छत्तीसगढ़

“हिंदू समाज में आपसी प्रेम और एकता जरूरी” — विश्वनाथ बोगी

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विशाल हिंदू सम्मेलन में गूंजा समरसता का संदेश

मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले के ग्राम देवरी कला (कोटमी) स्थित देवी चौरा में बुधवार को एक भव्य हिंदू सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन में आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में ग्रामीणजन, संत, समाजसेवी एवं जनप्रतिनिधि शामिल हुए। आयोजन के दौरान पूरे क्षेत्र में आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक समरसता का वातावरण देखने को मिला।

संतों और वक्ताओं ने दिया एकता का संदेश

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रांत समरसता प्रमुख श्री विश्वनाथ बोगी जी ने कहा कि हिंदू समाज में समरसता और आपसी प्रेम आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। समाज को परिवार की तरह मिलजुलकर रहना चाहिए।

विशिष्ट अतिथि के रूप में

  • संत स्वामी कृष्ण प्रपन्नाचार्य जी महाराज,
  • संत महानंद जी माता जी (गिरारी धाम),
  • श्रीमती सरोज चंद्रा जी (भगवती मानव कल्याण समिति)
    मंचासीन रहे। संतजनों एवं वक्ताओं ने सामाजिक एकता, सांस्कृतिक जागरण, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रभावना पर अपने प्रेरणादायी विचार रखे।

जनप्रतिनिधियों की रही गरिमामयी उपस्थिति

सम्मेलन में बड़ी संख्या में क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि एवं संगठन पदाधिकारी मौजूद रहे। प्रमुख रूप से
हर्ष छाबरिया (जिला अध्यक्ष, विश्व हिंदू परिषद), लालजी यादव (जिला अध्यक्ष, भाजपा), प्रणव कुमार मरपच्ची (विधायक, मरवाही), समीरा पैकरा (जिला पंचायत अध्यक्ष), राजा उपेंद्रबहादुर सिंह (जिला पंचायत उपाध्यक्ष) सहित विभिन्न सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

रैली और सांस्कृतिक कार्यक्रम बने आकर्षण

सम्मेलन के अवसर पर बाजे-गाजे के साथ रैलियां निकाली गईं। विशेष आकर्षण संत महानंद जी गिरारी धाम की यात्रा रही।
सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कन्याओं द्वारा दुर्गा माता का वेश, रामायण गान, हनुमान चालीसा पाठ एवं भगवती आरती ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। एकल विद्यालय एवं भगवती मानव कल्याण समिति सहित विभिन्न संस्थाओं ने प्रस्तुतियां दीं।

आयोजन का समापन आभार प्रदर्शन के साथ

कार्यक्रम के अंत में देवरी कला की सरपंच श्रीमती श्यामवती मार्को ने सभी संतजनों, अतिथियों एवं ग्रामीणजनों का आभार व्यक्त किया और समाज में एकता, समरसता एवं सांस्कृतिक जागरण के संकल्प को दोहराया।
इस विशाल आयोजन में हिंदुत्व विचारधारा से जुड़े विभिन्न संगठनों एवं समाज के लोगों की एकजुटता देखने को मिली, जिसने सम्मेलन को ऐतिहासिक स्वरूप प्रदान किया।

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