छत्तीसगढ़

शहीद ए आजम भगत सिंह जी की जयंती पर विशेष

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कोटि कोटि नमन के साथ__

चरित्र की जगह चित्र की पूजा करने वाले हम स्वार्थी भारतीयों के लिए भगत सिंह जी के आदर्श और उनके त्याग का क्या महत्व है??

हम सिर्फ उनकी या उन जैसे अन्य महान क्रांतिकारियों का चित्र सिर्फ एक दिन के लिए अपने प्रोफाइल पर लगाकर या सोशल मीडिया में दो चार शब्द लिखकर शेयर करते हुए,या तो उन्हें उनकी जयंती और उनकी पुण्यतिथि पर याद कर खाना पूर्ति कर लेते है,या फिर अपने आसपास के लोगों को यह बताना चाहते है कि हमारे अंदर दिखावे की देशभक्ति का कीड़ा आज भी जिंदा है।।।

बाकी कई अलग_अलग धड़ों और विचारधाराओं में बंटे हम भारतीय लोगों को भगत सिंह अच्छे तो जरूर लगते है,लेकिन अपने घर में नहीं बल्कि पड़ोसी के घर में।।

सच कहूं तो आज के परिवेश में भगत सिंह जी के प्रति दिखावे की श्रद्धा रखने वाले हम भारतीयों के 90 प्रतिशत मां_बाप ही अपने बच्चों को शहीद ए आजम भगत सिंह के बनाए उसूलों पर चलते देखना नहीं चाहते हैं।।

जो एकाध बच्चा/युवा भगत सिंह की तरह करता दिख भी जाए तो उसे सम्मानित करने के बजाय हम आप लोग उसे *”कन्हैया कुमार,सरजील इमाम, उमर खालिद,सोनम वांगचुंग और बस्तर की बहादुर बेटी सोनी सोढ़ी* की तरह देशद्रोही,नक्सलवादी अवसर वादी या विदेशी एजेंट बताने में देर नहीं करते है।

आज की राजनीति में भी कहीं फिट नहीं बैठते भगत सिंह

आज दो तरह के विचारधाराओं में बंटी देश की राजनीति में
समर्थक तथा विरोधी,दोनों ही दलों के लोग अपने_ अपने नेताओं के बीच भी अमर शहीद भगत सिंह जी के विचारों का कितना प्रभाव देख सकते है?? शायद एक भी नहीं?? दोनो धड़ों के लिए देश प्रेम और देशवासियों की सेवा भावना से बड़ा उनका अपना निजी स्वार्थ है। ये किसी भी तरह देश की सत्ता का नियंत्रण अपने हाथ में रखना चाहते है।। ताकि देशवासियों को अपने_ अपने तरीकों से हांक सके।। आज किसी भी राजनीतिक दल के राजनेताओं के लिए शहीदों के आदर्श और उनके त्याग का कोई वास्तविक महत्व नहीं हैं।। पूंजीवाद और शोषक विचारों लबरेज आज के राजनीतिक दलों में मानवीय संवेदना वाले बहुत ही कम राजनेता बचे है। जो बचे भी है वो या तो किनारे लगा दिए गए है,या सत्ता के दमन से संघर्ष कर रहे हैं।।

सच कहे तो आज देश का राजनीतिक आचरण अमर शहीद भगत सिंह के समय की अंग्रेजी सत्ता से ज्यादा क्रूर और षड्यंत्र कारी हो चुकी है। अन्यथा न तो आजादी के बाद देश के नागरिकों को संविधान से मिले वैचारिक स्वतंत्रता और आंदोलन के अधिकार को न तो प्रशासनिक जूतों से रगड़ा जाता। न ही  देश के बड़े दलित शोषित और जरूरतमंद लोगों की बात करने वाले जागरूक और संवेदनशील लोग षडयंत्र करके सालों के लिए सरकारी जेलों में षड्यंत्र पूर्वक  बंद किए जाते??

