उद्योगपतियों की तिजोरी और प्रशासनिक मनमानी की भेंट चढ़ी सिंघल इस्पात की जनसुनवाई, रायगढ़ को राख के ढेर में बदलने की साजिश के खिलाफ फूटा जनाक्रोश!!

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रायगढ़@दैनिक खबर सार :- रायगढ़ पूर्वी अंचल के ग्राम सियारपाली कोटरलिया और पतरा पाली पूर्व में मेसर्स सिंघल इस्पात एंड पावर लिमिटेड द्वारा नए प्लांट की स्थापना के लिए आयोजित जनसुनवाई महज एक प्रशासनिक छलावे और उद्योगपतियों की मनमानी का मंच बनकर रह गई। क्षेत्र के ग्रामीणों और कांग्रेस पदाधिकारियों ने प्लांट के विस्तार का पुरजोर और उग्र विरोध दर्ज कराया है। हालात यह रहे कि प्रशासन को अपनी नाकामी और जनता के आक्रोश के सामने झुकते हुए, प्रातः 11 बजे से शुरू हुई इस जनसुनवाई को समय से पूर्व ही आनन-फानन में संपन्न घोषित करना पड़ा। स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों का साफ तौर पर आरोप है कि प्रशासन पूरी तरह से पूंजीपतियों के सामने नतमस्तक है और धनबल व भय के दम पर इस पूरी प्रक्रिया को असंवैधानिक तरीके से अंजाम दिया गया है।

इस जनसुनवाई की वैधता और प्रशासनिक नीयत पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्लांट स्थापना स्थल के आसपास की पांच प्रमुख ग्राम पंचायतों के ग्रामीणों को इस सुनवाई में उपस्थित होने की कोई सूचना ही नहीं दी गई थी। महापल्ली, जुरडा विश्वनाथ पाली, शकरबोगा और बेलेरिया जैसे सीधे तौर पर प्रभावित होने वाले गांवों को दरकिनार कर जनसुनवाई करा लेना लोकतांत्रिक और विधिक अधिकारों की खुलेआम हत्या है।

इतना ही नहीं, सिंघल इस्पात के इस नए विस्तार के पीछे का काला सच यह भी है कि कंपनी ने लगभग 20 से 25 वर्ष पूर्व किसानों से यह जमीन कौड़ियों के दाम खरीदी थी। भू-राजस्व संहिता के स्पष्ट नियमों के अनुसार, यदि कोई फर्म या प्लांट जमीन खरीदता है, तो उसे पांच वर्ष के भीतर वहां उद्योग स्थापित करना होता है, जो कि सिंघल प्लांट ने नहीं किया। अब स्थानीय जनप्रतिनिधियों की दो टूक मांग है कि या तो किसानों को वर्तमान बाजार मूल्य के हिसाब से दोबारा मुआवजा राशि दी जाए, या फिर उनकी बहुमूल्य जमीनें उन्हें तत्काल वापस की जाएं।

इस विकराल आक्रोश के पीछे तराई माल में लगे सिंघल इस्पात के मौजूदा प्लांट का वह भयानक सच है, जिसने पूरे अंचल को एक प्रदूषित नर्क में तब्दील कर दिया है। प्लांट से निकलने वाले जहरीले धुएं और फ्लाई ऐश (राखड़) ने पूरे रायगढ़ के पर्यावरण को तबाह कर दिया है। जीवनदायिनी केलो नदी को एक कूड़ेदान की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, जहां खुलेआम राखड़ डंप किया जा रहा है।

सरकारी नालों से लेकर खुले मैदानों तक, हर जगह डस्ट और फ्लाई ऐश का साम्राज्य है, जिससे पशु-पक्षी, स्थानीय नागरिक और पूरी जैव विविधता गंभीर रूप से संकट में है। ग्रामीणों का खौफ और गुस्सा पूरी तरह से लाजमी है कि तराई माल को बर्बाद करने के बाद अब यह कंपनी पतरा पाली, सियार पाली, तारपाली, गोपालपुर और झारगुड़ा सहित पूरे रायगढ़ पूर्वी अंचल को अपनी प्रदूषण की काली चादर से ढकना चाहती है।

क्षेत्र की जनता केवल प्रदूषण की मार ही नहीं झेल रही है, बल्कि उनके साथ रोजगार और सीएसआर (CSR) फंड के नाम पर भी एक बड़ा और क्रूर धोखा किया जा रहा है। ग्राम पंचायत देलारी के सरपंच वीरेंद्र चौहान और ब्लॉक कांग्रेस कमेटी ग्रामीण के अध्यक्ष रवि यादव ने प्रशासन और कंपनी की इस नापाक साठगांठ की कलई खोलते हुए बताया कि सिंघल प्लांट का सीएसआर फंड रायगढ़ के प्रभावित स्थानीय लोगों पर खर्च होने के बजाय रायपुर, बिलासपुर और कोरबा जैसे शहरों में लुटाया जा रहा है। रोजगार के नाम पर स्थानीय युवाओं को महज़ 10 से 12 हज़ार रुपये की आउटसोर्सिंग नौकरियों पर रखकर उनका शोषण किया जा रहा है, जबकि जनरल मैनेजर (GM) से लेकर तमाम उच्च और मलाईदार पदों पर झारखंड तथा अन्य राज्यों से लाए गए बाहरी लोगों का कब्ज़ा है। सबसे हास्यास्पद और शर्मनाक स्थिति यह है कि जिस प्लांट का बिजली विभाग के पास करोड़ों रुपये का बिल बकाया है, उसे ही सरकार और प्रशासन द्वारा नए प्लांट के विस्तार की खुली छूट दी जा रही है।

पर्यावरण विभाग और जिला प्रशासन के अधिकारियों की यह रहस्यमयी चुप्पी और उद्योगपतियों के साथ उनकी स्पष्ट मिलीभगत क्षेत्र के भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा बन चुकी है। जनसुनवाई में उमड़ा यह आक्रोश इस बात का साफ संकेत है कि स्थानीय जनता अब मूक दर्शक बनकर अपने जल, जंगल, ज़मीन और हवा को ज़हर में बदलते नहीं देखेगी।

लगभग 14 पंचायतों के लोगों ने एकजुट होकर यह स्पष्ट चेतावनी दे दी है कि यदि प्रशासन ने इस असंवैधानिक जनसुनवाई को रद्द कर प्लांट की स्थापना पर तत्काल रोक नहीं लगाई, तो आने वाले समय में यह विरोध एक बड़े और विकराल जन-आंदोलन का रूप ले लेगा। सरकार और प्रशासन को अब यह तय करना ही होगा कि उनकी प्राथमिकता चंद उद्योगपतियों का मुनाफा है या रायगढ़ के हजारों नागरिकों की सांसें और उनका भविष्य।

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