जराईकेला का चक्काजाम और विकास का विरोधाभास, जनहित की चिंता या सियासी एजेंडा?

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लेखक: हरहर शम्भू कुमार चौधरी, एमजे जिला ब्यूरोचीफ, सुंदरगढ़ (ओडिशा)

सुंदरगढ़ जिले के बिसरा प्रखंड के सीमावर्ती क्षेत्र जराईकेला में राष्ट्रीय राजमार्ग-320D पर हुआ चक्काजाम कई सवाल खड़े करता है। बीजू जनता दल (बीजद) के वरिष्ठ नेता सोमनाथ राहा के नेतृत्व में पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों ने सड़क की बदहाली को लेकर विरोध प्रदर्शन किया। सुबह से चले इस आंदोलन के कारण ओडिशा और झारखंड को जोड़ने वाले प्रमुख मार्ग पर यातायात प्रभावित हुआ और राहगीरों को परेशानी का सामना करना पड़ा।

खराब मौसम और रुक-रुककर हो रही बारिश के बीच पुलिस को भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए मुस्तैद रहना पड़ा। बिसरा थाना प्रभारी मनोरंजन कुंभार सहित पुलिसकर्मी बारिश के बीच व्यवस्था संभालते नजर आए। सड़क की समस्या को लेकर आवाज उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन विरोध का तरीका ऐसा भी होना चाहिए, जिससे आम जनता की मुश्किलें न बढ़ें।

निर्माण कार्य जारी, फिर चक्काजाम क्यों?

इस पूरे घटनाक्रम का एक अहम पहलू यह है कि जिस सड़क की बदहाली को लेकर चक्काजाम किया गया, उसी मार्ग पर विकास और निर्माण कार्य भी जारी है। जराईकेला पंचायत क्षेत्र में टोल गेट का निर्माण प्रगति पर है। नदी-नालों पर पुलों का ढांचा तैयार किया जा रहा है और बिसरा से जराईकेला की दिशा में सड़क निर्माण के लिए सामग्री भी पहुंचाई गई है।

ऐसे में सवाल उठता है कि जब सड़क और पुलों का निर्माण कार्य चल रहा है, तो क्या चक्काजाम के बजाय निर्माण की गति बढ़ाने के लिए प्रशासन और संबंधित एजेंसियों पर सकारात्मक दबाव बनाना अधिक प्रभावी नहीं होता? निश्चित रूप से निर्माण कार्य जारी होना इस बात की गारंटी नहीं है कि सड़क की समस्या का समाधान समय पर हो जाएगा। स्थानीय लोगों की परेशानी और उनकी मांगों को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। लेकिन आंदोलन का तरीका भी जनहित को ध्यान में रखकर तय होना चाहिए।

अपनी ही राजनीतिक जिम्मेदारी पर सवाल?

इस मामले का राजनीतिक पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जराईकेला क्षेत्र बिरमित्रापुर विधानसभा के अंतर्गत आता है, जहां वर्तमान में बीजद के रोहित जोसेफ तिर्की विधायक हैं। ऐसे में सड़क की बदहाली को लेकर बीजद नेताओं और कार्यकर्ताओं का विरोध कई राजनीतिक सवाल खड़े करता है।

जब किसी क्षेत्र में जनता ने अपने प्रतिनिधियों को विकास और व्यवस्था की जिम्मेदारी सौंपी हो, तब उन्हीं की पार्टी के नेताओं का सड़क की स्थिति को लेकर आंदोलन करना राजनीतिक विरोधाभास के रूप में देखा जा सकता है। यदि सड़क निर्माण में देरी, गुणवत्ता या अन्य कोई समस्या है, तो उसे सामने लाना जरूरी है। लेकिन यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित जनप्रतिनिधियों और पार्टी संगठन ने समस्या के समाधान के लिए पहले क्या प्रयास किए हैं।

स्थानीय विधायक रोहित जोसेफ तिर्की द्वारा पूर्व में अपने जन्मदिन पर सड़क और पुल की मरम्मत में व्यक्तिगत सहयोग किए जाने का उदाहरण भी सामने रहा है। ऐसे में बेहतर होता कि पार्टी के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता निर्माण कार्य की निगरानी करते, संबंधित ठेकेदारों से काम की समय-सीमा पर जवाब मांगते और प्रशासन के साथ समन्वय बनाकर समस्या के समाधान की दिशा में पहल करते।

विरोध का अधिकार, लेकिन जनता की परेशानी भी महत्वपूर्ण

लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन और जनआंदोलन की अपनी अहमियत है। जनसमस्याओं को लेकर आवाज उठाना राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी भी है। लेकिन विरोध और जनहित के बीच संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। किसी सड़क पर चक्काजाम होने से सबसे ज्यादा परेशानी उन आम लोगों को होती है, जिनका आंदोलन से प्रत्यक्ष रूप से कोई संबंध नहीं होता। इनमें मरीज, विद्यार्थी, नौकरीपेशा लोग, व्यापारी और रोजाना आवागमन करने वाले राहगीर शामिल हो सकते हैं।

राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि केवल विरोध दर्ज कराना ही पर्याप्त नहीं है। जनता यह भी देखती है कि उसकी समस्या के समाधान के लिए किसने कितनी गंभीरता से प्रयास किया। यदि निर्माण कार्य में देरी है तो उसकी समय-सीमा तय कराने, गुणवत्ता की निगरानी करने और संबंधित विभाग से जवाब मांगने जैसे कदम अधिक रचनात्मक साबित हो सकते हैं।

विकास के साथ जवाबदेही भी जरूरी

जराईकेला का चक्काजाम केवल एक सड़क को लेकर हुआ विरोध नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और राजनीतिक दलों की कार्यशैली पर भी चर्चा का विषय है। सड़क निर्माण का काम जारी है तो उसे निर्धारित समय में गुणवत्तापूर्ण ढंग से पूरा कराना प्रशासन और संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी है। वहीं, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक संगठनों का दायित्व है कि वे जनता की समस्याओं को समाधान तक पहुंचाएं।

जनता को नारों और आरोप-प्रत्यारोप से अधिक सड़क, पुल और बुनियादी सुविधाओं का समय पर लाभ चाहिए। इसलिए राजनीतिक दलों को विरोध की राजनीति के साथ-साथ समाधान की राजनीति को भी प्राथमिकता देनी होगी। विकास का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब जनसमस्याओं के समाधान में राजनीति बाधा नहीं, बल्कि सहयोगी बनेगी।

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