अच्छा हुआ कि अमर शहीद भगत सिंह और उनके साथियों को बर्बर अंग्रेजी सरकार ने
23 मार्च, 1931 को लाहौर जेल में फाँसी दे दी थी,(ब्रिटिश सरकार ने उन पर  लाहौर षड़यंत्र मामले में जॉन सॉन्डर्स की हत्या आरोप लगाया था..)
अन्यथा जिस आजादी के लिए संघर्ष कर अपना सर्वस्व बलिदान करने वाले शहीद ए आजम आज के दौर में जीवित होते तो उन्हें ना जाने कितनी बार अपने ही देश की सरकार  फैसलों के विरोध में फांसी दी जाती या न जाने कितने बार झूठे आरोपों में जेल भेजे जाते।।

*आम तौर पर साम्यवादी और कम्युनिस्ट विचारों वाले भगत सिंह आज के परिवेश में किसी भी राजनीतिक दल के राजनेताओं के बीच फिट नहीं बैठते।। न ही आज की भ्रष्ट और बेईमान प्रशासनिक व्यवस्था में वो ठीक से सांस ले पाते।।*

ऊपर से आजादी के पूर्व जिस कौमी एकता और आम जनों के मानवीय अधिकारों के लिए संघर्ष करने का उनका जज्बा था,उसके अनुरूप आज वो न तो अपने देश के आम नागरिकों को धर्म और जाति के नाम पर आपस में लड़ते हुए देख पाते। न हीं आजादी के 70/75 सालों बाद भी अपने देश के लोगों को अपनी ही चुनी हुई सरकार से अपने संवैधानिक अधिकारों से लेकर जल,जंगल, जमीन,शिक्षा,स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों से जूझते हुए देख सकते थे।।

वैसे भी आपकी जानकारी दुरुस्त कर दूं कि सौ_टका ईमानदार और साम्यवादी विचारों वाले नास्तिक क्रांतिकारी अमर शहीद भगत सिंह से प्रेरित और उनके कई सहयोगी जिनमें *प्रभात वर्मा,अजय घोष,बटुकेश्वर दत्त,यशपाल,विजय कुमार सिन्हा,डाक्टर गया प्रसाद,किशोरी लाल,दुर्गा देवी बोहरा और जयबहदुर* जैसे लोग अपने जीवन काल में किसान मजदूर आंदोलन से लेकर समानता का अधिकार,जातिवाद से मुक्ति और भूमि सुधार कानून के लिए संघर्ष करते हुए हुए आजाद भारत की सरकार में भी जेल भेजे गए। बावजूद इसके आप महान हस्तियों ने भगत सिंह जी के सपनो का भारत बनाने के प्रयास में अपना पूरा जीवन लगा दिया।।

फांसी के फंदे में झूलने से पहले अमर शहीद भगत सिंह में अपने साथियों से कहा था,,कि यह सही है कि मैने अपने जीवन का जो लक्ष्य तय किया उस हिसाब से आजादी की लड़ाई में छोटी किन्तु प्रभावशाली भूमिका अदा करके वीरगति को पाने जा रहा हूं। पर मेरी चिंताएं अभी खत्म नहीं हुई है,न जाने क्यों मुझे लगता है कि आजादी के बाद भी देश के बहुतायत जरूरतमंद लोगों को आने वाली आजादी के बाद की सामंतवादी,पूंजीवादी और दमनवादी अपनी ही सत्ता से संघर्ष करना पड़ेगा।।

भगतसिंह जी द्वारा अपने साथियों को एक अंतिम पत्र लिखा गया था,पत्र की कुछ पंक्तियां यह थी कि,
साथियो,

*स्वाभाविक है कि आप लोगों की तरह जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए,मैं इसे छिपाना नहीं चाहता। लेकिन एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ,कि मैं कैद होकर या पाबन्द होकर और जीना नहीं चाहता।*

मतलब साफ था कि
भगत सिंह आज़ादी के बाद भी व्यवस्था को लेकर चिंतित थे।

*क्योंकि उनका लक्ष्य सिर्फ़ ब्रिटिश साम्राज्य को हटाना नहीं, बल्कि आजाद भारत में एक ऐसा समाज बनाना था जहाँ सभी को समान अवसर मिले, शोषण और भेदभाव न हो, और जिसमें धर्म को राजनीति से अलग रखा जाए। उनका मानना था कि अगर एक शोषणकारी व्यवस्था समाप्त होने के बाद दूसरी शोषणकारी व्यवस्था कायम होती है,तो आज़ादी का कोई मतलब नहीं रहेगा।*

आज भगत सिंह के विचारों और उनके आदर्शों से कई मिल दूर खड़े रहने वाले हम-आप जैसे स्वार्थी और बेईमान लोग जो_ *उनके सपनो का भारत बना तो नहीं पाए,वो किस मुंह से शहीद ए आजम या उन जैसे अन्य महान क्रांतिकारियों की जयंती और उनके बलिदान दिवस पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं,,यह मेरी समझ में नहीं आता है।। मुझे तो इन सभी के चित्र के सामने खड़े होने में भी खुद पर शर्म आती है।।*

नितिन सिन्हा
संपादक
खबर सार

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