जांच हुई, गड़बड़ी साबित फिर कार्रवाई पर सन्नाटा क्यों?

जिले में तीन धान खरीदी केंद्रों से हजारों बोरी गायब, लेकिन प्रबंधक अब भी पद पर
सूरजपुर कौशलेन्द्र यादव । जिले की धान खरीदी व्यवस्था एक बार फिर कटघरे में खड़ी है। शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र में सामने आए बड़े घोटाले की जांच पूरी हो चुकी है और प्रशासन स्वयं 13 हजार बोरी धान की कमी स्वीकार कर चुका है, लेकिन इसके बावजूद अब तक न तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की गई है और न ही आगे की कार्रवाई को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी दी गई है। जांच के बाद भी प्रशासनिक चुप्पी ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जांच पूरी होने के बाद दिनभर पत्रकार और आमजन जनसंपर्क विभाग व संबंधित अधिकारियों से जानकारी लेने की कोशिश करते रहे, लेकिन हर जगह से एक ही जवाब मिला— “जानकारी मंगाई गई है, अभी प्राप्त नहीं हुई है।” सवाल यह है कि जब जांच पूरी हो चुकी है और गड़बड़ी स्वीकार की जा चुकी है, तो फिर कार्रवाई की जानकारी देने से परहेज क्यों?
13 हजार या 25 हजार बोरी? आंकड़ों पर संदेह
सूत्रों का दावा है कि जांच के दौरान चट्टों की जटिल व्यवस्था के कारण जांच दल वास्तविक स्थिति का सही आकलन नहीं कर सका। इसी वजह से आधिकारिक आंकड़ा 13 हजार बोरी पर आकर ठहर गया, जबकि जमीनी स्तर पर कमी 25 हजार बोरी तक होने की चर्चा है। यदि ऐसा है, तो यह न केवल घोटाले के आकार, बल्कि जांच प्रक्रिया की गंभीरता पर भी सवाल खड़े करता है।
13 हजार बोरी भी मामूली गड़बड़ी नहीं
प्रशासनिक आंकड़ा ही सही मान लिया जाए, तब भी 13 हजार बोरी धान की कमी करोड़ों रुपये के घोटाले की ओर इशारा करती है। बड़ा सवाल यह है कि यह धान न तो खरीदी केंद्र में मौजूद है और न ही मिलरों तक पहुंचा है। आखिर यह धान गया कहां? क्या इसे अवैध रूप से बाजार में बेचा गया, या कागजों में दिखाकर रकम की बंदरबांट की गई?
तीन केंद्र, एक जैसी कहानी
यह मामला सिर्फ शिवप्रसाद नगर तक सीमित नहीं है। जिले के अन्य धान खरीदी केंद्रों में भी इसी तरह की गंभीर गड़बड़ियां सामने आ चुकी हैं—
सावारावा उपार्जन केंद्र में भौतिक सत्यापन के दौरान 6,470 बोरी धान गायब पाया गया।
सहकारी समिति छिन्दिया में जांच के दौरान 3,000 बोरी धान कम मिला, जिसका लिखित उल्लेख जांच रजिस्टर में दर्ज है।
तीन अलग-अलग केंद्रों में हजारों बोरियों की कमी यह साफ संकेत देती है कि मामला किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था से जुड़ा हुआ है।
प्रबंधक वही, कार्रवाई अब भी अस्पष्ट
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि गड़बड़ी सामने आने के बावजूद संबंधित धान खरीदी केंद्रों के प्रबंधक अब भी अपने पदों पर बने हुए हैं। न तो उन्हें हटाए जाने की जानकारी सामने आई है और न ही यह स्पष्ट किया गया है कि उनके खिलाफ अब तक क्या विभागीय या कानूनी कार्रवाई की गई है। सवाल उठ रहा है कि क्या इन्हें आगे भी धान खरीदी की जिम्मेदारी देकर संभावित भ्रष्टाचार के लिए खुली छूट दी जा रही है?
समय रहते सत्यापन क्यों नहीं?
जब जिले के कई धान खरीदी केंद्रों में एक जैसी गड़बड़ियां सामने आ रही हैं, तो यह भी सवाल उठता है कि प्रशासन द्वारा समय-समय पर सख्त भौतिक सत्यापन क्यों नहीं कराया गया? यदि समय रहते जांच होती, तो हजारों बोरी धान गायब होने से पहले ही स्थिति संभाली जा सकती थी।
एफआईआर होगी या मामला फाइलों में दबेगा?
अब जिले की जनता की निगाहें प्रशासन और सहकारिता विभाग पर टिकी हैं। मुख्य सवाल साफ हैं—
क्या एफआईआर दर्ज की जाएगी?
क्या गबन किए गए धान की भरपाई जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों से कराई जाएगी?
या फिर यह मामला भी जांच रिपोर्टों और फाइलों में दबकर रह जाएगा?
पारदर्शिता से ही टूटेगा संदेह
इस पूरे मामले में सबसे चिंताजनक पहलू प्रशासन की चुप्पी है। यदि कार्रवाई निष्पक्ष है, तो जांच रिपोर्ट, वास्तविक आंकड़े और आगे की कार्रवाई को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। पारदर्शिता ही धान खरीदी व्यवस्था पर उठ रहे सवालों का जवाब दे सकती है।




