गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। जिले के सेमरा चौक स्थित DD अस्पताल एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। उपलब्ध चिकित्सा अभिलेखों और स्थानीय स्तर पर प्राप्त जानकारियों के आधार पर अस्पताल में संचालित सोनोग्राफी सेवाओं को लेकर कई ऐसे प्रश्न सामने आए हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच जनहित में आवश्यक बताई जा रही है।

सोनोग्राफी रिपोर्ट पर सरकारी चिकित्सक का नाम, उठे कई सवाल
उपलब्ध दस्तावेजों में एक गर्भवती महिला की सोनोग्राफी रिपोर्ट पर डॉ. कल्याणी श्रीवास का नाम एवं हस्ताक्षर दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठ रहा है कि संबंधित अवधि में उनकी सेवा स्थिति क्या थी। यदि वे उस समय शासकीय सेवा में पदस्थ थीं, तो यह जांच का विषय है कि क्या उन्हें निजी चिकित्सा संस्थान में इस प्रकार की सेवाएं प्रदान करने की विधिसम्मत अनुमति प्राप्त थी अथवा नहीं।
मशीन किसके नाम से संचालित थी, यही जांच का सबसे अहम बिंदु
PCPNDT अधिनियम के तहत किसी भी सोनोग्राफी केंद्र का संचालन निर्धारित शर्तों एवं पंजीकरण के आधार पर किया जाता है। ऐसे में यह जानना आवश्यक है कि संबंधित अवधि में अस्पताल की सोनोग्राफी मशीन किस अधिकृत चिकित्सक के नाम से पंजीकृत थी और मशीन संचालन की वैधानिक जिम्मेदारी किसके पास थी। यदि रिपोर्ट पर दर्ज चिकित्सक और पंजीकरण अभिलेखों में दर्ज जानकारी अलग-अलग पाई जाती है, तो यह जांच का महत्वपूर्ण विषय बन सकता है।
फॉर्म-एफ बताएगा कि वास्तविकता क्या है
जानकारों का मानना है कि इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी फॉर्म-एफ है। PCPNDT नियमों के अनुसार गर्भवती महिला की प्रत्येक सोनोग्राफी के लिए फॉर्म-एफ भरना अनिवार्य होता है। ऐसे में संबंधित रिपोर्ट से जुड़े फॉर्म-एफ का परीक्षण कई महत्वपूर्ण तथ्यों को स्पष्ट कर सकता है। यह जांच की जानी चाहिए कि उक्त सोनोग्राफी के लिए फॉर्म-एफ भरा गया था या नहीं, उसमें किस चिकित्सक का नाम दर्ज किया गया था तथा क्या वह नाम रिपोर्ट पर अंकित चिकित्सक के नाम से मेल खाता है।
यदि अधिकृत चिकित्सक नहीं थे तो मशीन बंद क्यों नहीं हुई?
स्थानीय स्तर पर यह प्रश्न भी लगातार उठ रहा है कि यदि किसी अवधि में अधिकृत रेडियोलॉजिस्ट अथवा अनुमोदित चिकित्सक उपलब्ध नहीं थे, तो सोनोग्राफी मशीन का संचालन कैसे जारी रहा। नियमों के जानकारों का कहना है कि पंजीकरण की शर्तों के अनुरूप आवश्यक विशेषज्ञ उपलब्ध न होने की स्थिति में मशीन के संचालन पर रोक लगाई जा सकती है। ऐसे में यह भी जांच का विषय है कि संबंधित अवधि में निरीक्षण और निगरानी की व्यवस्था किस स्तर तक प्रभावी रही।
क्या केवल एक रिपोर्ट का मामला या लंबे समय से चल रही व्यवस्था?
उपलब्ध अभिलेख संकेत देते हैं कि मामला केवल एक रिपोर्ट तक सीमित नहीं हो सकता। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि जांच को केवल एक दिन अथवा एक मरीज तक सीमित रखने के बजाय संबंधित अवधि के सभी सोनोग्राफी रिकॉर्ड, फॉर्म-एफ, लॉग बुक, मरीज रजिस्टर तथा अन्य वैधानिक अभिलेखों का परीक्षण किया जाना चाहिए। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि नियमों का पालन नियमित रूप से किया जा रहा था या नहीं।
अब स्वास्थ्य विभाग की जांच पर टिकी निगाहें
जनता के बीच यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि यदि सभी प्रक्रियाएं नियमानुसार संचालित हो रही थीं तो अभिलेखों की जांच में स्थिति स्वतः स्पष्ट हो जाएगी। वहीं यदि कहीं नियमों की अनदेखी हुई है तो जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका भी सामने आनी चाहिए। अब निगाहें स्वास्थ्य विभाग, PCPNDT प्राधिकरण और जिला प्रशासन पर हैं कि वे इस मामले में आकस्मिक निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति को सार्वजनिक करते हैं या नहीं।


