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बीजापुर आईडी विस्फोट में 8 जवानों की मौत नक्सलियों की बड़ी सफलता या पुलिस अफसरों की भारी रणनीतिक विफलता

मेरी निजी विचार और अनुभव के आधार पर,,समीक्षा

ऐसा नहीं है कि हमारे जवान कमजोर है, परंतु हर बार नक्सल रणनीतिकारों की चूक ही हमारे जवानों के जान पर भारी पड़ी है,,,

ताड़मेटला से कुटरू तक सिर्फ गैर जिम्मेदारी और लापरवाही ने ही ली हजारों जवानों की जान,,,

तमाम दुखद घटनाओं के बावजूद कभी कोई जिम्मेदार नहीं ठहराया गया,न ही किसी के खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही की गई,, R.o.p. से परहेज क्यों??

शहीद का भाई (जो खुद नक्सल पीड़ित रहा है)उसके सवाल का जवाब शासन प्रशासन किसी के पास नहीं है,,,विपक्ष के बड़े नेता ने भी सरकार से यही सवाल किया है,,

मित्रों छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद से ही नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में एक के बाद एक बड़ी हिंसा हुई है,ज्यादातर हिंसक घटनाओं में नक्सल पंथियों को ही सफलता मिली है। वाम पंथी आतंकवादियों ने दर्जनों की संख्याओं में हमारे जवानों की जान ली है। इस तरह की घटनाओं में बहुत कम ही बार जवानों और नक्सलियों का सीधा मुकाबला हुआ है। इस बात को कहने में कतई एतराज नहीं है कि सीधे मुकाबलों में हमेशा हमारे सुरक्षा बल के जवान माओवादियों पर भारी पड़े है। जवानों ने नक्सलियों के इलाकों में उन्हें ही बड़ी चोट दी है इस बात का प्रमाण है आज नक्सलियों के कोर इलाके का 80 प्रतिशत भाग उनसे लगभग छीन लिया गया है। यहां नए नए सुरक्षा कैंप स्थापित हो चुके हैं।

साथियों एक दशक के बाद जब से नक्सल अभियान का सीधा नियंत्रण केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अपने हाथों में लिया, तबसे फोर्स का मनोबल काफी बढ़ गया है। मार्च 2026 पूर्ण नक्सल सफाया के स्पष्ट डेड लाइन के साथ केंद्रीय एवं राज्य पुलिस बल ने जहां अपना सब कुछ झोंक दिया है। वहां नक्सल अभियान में अब भी कई त्रुटियां स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। इन त्रुटियां में आपरेशनल रुल का सख्ती से पालन नहीं करना,बड़े आपरेशन के बाद घटना स्थल से जवानों की सुरक्षित वापसी को लेकर लापरवाह होना तथा आर ओ पी में ढिलाई करना मुख्य है। इसका हालिया दुष्परिणाम बीजापुर आईडी ब्लास्ट की घटना के रूप में देखा जा सकता है। ये वही गलतियां जिसे नक्सल क्षेत्र में आपरेशन के जिम्मेदार ताड़मेटला 2010 से बीजापुर 2025 तक करते आ रहे है। जिसका फायदा उठाने में माओवादी कभी नहीं चूकते हैं। नक्सल हमलों का इतिहास देखेंगे तो आप पाएंगे कि फोर्स की इस तरह एक भी लापरवाही को माओवादियों ने अपनी बड़ी सफलता में बदल दिया है।

इन वजहों ने नक्सल रणनीतिकारों के लिए इस तरह की लापरवाही की गुंजाइश कतई नहीं बचती है। जिसका लाभ दुश्मन बीजापुर 2025 की तरह लेता रहे।

घटना के विषय में यह बताया जा रहा है कि दक्षिणी अबूझमाड़ में बड़े नक्सलियों की उपस्थिति की सूचना मिलने के बाद फोर्स के जवान एक बड़े अभियान पर दंतेवाड़ा, नारायणपुर, कोंडागांव व नारायणपुर जिले से जिला रिजर्व गार्ड (डीआरजी) व स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) के 1200 से अधिक जवानों की 30 से अधिक टीम अलग-अलग मार्ग से अबूझमाड़ में घुसी थी। अभियान पूरा करने के बाद जवानों को निकालने के लिए पुलिस ने बीजापुर जिले के बेदरे-कुटरु मार्ग को चुना।

छह जनवरी को हुए विस्फोट के बाद भी अभियान पर गए जवान इसी रास्ते से ही निकाले गए, पर इस बार मानक संचालक प्रक्रिया (एसओपी) का पालन करते हुए जवानों को मोटरसाइकिल पर निकाला गया।

इसके साथ ही पूरे मार्ग पर रोड ओपनिंग पार्टी भी लगाई गई थी, जिससे नक्सलियों को दाेबारा हमले का अवसर नहीं मिला। सभी जवान सुरक्षित वापसी कर चुके हैं।

