संकेत साहित्य समिति द्वारा छत्तीसगढ़ रजत जयंती पर सरस काव्य गोष्ठी का आयोजन

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“कविता जीने की प्रवृत्ति सिखाती है” — गिरीश पंकज
“कविता एक की नहीं, सबकी बात करती है” — डॉ. चितरंजन कर

रायपुर। छत्तीसगढ़ रजत जयंती के उपलक्ष्य में संकेत साहित्य समिति द्वारा वृंदावन हॉल, रायपुर में आयोजित सरस काव्य गोष्ठी में साहित्य, संस्कृति और छत्तीसगढ़ी अस्मिता का अद्भुत संगम देखने को मिला। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में भाषाविद् एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. चितरंजन कर, अध्यक्षता प्रसिद्ध व्यंग्यकार गिरीश पंकज ने की। विशिष्ट अतिथियों में संजीव ठाकुर एवं डॉ. मृणालिका ओझा उपस्थित रहीं।

कार्यक्रम का शुभारंभ संकेत साहित्य समिति के संस्थापक एवं प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ ने किया। उन्होंने छत्तीसगढ़ के 25 वर्षों की विकास यात्रा व सांस्कृतिक विरासत पर प्रकाश डालते हुए रजत जयंती की महत्ता बताई।

मुख्य अतिथि डॉ. कर ने कहा, “जो व्यक्ति समय के साथ व्यस्त रहता है, वही उसकी कीमत समझता है। कविता किसी एक की नहीं, बल्कि सबकी बात करती है।”
अध्यक्षीय उद्बोधन में गिरीश पंकज ने कविता के सार को रेखांकित करते हुए कहा, “कविता जीने की प्रवृत्ति सिखाती है, समाज को दिशा देती है। यह लोकप्रियता का साधन नहीं, बल्कि विचारों का प्रकाश है।” उन्होंने विषय आधारित गोष्ठियों को नई सृजनधर्मिता का मार्ग बताया।

कार्यक्रम का संचालन सुप्रसिद्ध कवयित्री पल्लवी झा ने किया।

कवि सम्मेलन में रचनाओं की गूँज

गोष्ठी में कई वरिष्ठ कवियों व नवोदित रचनाकारों ने अपनी प्रभावशाली रचनाओं से साहित्यप्रेमियों को मंत्रमुग्ध किया। प्रस्तुत कविताओं में छत्तीसगढ़ की महक, राष्ट्र भावना, सामाजिक सरोकार, व्यंग्य और मानवीय संवेदनाओं का सार सुंदर रूप से उभरकर आया।

मुख्य रूप से कविता पाठ करने वालों में —
डॉ. चितरंजन कर, गिरीश पंकज, डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’, संजीव ठाकुर, डॉ. मृणालिका ओझा, लतिका भावे, डॉ. सुकदेवराम साहू, डॉ. डी.पी. देशमुख, डॉ. दीनदयाल साहू, पल्लवी झा, सुषमा पटेल, अनिता झा, गोपाल जी सोलंकी, राकेश अग्रवाल, हरीश कोटक, शकुंतला तरार, सुमन शर्मा वाजपेयी, लवकुश तिवारी और कई अन्य कवि शामिल थे।

कवियों की प्रस्तुतियों में छत्तीसगढ़ी बोली की मधुरता, लोक कला की झलक, समाज की विडंबनाएँ, बदलते समय की संवेदनाएँ और देश के इतिहास व वर्तमान पर गहन अभिव्यक्तियाँ देखने को मिलीं।

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