हसदेव अरण्य में कोल खनन से बढ़ा हाथी–मानव संघर्ष, लेमरू हाथी रिज़र्व परियोजना काग़ज़ों में सिमटी – निर्दोष आदिवासियों की जान और आजीविका पर संकट

मरवाही/कोरबा/रायपुर। छत्तीसगढ़ राज्य के हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोल ब्लॉक हेतु की जा रही अंधाधुंध जंगल कटाई के कारण हाथियों का प्राकृतिक आवास तेजी से नष्ट हो रहा है। इसका सीधा परिणाम हाथी–मानव संघर्ष के रूप में सामने आ रहा है, जिसने मरवाही, कोरबा, कटघोरा, धरमजयगढ़ एवं सरगुजा अंचल को गंभीर मानवीय संकट में डाल दिया है।

हाथियों के विस्थापन के चलते वे मजबूरी में जंगल छोड़कर गांवों की ओर आ रहे हैं, जिससे खेतों, मकानों, फसलों और आजीविका को भारी नुकसान हो रहा है। इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि अब तक हाथियों के हमलों में लगभग 303 निर्दोष ग्रामीणों की मृत्यु हो चुकी है, जबकि करंट, अवैध शिकार और प्रशासनिक लापरवाही के कारण करीब 90 हाथियों की मौत भी दर्ज की गई है। औसतन हर वर्ष 60 से अधिक लोग इस संघर्ष का शिकार बन रहे हैं।
इस पूरे संकट की सबसे बड़ी मार गरीब, आदिवासी और वन-आश्रित ग्रामीण परिवारों पर पड़ रही है, जिनके पास न सुरक्षित आवास है, न पर्याप्त संसाधन और न ही आपदा से उबरने की क्षमता।
लेमरू हाथी रिज़र्व परियोजना क्या है? लेमरू हाथी रिज़र्व परियोजना का उद्देश्य हाथियों के लिए सुरक्षित वन क्षेत्र, गलियारे (कॉरिडोर), जल स्रोत एवं चारागाह विकसित कर मानव–हाथी संघर्ष को रोकना था। यह परियोजना हाथियों को उनका प्राकृतिक आवास उपलब्ध कराकर मानव बस्तियों में उनके प्रवेश को कम करने के लिए बनाई गई थी।

परियोजना की विफलता दुर्भाग्यवश, लेमरू हाथी रिज़र्व परियोजना आज केवल काग़ज़ों तक सीमित रह गई है। बजट प्रावधान होने के बावजूद न तो ज़मीनी स्तर पर ठोस कार्ययोजना बनी और न ही प्रभावी क्रियान्वयन हुआ। मरवाही जैसे गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों को आज तक परियोजना में पूर्ण रूप से शामिल नहीं किया गया, जिससे स्थिति और भयावह होती चली गई।
प्रमुख माँगें
हसदेव अरण्य में कोल ब्लॉक हेतु जंगल कटाई से उत्पन्न हाथी–मानव संघर्ष पर विधानसभा में विशेष चर्चा कराई जाए।
लेमरू हाथी रिज़र्व परियोजना की विफलता एवं प्रशासनिक लापरवाही की उच्चस्तरीय जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।

मरवाही क्षेत्र को पूर्ण रूप से लेमरू हाथी रिज़र्व परियोजना में शामिल किया जाए। परियोजना के बजट में पर्याप्त वृद्धि कर सुरक्षित हाथी गलियारों, जल स्रोतों एवं चारागाहों का विकास किया जाए।
हाथी हमलों में मृतकों एवं प्रभावित परिवारों को मुआवज़ा राशि में उल्लेखनीय बढ़ोतरी कर त्वरित भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
प्रभावित गरीब आदिवासी परिवारों के लिए विशेष राहत, पुनर्वास, सुरक्षित आवास, सामुदायिक सुरक्षा व्यवस्था एवं स्थायी आजीविका सहायता प्रदान की जाए।

प्रभावित क्षेत्रों में त्वरित प्रतिक्रिया दल (QRT), हाथी अलर्ट सिस्टम एवं रात्रिकालीन निगरानी व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।
यदि समय रहते ठोस और निर्णायक कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट और अधिक भयावह रूप ले सकता है, जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी शासन एवं संबंधित विभागों की होगी।
जनहित, आदिवासी समाज की सुरक्षा तथा वन एवं वन्यजीव संरक्षण को ध्यान में रखते हुए इस गंभीर विषय को विधानसभा में प्रमुखता से उठाया जाना अत्यंत आवश्यक है।
छत्तीसगढ़ आदिवासी कांग्रेस के प्रदेश सचिव शुभम पेन्द्रो ने इस गंभीर जन एवं वन्यजीव संकट को लेकर नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरण दास महंत के समक्ष विस्तृत रूप से अपनी माँगें रखीं। उन्होंने आग्रह किया कि हसदेव अरण्य में कोल खनन से उत्पन्न हाथी–मानव संघर्ष पर विधानसभा में विशेष चर्चा कराई जाए तथा लेमरू हाथी रिज़र्व परियोजना की विफलता एवं प्रशासनिक लापरवाही की उच्चस्तरीय जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए साथ ही मरवाही वनमण्डल को लेमरू परियोजना के अंतर्गत शामिल किया जाए ।




