रायगढ़ में अडानी की मनमानी: जल, जंगल, जमीन पर संकट, पुलिस की चुप्पी और संबंधित विभाग की बंद आंखों को देख बढ़ा आक्रोश, ग्रामीण की सुनवाई भगवान भरोसे

रायगढ़@खबर सार :- छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में अडानी समूह की कोयला खनन परियोजनाओं के खिलाफ ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का गुस्सा चरम पर है। कंपनी पर फर्जी दस्तावेजों के जरिए जंगल काटने, आदिवासी जमीनों को हड़पने और विरोधियों को दबाने के गंभीर आरोप हैं। पत्रकारों को जान से मारने की धमकी और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का रास्ता रोकने की घटनाओं ने अडानी समूह की मनमानी को और उजागर किया है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि रायगढ़ पुलिस और प्रशासन की चुप्पी ने इन गंभीर अपराधों को नजरअंदाज करने का रास्ता खोल दिया है, जिससे लोकतंत्र और आदिवासी अधिकारों पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
पत्रकारों पर हमला, लोकतंत्र का गला घोंटने की साजिश?: 6 अगस्त 2025 को कलेक्ट्रेट परिसर में अडानी समूह के कथित गुर्गों ने पत्रकारों के साथ बदसलूकी की और उन्हें जान से मारने की धमकी दी। इस घटना की शिकायत चक्रधर नगर थाने में दर्ज की गई, और पत्रकारों ने पुलिस अधीक्षक से त्वरित जांच की मांग की। लेकिन 25 दिन बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। यह निष्क्रियता न केवल पत्रकारों की सुरक्षा पर सवाल उठाती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि पुलिस कॉर्पोरेट दबाव के आगे बेबस है। रायगढ़ प्रेस क्लब के सचिव राजेश साहू ने कहा, “पत्रकारों पर हमला लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला है। पुलिस की चुप्पी कॉर्पोरेट और सत्ता के गठजोड़ को उजागर करती है।”
ग्रामीणों के भेष में गुंडागर्दी: अडानी का दमनकारी चेहरा: मुड़ागांव में जंगल कटाई के विरोध में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को रोकने वाले लोग वही थे, जिन्होंने पत्रकारों को धमकाया। स्थानीय लोगों का दावा है कि अडानी समूह ने ग्रामीणों के भेष में गुर्गों को तैनात किया है, जो कंपनी के पक्ष में प्रदर्शन करते हैं और विरोध को कुचलने का काम करते हैं। तमनार क्षेत्र की 9 ग्राम पंचायतों के 14 गांवों में भय का माहौल है। ग्रामीणों का आरोप है कि उनकी जमीनें हड़पने के लिए फर्जी दस्तावेज बनाए जा रहे हैं, और विरोध करने वालों को मारपीट और मुकदमों का सामना करना पड़ रहा है।
फर्जी दस्तावेजों से जंगल का विनाश: हसदेव अरण्य क्षेत्र में अडानी समूह की परसा कोयला खदान के लिए बड़े पैमाने पर जंगल कटाई जारी है। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला ने बताया कि ग्राम सभाओं की सहमति के बिना फर्जी दस्तावेजों के आधार पर खनन किया जा रहा है। जुलाई 2024 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने संसद को सूचित किया कि परसा खदान में 94,460 पेड़ पहले ही काटे जा चुके हैं, और 2,73,000 और पेड़ काटे जाने की योजना है। यह आदिवासियों की आजीविका और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा है। ग्रामीणों का कहना है कि उनकी आवाज को जंगलों में ही दबा दिया जा रहा है।
पुलिस की भूमिका, संरक्षक या कॉर्पोरेट का सहयोगी?: जुलाई 2025 में मुड़ागांव में जंगल कटाई के दौरान पुलिस ने भारी बल तैनात कर क्षेत्र को छावनी में तब्दील कर दिया था। ग्रामीणों को जंगल में प्रवेश करने से रोका गया, और विरोध करने वालों को हिरासत में लिया गया। तमनार में भूपेश बघेल को रोकने के लिए पुलिस ने अडानी के गुर्गों का साथ दिया, जिससे प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल उठे हैं। हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति के नेता जयराम गोंड ने कहा, “पुलिस और प्रशासन अडानी के इशारे पर काम कर रहे हैं। जल, जंगल और जमीन को बचाने की हमारी लड़ाई को कुचला जा रहा है।”
जवाबदेही की मांग, सिस्टम पर सवाल: अडानी समूह की कथित मनमानी, फर्जी दस्तावेजों का उपयोग, पत्रकारों पर हमले और ग्रामीणों का दमन रायगढ़ में कॉर्पोरेट-सत्ता गठजोड़ का खुलासा करता है। पुलिस की निष्क्रियता और प्रशासन की चुप्पी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। पर्यावरण कार्यकर्ता और आदिवासी समुदाय स्वतंत्र जांच, दोषियों पर कठोर कार्रवाई और खनन गतिविधियों पर रोक की मांग कर रहे हैं। यह मामला न केवल रायगढ़, बल्कि पूरे देश में कॉर्पोरेट दबदबे और आदिवासी अधिकारों के हनन का प्रतीक बन गया है।
संपादकीय टिप्पणी: रायगढ़ में अडानी समूह की गतिविधियां और प्रशासन की निष्क्रियता आदिवासी समुदायों, पर्यावरण और लोकतंत्र पर गंभीर खतरा हैं। पत्रकारों पर हमला, ग्रामीणों का दमन और जंगलों का विनाश कॉर्पोरेट लालच का खुला प्रदर्शन है। राज्य और केंद्र सरकार को तत्काल हस्तक्षेप कर स्वतंत्र जांच शुरू करनी चाहिए, ताकि दोषियों को सजा मिले और हसदेव अरण्य को बचाया जा सके। यह समय है कि सत्ता कॉर्पोरेट के सामने नहीं, बल्कि जनता के हितों के लिए खड़ी हो।