पर सवाल तो यह उठता है कि क्यों आ ई डी विस्फोट वाली घटना के दिन एस ओ पी का पालन नहीं किया गया?
नक्सलियों के कोर प्रभाव वाले इलाके से आपरेशन के बाद जवानों के सुरक्षित वापसी की जिम्मेदारी किसकी थी? किसने इतनी बड़ी लापरवाही को नजर अंदाज किया और निजी वाहन स्कॉर्पियो में 8 जवानों को एक साथ बैठा कर कैंप के लिए वापस भेजा गया। जिसकी जानकारी नक्सलियों को हो गई और उन्होंने मौके का पूरा फायदा उठाते हुए इस खूनी घटना को अंजाम दे दिया।

बस्तर में आईडी विस्फोट की घटी अब तक की घटनाओं की थोड़ी भी जानकारी रखने वाला एक समान्य नागरिक भी यह जानता है कि “यहां बस्तर में सालों से एक खूनी युद्ध चल रहा है,बेमतलब की इस हिंसा में सुरक्षा बलों के सामने जंगल युद्ध में पूरी तरह से पारंगत बर्बर और शातिर लड़ाको से लड़ रहे है। जो हमेशा अपनी गलतियों से सीखने और अपनी रणनीति बदलते रहने में माहिर है। उनके द्वारा गलतियों की समीक्षा भी होती है और गलती के लिए जिम्मेदारों को अपने स्तर पर सजा भी दी जाती है। वहीं सुरक्षा बल के अधिकारियों ने विगत तीन दशकों से जारी नक्सल उन्मूलन अभियान को कभी युद्ध की तरह नहीं देखा और न ही उसे गंभीरता से लिया। हालाकि यहां भी हर एक दु:खद घटनाओं के बाद रणनीतियां बदली गई। लेकिन गलतियों की जिम्मेदारी लेने वाला कोई सामने नही आया. न तो वह दण्डित किया गया। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि 24 सालों की इस अंधी लड़ाई में 1200 से अधिक आईडी ब्लास्ट की घटना कारीत की गई जिसमें 1400 से अधिक सुरक्षा बल के जवानों और आम नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी।

हर बार सिर्फ घटना की निंदा और नक्सलियों की आलोचना से ही खानापूर्ति कर ली गई।

बीजापुर 2025 की घटना के बाद भी सिर्फ इतना ही किया गया। जबकि होना तो यह चाहिए था,कि इस घटना में कर्तव्य के प्रति लापरवाही बरतने वाले जिम्मेदार पर विभागीय कार्यवाही की जानी थी। ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति को बड़े हद तक टल जाती।।

परंतु यहां सिर्फ इस तरह का बयान दे कर कि “पूरी दुनिया के युद्ध स्थलों में आई आई डी विस्फोट का तोड़ कहीं भी नहीं खोजा जा सका है। तो फिर बस्तर में यह कैसे संभव है, कि हम आई डी विस्फोट को रोक सकते हैं।।”

वहीं घटना के बाद शहीद जवान का एक साहसी भाई(जो खुद एक क्षेत्रीय जन प्रतिनिधि है और नक्सल हिंसा से संघर्ष रत परिवार से है)ने जो आर ओ पी को लेकर आई जी पी सुन्दरराज साहब से सीधे सवाल कर रहा है और वो निरुत्तर है,इसका मतलब है कि सुरक्षा बल के अफसरों से पुनः एक बड़ी चूक हुई है। जिसमें हमारे 8 बहादुर जवानों जिनके नाम कोरसा बुधराम,सोमडू वेंटिल,दुम्मा मड़काम,बमन सोढ़ी हरीश कोर्राम,पण्डरू पोयम, सुदर्शन वेटी,सुभरनाथ यादव और एक सिविल ड्राइवर युवक की मौत हुई है। इस तरह की चूक या लापरवाही को जब तक इस परम्परागत युद्ध क्षेत्र के लिए अक्षम्य अपराध मान कर सुरक्षा बल के अफसर या नक्सल रणनीतिकार काम नहीं करेंगे। तब तक गुरिल्ला वार के महारथियों से उनके क्षेत्र में लड़े जाने वाली हर लड़ाई बिना बड़ी हानि के नहीं जीती जा सकेगी।

वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के द्वारा घोषित लक्षित समयावधि मार्च 2026 तक बस्तर से नक्सल बाद का सफाया पर भी आपरेशन ग्रीन हंट और सलवा जुडूम की तरह प्रश्न चिन्ह लगा मिलेगा..??? बस्तर में दुश्मन से लड़ी जा रही इस लड़ाई में जोश और होश के साथ जिम्मेदारियों के बीच बराबर तालमेल जरूरी तो है ही साथ ही जीरो लेप्स पालिसी का भी अक्षरशः पालन करना होगा।

नितिन सिन्हा
सम्पादक
खबर सार

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