देश में बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था

द टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने 1 फरवरी, 2026 को चंडीगढ़ से एक रिपोर्ट छापी, जिसमें फरीदाबाद के एक मज़दूर की दुर्दशा पर ध्यान दिलाया गया था, जिसे अपनी मृत पत्नी का शव एक सब्जी की गाड़ी पर घर ले जाना पड़ा, क्योंकि परिवार का सारा पैसा इलाज पर खर्च हो गया था और वे निजी एम्बुलेंस का खर्च नहीं उठा सकते थे।
उसी अखबार में तीन दिन बाद एक और खबर छपी कि नोएडा में एक परिवार ने दावा किया कि उन्हें अपने 24 साल के मृत व्यक्ति के लिए कफ़न और मदद देने से मना कर दिया गया, जब तक कि वे पोस्टमार्टम केंद्र में 3,000 रुपये अतिरिक्त नहीं पटाते। कुछ दिन पहले, दिल्ली के बीएलके मैक्स अस्पताल पर आरोप लगा कि उसने एक मृत मरीज़ का शव तब तक नहीं छोड़ा, जब तक कि 1 लाख रुपये अतिरिक्त नहीं दिए गए, जबकि पहले की अदायगी की जा चुकी थी।
ये उन परेशान करने वाली कई कहानियों में से सिर्फ़ तीन हैं, जो मीडिया में नियमित रूप से रिपोर्ट की जाती हैं। अगर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में यह स्थिति है, तो देश के ज़्यादातर दूसरे हिस्सों में आम लोगों के स्वास्थ्य की हालत के बारे में सोचना भी डरावना लगता है। बस्तर के आदिवासी क्षेत्रों की स्वास्थ्य सेवाओं की कहानियां तो राजधानी दिल्ली के मामलों को पीछे छोड़ देती हैं, लेकिन ये कहानियां कभी राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां नहीं बनतीं।
ये दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ दिखाती हैं कि दशकों के नवउदारवादी सुधारों और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश में गिरावट के कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य अधोसंरचना के कमजोर होने और निजी प्रदाताओं पर बढ़ती निर्भरता की वजह से आबादी का एक बड़ा हिस्सा कैसे वंचित और परेशान है। सरकार अपनी जीडीपी का सिर्फ़ 1.5 प्रतिशत ही सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च करती है, जिसकी वजह से लाखों लोग अपनी जेब से खर्च करने पर मजबूर हैं। दरअसल, सार्वजनिक स्वास्थ्य का धीरे-धीरे लाभ से संचालित माल के रूप में रूपांतरण हो रहा है। इसके कारण हर साल 5.5 करोड़ से ज़्यादा लोग गरीबी की दलदल में धकेले जा रहे हैं। इसके साथ ही, पारंपरिक दवा के नाम पर अवैज्ञानिक तरीकों और उपचार को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
पिछले एक दशक से मोदी सरकार जिन नवउदारवादी नीतियों को लागू कर रही है, उस ने स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में सार्वभौमिकता, समानता और पहुंच के सिद्धांतों को कमज़ोर किया है, जबकि कॉर्पोरेट अस्पतालों की श्रृंखला, बीमा-आधारित मॉडल और निजी निवेश हिस्सेदारी के एकीकरण को तेज़ किया है। इसका नतीजा है कि अब स्वास्थ्य देखभाल की लगभग 80 प्रतिशत सेवाएं निजी क्षेत्र द्वारा दी जाती हैं, जिसके पास 60 प्रतिशत से ज़्यादा हॉस्पिटल और बिस्तर हैं।
पिछले एक दशक में, निजी स्वास्थ्य देखभाल का क्षेत्र 25 प्रतिशत से ज़्यादा की सालाना दर से बढ़ा है, जिससे दो स्तरीय व्यवस्था मज़बूत हुई है, जिसमें अमीर लोगों को आधुनिक चिकित्सा देखभाल मिलती है, जबकि ज़्यादातर लोगों को वंचना तथा अपर्याप्त और अवहनीय सेवाओं का सामना करना पड़ता है। घर-परिवारों का स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च का लगभग 70 प्रतिशत खर्च दवाओं पर होता है और आम जनता की कम आय और गिरती क्रयशक्ति के कारण जीवन रक्षक दवाओं तक उसकी पहुंच लगातार मुश्किल होती जा रही है।
एक और बड़ी चिंता की बात है कि आयुष्मान भारत जैसी केंद्र द्वारा लागू की गई योजनाएं राज्यों की स्वायत्तता को कमजोर करती हैं और अलग-अलग स्थानीय स्वास्थ्य ज़रूरतों का ध्यान रखने में नाकाम रहती हैं। केंद्र सरकार का यह रुख केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों के प्रयासों को कमजोर करता है, जहाँ लगातार बढ़ते सार्वजनिक निवेश से बेहतर स्वास्थ्य नतीजे मिले हैं।
यह भी ध्यान देने की बात है कि स्वास्थ्य के नतीजे पोषण, रोज़गार, आवास, साफ़-सफ़ाई, पर्यावरण और भेदभाव से आज़ादी जैसे बड़े सामाजिक कारकों से अलग नहीं किए जा सकते। देश के विभिन्न हिस्सों और तबकों में भारी आर्थिक असमानता का सबसे ज्यादा स्वास्थ्यगत प्रभाव सामाजिक रूप से पिछड़े तबकों विशेषकर आदिवासियों और दलितों पर पड़ता है।
इस स्थिति का मुकाबला करने के लिए नीतियों में बदलाव की जरूरत है, जिसके तहत स्वास्थ्य देखभाल को एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने और जीडीपी का कम से कम 5 प्रतिशत सार्वजनिक खर्च करने जैसे कदम उठाए जाने चाहिए और सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित और सार्वजनिक रूप से चलाई जाने वाली स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करना, सार्वजनिक क्षेत्र में दवाओं के उत्पादन को फिर से शुरू करना, निजी अस्पतालों को विनियमित करना और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप की आड़ में किए जा रहे निजीकरण को खत्म करना, सस्ती दवाएं सुनिश्चित करना, खाद्य सुरक्षा और पोषण को मजबूत करना जरूरी है।
स्वास्थ्य को हमारी राजनीति का एक बड़ा और प्रमुख मुद्दा बनाया जाना चाहिए, ताकि एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और जनोन्मुख सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को हासिल किया जा सके।




