छत्तीसगढ़रायगढ़

खदान से विकास या विनाश? निजी फायदे के लिए ग्रामीण हितों की अनदेखी

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प्रतीक मल्लिक ✍️

रायगढ़ में भूमिगत खदानों को “विकास” बताने वाले लेखों ने उठाए सवाल — क्या यह विकास के नाम पर स्वार्थ का खेल है?


खदान से विकास का दावा या विनाश की शुरुआत?

अपने फायदे के लिए लेख लिख रहे समर्थक, पर ग्रामीणों के सवालों के सामने खामोश


विकास के नाम पर चल रहा भ्रम फैलाव

रायगढ़ क्षेत्र में हाल के दिनों में bhumigat khadan के समर्थन में कई प्रचारात्मक लेख प्रकाशित हुए हैं। इन लेखों में यह दावा किया जा रहा है कि Khadan se Vikas होगा, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि यह विकास नहीं, बल्कि विनाश का रास्ता है।


जमीन के नीचे छिपी सच्चाई

समर्थकों का कहना है कि इन bhumigat khadanon से न पेड़ कटेंगे, न जलस्रोत प्रभावित होंगे, न विस्थापन होगा।
लेकिन हकीकत यह है कि जब कोयला जमीन के नीचे से निकाला जाएगा, तो उसके बाद वहां खाली और khokhli mitti बच जाएगी। यही खोखलापन भविष्य में zameen dhansne जैसी घटनाओं का कारण बन सकता है।


कंपनी को खुश करने की कवायद

ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ लोग कंपनी को खुश करने और अपने निजी स्वार्थ के लिए ऐसे लेख लिख रहे हैं।
इन लोगों ने Company Support दिखाने के लिए यह प्रचार शुरू किया है कि “हम विकास के पक्ष में हैं”, जबकि सच्चाई यह है कि वे ग्रामीणों के हितों की अनदेखी कर रहे हैं।
छोटे-मोटे gift और incentive देकर विरोध को कमजोर करने की कोशिशें की जा रही हैं।


🗣️ “जो लोग खदानों का समर्थन कर रहे हैं, क्या वे खुद ऐसी खोखली जमीन पर रहना पसंद करेंगे?”
— एक स्थानीय निवासी, रायगढ़


रेल मार्ग के दावे पर उठे सवाल

समर्थकों का दावा है कि कोयले का परिवहन ट्रकों से नहीं, बल्कि rail route से होगा।
ग्रामीण पूछते हैं — “जब रेल लाइन जंगलों के बीच से गुज़रेगी, तो पेड़ों की कटाई कैसे नहीं होगी?”
क्या कोई ऐसी तकनीक है जो जंगल को बचाते हुए रेल को आसमान से गुज़ार दे?


भूमिगत खदान: सीमित लाभ, गहरे खतरे

विशेषज्ञों का कहना है कि bhumigat mining से थोड़े समय के लिए आर्थिक लाभ तो मिल सकता है, लेकिन दीर्घकाल में इसका असर भूमि और पर्यावरण दोनों पर पड़ता है।
जहां से कोयला निकलेगा, वहां की मिट्टी की पकड़ कमजोर हो जाएगी — और यही future land collapse का कारण बन सकती है।


जनहित बनाम निजी स्वार्थ की जंग

अब यह बहस सिर्फ “Khadan vs Vikas” तक सीमित नहीं रही। यह अब जनहित और निजी स्वार्थ की जंग बन चुकी है।
ग्रामीणों की आवाज़ और समर्थकों की चुप्पी यह बताती है कि विकास की दौड़ में कहीं न कहीं ग्रामीणों के अधिकार और पर्यावरण की सच्चाई दबाई जा रही है।

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