छत्तीसगढ़

जहरीला पानी कांड से लेकर केरल के वित्तीय संकट तक

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संजय पराते की राजनीतिक टिप्पणियों पर आधारित विश्लेषण

इंदौर: ‘स्वच्छ शहर’ के दावे पर जहरीले पानी का सवाल

मध्यप्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में जहरीले पानी से हुई मौतों ने प्रशासन और सरकार के दावों की पोल खोल दी है। देश के सबसे स्वच्छ शहर के रूप में प्रचारित इंदौर में दूषित पेयजल से 20 से अधिक लोगों की मौत और सैकड़ों के बीमार होने की खबरों ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है। हजारों लोग अब भी घरों में इलाज कराने को मजबूर हैं।

इस गंभीर घटना के बावजूद राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में केवल चार मौतों को ही स्वीकार किया है और मात्र 35 मरीजों के इलाज का खर्च उठाने की घोषणा की है। मुख्यमंत्री मोहन यादव और नगरीय प्रशासन मंत्री की ओर से अब तक किसी प्रकार की नैतिक जिम्मेदारी नहीं ली गई है। दिखावटी कार्रवाई के तहत नगर निगम आयुक्त को हटाया गया, जबकि सवाल यह है कि इतने बड़े हादसे की वास्तविक जवाबदेही किसकी है।

घटना के बाद प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। इंदौर कलेक्टर शिवम वर्मा, जो पहले नगर निगम आयुक्त रह चुके हैं, पर भी कार्रवाई न होने से सरकार की मंशा पर संदेह गहराता जा रहा है। पीड़ितों के बीच जाने के बजाय संघ कार्यालय में अधिकारियों की मौजूदगी को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।

स्लॉटर हाउस विवाद: ध्यान भटकाने की कोशिश?

इसी बीच इंदौर के जिंसी क्षेत्र स्थित स्लॉटर हाउस से जुड़ा कथित गौकशी विवाद सामने आया, जिसे कई लोग जहरीले पानी कांड से जनता का ध्यान हटाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं। यह स्लॉटर हाउस पीपीपी मॉडल पर वैध रूप से संचालित बताया जाता है और इसके आधुनिकीकरण पर हाल ही में करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि नियमों का पालन हो रहा था, तो गौवंशी पशुओं के वध की संभावना बेहद संदिग्ध है। प्रशासन द्वारा स्पष्ट जानकारी न देना संदेह को और गहरा कर रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस विवाद के जरिए साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

दूषित पानी की समस्या राष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय

इंदौर ही नहीं, भोपाल और रायपुर जैसे शहरों में भी दूषित पानी की आपूर्ति की शिकायतें सामने आ चुकी हैं। जांच में इंदौर के 60 में से 59 जल नमूने मानकों पर खरे नहीं उतरे। इससे पहले सीएजी की रिपोर्ट में भी भोपाल में लाखों लोगों के दूषित पानी से प्रभावित होने की बात कही गई थी।

विशेषज्ञों का मानना है कि स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी सुविधा उपलब्ध न करा पाने वाली सरकारों की जवाबदेही तय होना जरूरी है।

केरल के साथ वित्तीय भेदभाव का आरोप

दूसरी ओर, देश के उच्च मानव विकास सूचकांक वाले राज्य केरल को लेकर भी केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। केरल सरकार का कहना है कि पिछले पांच वर्षों में केंद्र की नीतियों के कारण राज्य को करीब 57 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।

राज्य के अनुसार, कर हस्तांतरण, अनुदान और योजनागत निधियों में लगातार कटौती की गई है। 10वें वित्त आयोग में जहां केरल का हिस्सा 3.875 प्रतिशत था, वहीं 15वें वित्त आयोग में यह घटकर 1.925 प्रतिशत रह गया है। सिर्फ वर्ष 2024-25 में ही इससे राज्य को 27 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

सड़कों पर उतरी जनता, सत्याग्रह का रास्ता

12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद जयंती के अवसर पर केरल में केंद्र सरकार की नीतियों के विरोध में बड़े पैमाने पर सत्याग्रह किया गया। मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक, सांसद और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ लाखों लोग सड़कों पर उतरे और राज्य के अधिकारों की मांग की।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि केरल की शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास की उपलब्धियां देश के लिए उदाहरण हैं, लेकिन राजनीतिक कारणों से राज्य को आर्थिक दबाव में लाने की कोशिश की जा रही है।

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