छत्तीसगढ़

संवेदनशीलता, साफगोई और ईमानदार इंसान होना ही बड़ा कवि होने की शर्त है : विनोद कुमार शुक्ल, नासिर अहमद सिकंदर और रज़ा हैदरी को श्रद्धांजलि

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रायपुर । वर्ष 2025 ने जाते-जाते छत्तीसगढ़ के साहित्य जगत की ऐसी तीन कद्दावर हस्तियों को छीन लिया,  जिनका स्थान हमेशा रिक्त रहेगा। 30 दिसम्बर को विनोद कुमार शुक्ल, नासिर अहमद सिकंदर और रज़ा हैदरी को राजधानी रायपुर के साहित्यकारों ने शिद्दत से याद किया। कार्यक्रम का आयोजन जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच और इप्टा ने मिल-जुलकर किया था।


श्रद्धांजलि सभा की शुरुआत जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय सचिव राजकुमार सोनी के वक्तव्य से हुई। उन्होंने तीनों साहित्यकारों के योगदान को रेखांकित किया और कहा कि ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल  अपनी रचनाओं से विगत 6 दशकों से देश के साहित्य की मुख्यधारा में छत्तीसगढ़ का लगातार प्रतिनिधित्व कर रहे थे, तो जनवादी तेवर की कविताएं रचने वाले नासिर की बदौलत छत्तीसगढ़ के दर्जनों कवियों को राष्ट्रीय स्तर पर चिन्हांकित किया जा सका। रजा हैदरी भी अपने जाने के बाद प्रदेश की मिट्टी में खाद बन कर अच्छे रचनाकारों को प्रोत्साहित करते रहेंगे।

प्रगतिशील लेखक संघ के जिला अध्यक्ष अरुणकांत शुक्ला ने विनोद कुमार शुक्ल को मनुष्यता के कवि और नासिर को जनवादी चेतना के कवि के रूप में याद किया। जनवादी लेखक संघ के प्रदेश अध्यक्ष परदेशी राम वर्मा ने नासिर अहमद के सांप्रदायिकता के खिलाफ़ मजबूती से खड़े होने को याद किया। उन्होंने कहा कि देश में सांप्रदायिक मनोभाव के विकास से वे काफी व्यथित थे।

लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और सांप्रदायिकता के खिलाफ लेखकों को एकजुट करने के काम में लगे रहे। साहित्य में प्रचलित ‘कला, कला के लिए’ सिद्धांत का विरोध करते हुए उन्होंने कला को जीवन की राजनीति से जोड़ने की पहलकदमी की। इस प्रकार, उनका पूरा साहित्य कलावाद की उलटबांसियों और सांप्रदायिकता के खिलाफ युद्ध का घोषणापत्र है, जो साहित्य को प्रगतिशील-जनवादी राजनीति और मानवीय सरोकारों के साथ जोड़ने का काम करता है। उनके देहावसान पूरे संगठन और साहित्यिक सरकारों के लिए अपूरणीय क्षति है।

वरिष्ठ शायर मीर अली मीर साहब ने तीनों साहित्यकारों को खुशबू की उपमा देते हुए कहा कि दिसंबर में एक सप्ताह के भीतर तीन-तीन विभूतियों का जाना देश के साहित्य जगत के लिए भी बड़ी क्षति है, जिससे उबरने में बहुत वक्त लगेगा। सुखनवर हुसैन सुखनवर ने रज़ा हैदरी  के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि अपनी नज़्मों और ग़ज़लों से हैदरी साहब ने छत्तीसगढ़ के उर्दू साहित्य में विशिष्ट पहचान बनाई थी। वे रायपुर में मरकज़-ए-अदम के संस्थापक थे, आजीवन अध्यक्ष थे और श्लोक पत्रिका के संपादक-प्रकाशक थे।

जलेसं के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ. नंदन ने 2003 से विनोद कुमार शुक्ल के साथ अपने संबंधों का जिक्र करते हुए जनवादी कवि-आलोचक नासिर अहमद सिकंदर से अपने नागार्जुन साहित्य पर शोध के दौरान बढ़ी निकटता को बताया। प्रलेसं के नंद कुमार कंसारी ने  विनोद कुमार शुक्ल से हर बार मिलने को अदभुत मुलाकात बताया, तो डॉ. आलोक वर्मा ने उनके  संपूर्ण साहित्य को पढ़ कर ही उनके बारे में कोई राय बनाने का आग्रह किया। विविध भारती के उद्घोषक रहे कमल शर्मा ने शुक्ल से जुड़े अपने अनुभवों का जिक्र किया।
स्थानीय दैनिक नवभारत की साहित्य संपादक आफताब बेगम ने भी विनोद कुमार शुक्ल तथा नासिर अहमद सिकंदर के रचनात्मक योगदान का जिक्र किया।

सभा का संयोजन तथा संचालन कर रहे जलेसं के राज्य सचिव पूर्णचंद्र रथ ने तीनों विभूतियों के निष्काम योगदान और उनके सृजन की ईमानदारी का जिक्र किया। नासिर की संक्षिप्त, लेकिन प्रभावी कविताओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि साक्षात्कारों पर केन्द्रित श्रृंखला ‘आमने सामने’ के संपादन के लिए भी वे काफी चर्चित हुए थे। हाल ही में कवि संतोष चतुर्वेदी के ब्लाग ‘पहली बार” में युवा कवियों की कविताओं पर उनकी नियमित टिप्पणी भी उल्लेखनीय है। उन्होंने साहित्यिक पत्रिका ‘समकालीन हस्ताक्षर’ के केदारनाथ अग्रवाल तथा चन्द्रकांत देवताले पर केन्द्रित दो अंकों का संपादन भी किया था। इन अंकों के कारण पूरे देश के साहित्य जगत का ध्यान उनके संपादकीय कौशल पर गया। वे न केवल उत्कृष्ट साहित्यकार थे, बल्कि कुशल संगठनकर्ता भी थे।

श्रद्धांजलि सभा को संस्कृति कर्मी निसार अली, मिनहाज असद, फ़ज़ले अब्बास सैफी, सनियारा ख़ान ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम में पत्रकार-कवि समीर दीवान, रूमा सेनगुप्ता, रेणु नंदी, सैयद सलमा, सुधा बाघ, आफताब बेगम, मो. शमीम, डॉ. बिप्लब वंद्योपाध्याय, अजीज साधीर, इंद्र राठौर, हरीश कोटक एवं अन्य कई रचनाकार-संस्कृति कर्मी शामिल थे।

सभी आयोजक संगठनों की ओर से जलेस के शायर  शिज्जू शकूर ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि अब तो दिसंबर के महीने से ही डर बढ़ जाता है। संवेदनशीलता, साफगोई और ईमानदार इंसान होना ही बड़ा कवि होने की शर्त है और विनोद कुमार शुक्ल, नासिर अहमद सिकंदर और रज़ा हैदरी ने इस शर्त को पूरा किया। इन तीनों साहित्यकारों के निधन से जो सांस्कृतिक शून्य पैदा हुआ है, उसे हम सब संस्कृति कर्मियों द्वारा इसी शर्त को पूरा किया जाने से भरा जा सकेगा।

पूर्णचंद्र रथ
सचिव, जनवादी लेखक संघ, छत्तीसगढ़
(मो) 91312-10063

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