रायगढ़

8 दिन बाद भी समाधान शून्य, अधिकारियों की गैरहाज़िरी से बढ़ा जनआक्रोश

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रायकेरा परियोजना: हड़ताल स्थल पर सन्नाटा, प्रशासन–एनटीपीसी की चुप्पी पर सवाल

रायगढ़। एनटीपीसी रायकेरा कोयला खनन परियोजना के खिलाफ प्रभावित गांवों का आंदोलन सातवें दिन भी बिना किसी समाधान के जारी है। सोमवार को पूरे दिन इंतज़ार के बावजूद कोई भी जिम्मेदार अधिकारी नहीं पहुंचा। इससे आंदोलनरत ग्रामीणों में गहरा असंतोष और आक्रोश साफ दिखाई दिया।

तिलाईपाली, कुधुरमौहा, रामपुर सहित आठ गांवों के किसान, महिलाएं और युवा बीते एक सप्ताह से शांतिपूर्ण हड़ताल पर बैठे हैं। सोमवार को हड़ताल स्थल पर नारेबाज़ी या भाषण नहीं हुए, लेकिन पसरी यह खामोशी ग्रामीणों के अनुसार मजबूरी नहीं, बल्कि संयम की अंतिम सीमा है। आंदोलनकारियों का कहना है कि लगातार टालमटोल और गैरहाज़िरी ने भरोसे को पूरी तरह तोड़ दिया है।

ग्रामीणों ने दो टूक कहा है कि अब केवल मौके का निरीक्षण, मौखिक आश्वासन या “देखेंगे” जैसे जवाब स्वीकार्य नहीं हैं। उनकी मांग है कि अधिनियम 2013, पेसा कानून और ग्राम सभा की अनिवार्य प्रक्रिया पर स्पष्ट, लिखित और कानूनी निर्णय सामने आए। इसके अभाव में आंदोलन को और कठोर रूप दिया जाएगा।

आंदोलनकारियों का आरोप है कि प्रशासन और एनटीपीसी दोनों ही गंभीर मुद्दों से बचते नज़र आ रहे हैं। अधिकारियों के आने की सूचना देना और फिर न आना, न सिर्फ़ प्रशासनिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़े करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि प्रभावित ग्रामीणों की समस्याओं को प्राथमिकता नहीं दी जा रही।

हड़ताल स्थल पर मौजूद एक वरिष्ठ ग्रामीण ने तीखे शब्दों में कहा—
“हम शांत हैं, लेकिन कमजोर नहीं। सात दिन का संयम बता रहा है कि हम संवाद चाहते हैं, टालना नहीं। अब निर्णय होगा, तभी आगे बात होगी।”

रायकेरा परियोजना से जुड़े हालात इस समय बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। आंदोलन अब मुआवजे या रोजगार तक सीमित न रहकर कानून के पालन, पारदर्शिता और सार्वजनिक उपक्रमों की जवाबदेही का बड़ा सवाल बन चुका है। आठवें दिन भी ज़मीन पर वही तस्वीर है—
न कोई निर्णय, न कोई जवाब… सिर्फ़ सन्नाटा और बढ़ता जनआक्रोश।

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