उल्टा चोर कोतवाल को डांटे! – बिना शासन अनुमति के पत्रकारों को नोटिस भेजने वाली जनसंपर्क अधिकारी पर सवाल

रायपुर/जशपुरनगर | लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला करने की कोशिश अब सीधे जशपुर जनसंपर्क कार्यालय से उठते दिखाई दे रही है। सहायक संचालक जनसंपर्क, नूतन सिदार द्वारा पत्रकारों को धमकी भरा कानूनी नोटिस भेजने का मामला सामने आया है, जिसने प्रदेशभर में नया विवाद खड़ा कर दिया है।
बड़ा सवाल
- क्या नूतन सिदार ने यह नोटिस भेजने से पहले शासन/प्रशासन से अनुमति ली थी?
- यदि अनुमति नहीं ली गई, तो क्या यह सेवा आचरण नियमों का उल्लंघन नहीं है?
नियम क्या कहते हैं?
केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1964 (लागू 1965 से) के अनुसार कोई भी शासकीय कर्मचारी यदि अपने पदनाम का प्रयोग करते हुए कानूनी कार्रवाई करता है, तो उसे पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है। इस मामले में अधिकारी पर नियमों को दरकिनार कर पद का दुरुपयोग करने का आरोप लग रहा है।
पत्रकार संगठनों का आक्रोश
पत्रकार संगठनों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पत्रकार सुरक्षा पर सीधा हमला बताया है। उनका कहना है कि –
“जब सरकार पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने की बात करती है, तब एक सरकारी अधिकारी द्वारा ही पत्रकारों को धमकाना लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करना है। यह मीडिया की स्वतंत्र आवाज़ को दबाने की कोशिश है।”
प्रशासन पर सवाल
अब प्रदेशभर में यह चर्चा है कि –
- क्या जशपुर कलेक्टर और जनसंपर्क विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इस मामले में संज्ञान लेंगे?
- या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा और अधिकारी मनमानी करते रहेंगे?
क्यों अहम है यह मामला
यह सिर्फ एक नोटिस का मुद्दा नहीं, बल्कि लोकतंत्र में पत्रकारिता की आज़ादी बनाम अधिकारीशाही की दबंगई का सवाल है। यदि बिना अनुमति लिए ऐसे कदम पर कोई कार्रवाई नहीं होती, तो यह संदेश जाएगा कि प्रशासन स्वयं अपने अधिकारियों को पत्रकारों पर दबाव बनाने की खुली छूट दे रहा है।
अब जनता और पत्रकार समाज दोनों ही पूछ रहे हैं –
“क्या जशपुर का प्रशासन इतना कमजोर है कि एक अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग करके पत्रकारों को खुलेआम धमकाए और फिर भी बच निकले?”




