बस्तर में नक्सलियों का टीसीओसी अभियान: रणनीति बदली या मजबूरी?

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मार्च से मई तक बढ़ते थे नक्सली हमले, अब टीसीओसी से बनाई दूरी

बस्तर। नक्सलियों का टैक्टिकल काउंटर ऑफेंसिव कैंपेन (TCOC), जो हर साल मार्च से मई के बीच बड़े हमलों के लिए जाना जाता था, अब कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। 2010 का ताड़मेटला हमला, 2010 का चिंगावरम विस्फोट, 2006 का रानीबोदली कांड और 2013 का झीरम घाटी हमला—इन सभी हमलों को इसी अवधि में अंजाम दिया गया था। लेकिन 2023 से नक्सली इस रणनीति से पीछे हटते दिख रहे हैं।

इस बदलाव के पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं। कुछ जानकार इसे नक्सलियों की नई रणनीति मान रहे हैं, जबकि कुछ का कहना है कि संगठन की कमजोर होती स्थिति इसकी वजह हो सकती है।

क्या कमजोर पड़ रहा है नक्सली संगठन?

नक्सल मामलों के विशेषज्ञ मनीष गुप्ता के मुताबिक, नक्सलियों का मुख्य उद्देश्य राज्य और सत्ता के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष करना होता है। वे समाज की स्थापित व्यवस्थाओं के विरोध में खुद को खड़ा करते हैं और इसे न्यायपूर्ण बदलाव का जरिया मानते हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और जंगलों तक उनकी पहुंच ने नक्सलियों की ताकत को कमजोर किया है।

गर्मी में हमला करना था नक्सलियों की रणनीति

बस्तर आईजी सुंदरराज पी ने बताया कि मार्च से मई के दौरान दक्षिण बस्तर की तेज गर्मी में जवानों की गश्त चुनौतीपूर्ण होती थी, और नक्सली इसी समय अपनी रणनीतिक बढ़त बनाते थे। यह अवधि उनके लिए हमले करने के लिहाज से उपयुक्त मानी जाती थी, लेकिन अब सुरक्षा बल हर मौसम में उन तक पहुंच रहे हैं, जिससे उनकी रणनीति कमजोर पड़ी है।

फोर्स अलर्ट, छिपकर वार करने की आशंका

नक्सलियों द्वारा खुले तौर पर हमले न करने का मतलब यह नहीं कि वे शांत हो गए हैं। सुरक्षा एजेंसियां मानती हैं कि नक्सली चुपचाप बिना प्रचार के हमले करने की योजना बना सकते हैं। इस खतरे को देखते हुए सुरक्षा बलों को लगातार अलर्ट मोड पर रखा गया है।

नक्सलियों का बदला हुआ रुख: रणनीति या मजबूरी?

यह देखना दिलचस्प होगा कि नक्सली टीसीओसी से पूरी तरह दूरी बना रहे हैं या यह सिर्फ उनकी नई चाल है। अगर संगठन वाकई कमजोर पड़ रहा है, तो आने वाले समय में बस्तर में नक्सल गतिविधियों में और गिरावट देखने को मिल सकती है।

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