दैनिक खबर सार का बड़ा असर: छाल के ‘खून चूसने वाले’ सिंडिकेट पर गिरा कानून का डंडा, ‘मजदूर एकता’ की आड़ में लूट मचाने वाले 12 आरोपियों पर नामजद FIR दर्ज!

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रायगढ़/छाल @दैनिक खबर सार :- गरीब और बेबस मजदूरों के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई पर निर्दयता से डाका डालने वाले ‘मजदूर एकता सेवा समिति’ और आर.के.एस. ठेका कंपनी के नापाक गठजोड़ पर अंततः पुलिस का कड़ा शिकंजा कस ही गया है। ‘दैनिक खबर सार’ द्वारा इस पूरे भ्रष्टाचार और औद्योगिक क्षेत्र में पनपे माफिया राज का प्रमुखता से भंडाफोड़ किए जाने के बाद, आखिरकार छाल पुलिस ने मामले की गंभीरता को समझते हुए इन सफेदपोश शोषकों के खिलाफ नामजद एफआईआर (FIR) दर्ज कर ली है। प्रशासनिक जांच में जो काली परतें उधड़ी थीं, अब वह एक पुख्ता पुलिसिया कार्रवाई में तब्दील हो गई है। हमारी अनवरत मुहिम और शोषित मजदूरों की दबी हुई आवाज का यह एक ऐतिहासिक और जमीनी असर है, जिसने रसूखदारों के इस पूरे खौफनाक तिलिस्म को जड़ से हिला कर रख दिया है।

तहसीलदार की उस पारदर्शी और सख्त जांच रिपोर्ट के बाद, जिसमें स्पष्ट रूप से इन माफियाओं के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की अनुशंसा की गई थी, अब कानून ने अपना काम शुरू कर दिया है। पुलिस थाना छाल में 20 जून 2026 को दोपहर 14:23 बजे एक विस्तृत एफआईआर (अपराध क्रमांक 0143) दर्ज की गई है। पुलिस ने इस संगठित गिरोह की दुस्साहसिक करतूतों को देखते हुए इनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 3(5) अर्थात सामान्य आशय या आपराधिक मिलीभगत, और धारा 308(2) यानी भय दिखाकर जबरन वसूली या एक्सटॉर्शन के तहत संगीन मामला पंजीबद्ध किया है। डरा-धमका कर किसी मजदूर की गाढ़ी कमाई लूटना कोई साधारण अपराध नहीं है, और इन्हीं गंभीर धाराओं के तहत अब इन आरोपियों की रातों की नींद हमेशा के लिए उड़ने वाली है।

इस पूरी पुलिसिया कार्रवाई की मजबूत नींव आर.के.एस. ठेका कंपनी में वाहन चालक के रूप में काम करने वाले एक पीड़ित शिकायतकर्ता बाबूदास महंत की लिखित शिकायत पर रखी गई है। बाबूदास महंत ने पुलिस को दिए अपने लिखित बयान में उस खौफनाक तानाशाही का पूरा कच्चा-चिट्ठा खोलकर रख दिया, जिसका सामना एसईसीएल छाल खदान क्षेत्र के सैकड़ों मजदूर रोज घुट-घुट कर कर रहे थे। पुलिस में दर्ज कराई गई शिकायत में यह पूरी तरह से स्पष्ट किया गया है कि यह पूरा बेखौफ गिरोह ‘मजदूर एकता सेवा समिति’ संगठन के नाम पर वाहन चालकों और बेबस मजदूरों से सुरक्षा की तथाकथित गारंटी देने का झूठा झांसा देकर प्रतिमाह 700 रुपये की अवैध वसूली कर रहा था।

यह वसूली इतनी सुनियोजित और शातिर तरीके से की जा रही थी कि पैसा कभी नगद तो कभी ‘फोन-पे’ (PhonePe) जैसे डिजिटल माध्यमों से वसूला जाता था। जो भी मजदूर इस ‘हफ्ता वसूली’ का विरोध करने की या पैसे देने से मना करने की जरा सी भी जुर्रत करता, उसे सीधे तौर पर डराया-धमकाया जाता तथा नौकरी एवं संगठन से धक्के मारकर बाहर निकालने की सीधी धमकी दी जाती थी। लूटी गई इस लाखों की रकम का इस्तेमाल ये आरोपी अपने निजी विलासिता और ऐशो-आराम के लिए करते थे, मजदूरों के कल्याण या भलाई से इनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। यह ठीक वही सनसनीखेज और खौफनाक सच है, जिसे ‘दैनिक खबर सार’ ने अपनी पूर्व की खोजी रिपोर्ट में पूरी बेबाकी के साथ जनता और प्रशासन के पटल पर रखा था।

पुलिस की इस सख्त प्राथमिकी में उन सभी बारह चेहरों को पूरी तरह से बेनकाब कर दिया गया है, जो ‘मजदूर एकता’ का पवित्र चोला ओढ़कर खदान में अपने खौफ का अघोषित राज चला रहे थे। दर्ज की गई एफआईआर के दस्तावेजों के अनुसार, इस संगठित लूटपाट में अजय सिंह ठाकुर, बलिन्द्र सिंह, बोधन चौहान, रामकुमार जांगडे, पुसपालदास महंत, संजय पटेल, देवेन्द्र कर्ष, चुरामणी राठिया, रितुराज सिंह, दुर्गा डनसेना, नरेन्द्र निषाद और घनश्याम डनसेना को मुख्य आरोपी बनाया गया है। इन सभी बारह आरोपियों ने मिलकर एक ऐसा आपराधिक सिंडिकेट खड़ा कर लिया था, जिसे शायद यह गुमान हो गया था कि वे कानून और प्रशासन से भी बहुत ऊपर उठ चुके हैं।

एफआईआर का दर्ज होना शोषित मजदूरों के लंबे संघर्ष और ‘दैनिक खबर सार’ की निर्भीक पत्रकारिता की दिशा में पहली बड़ी जीत है। कानून का डंडा आखिरकार इन माफियाओं के गिरेबान तक पहुंच ही गया है, लेकिन यह हमारी मंजिल नहीं, महज एक शुरुआत भर है। असली न्याय तब तक मुकम्मल नहीं माना जाएगा, जब तक ये सभी शोषक हथकड़ियों में जकड़ कर सलाखों के पीछे नहीं धकेल दिए जाते। पुलिस ने मामला तो दर्ज कर लिया है,

लेकिन अब आम जनता और मजदूरों की पैनी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इन रसूखदारों की गिरफ़्तारी में पुलिस महकमा कितनी तत्परता और ईमानदारी दिखाता है। हम एक जिम्मेदार प्रहरी के तौर पर अपनी तीखी नजर इस पूरे मामले पर बनाए रखेंगे। यह न्याय की लड़ाई तब तक अनवरत जारी रहेगी, जब तक खदान के काले सीने में पसीना बहाने वाले हर एक पीड़ित मजदूर को उसका पूरा हक और हर एक शोषक को उसकी मुकम्मल सजा नहीं मिल जाती।

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