट जवाब नहीं आया है।
फिलहाल स्थिति यही है—
धान कहां गया…? बोरे कहां हैं…? और जिम्मेदार कौन…?
जब तक जांच रिपोर्ट सामने नहीं आती, तब तक सूरजपुर की धान खरीदी व्यवस्था सवालों के घेरे में ही बनी रहेगी।




