खून के रिश्ते हाशिए पर, दौलत की चौखट पर सजदा

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आधुनिकता की अंधी दौड़ में बिखरते परिवार और सिसकती संवेदनाएं

जब रिश्तों का मूल्य प्रेम नहीं, पैसा और प्रतिष्ठा तय करने लगे

बिलासपुर। आधुनिकता, भौतिक सुख-सुविधाओं और आर्थिक प्रतिस्पर्धा के दौर में जीवन का स्तर भले ऊंचा हुआ हो, लेकिन क्या रिश्तों की गहराई भी उसी अनुपात में बढ़ी है? यह सवाल आज समाज के सामने गंभीर चुनौती बनकर खड़ा है। परिवार, जो कभी भारतीय सामाजिक व्यवस्था की सबसे मजबूत इकाई माना जाता था, उसमें आपसी संवाद, त्याग और संवेदनशीलता के कमजोर पड़ने की चिंता लगातार सामने आती रही है।

बिलासपुर के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं शपथ आयुक्त निशी कान्त शुक्ला ने इसी बदलते सामाजिक परिदृश्य पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान समय में कई जगह खून के रिश्तों की अहमियत कम होती दिखाई दे रही है, जबकि धन और सामाजिक हैसियत के सामने लोग अधिक झुकते नजर आते हैं।

क्या पैसा बन गया है सम्मान का नया पैमाना?

आज सफलता को कई बार संस्कार, चरित्र और व्यवहार से अधिक आर्थिक स्थिति से जोड़कर देखा जाने लगा है। अधिक कमाई, महंगी जीवनशैली और सामाजिक प्रभाव को प्रतिष्ठा का पैमाना मानने की प्रवृत्ति ने सामाजिक प्राथमिकताओं को प्रभावित किया है।

आर्थिक प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, लेकिन जब धन जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन जाए तो रिश्तों के लिए समय और संवेदनाओं की जगह कम होती चली जाती है। कई परिवारों में छोटी-छोटी बातों को लेकर वर्षों तक संवाद बंद रहने की स्थिति बन जाती है, जबकि आर्थिक रूप से प्रभावशाली लोगों के साथ संबंध बनाए रखने में अतिरिक्त प्रयास किया जाता है।

संपत्ति की चाह बड़ी, माता-पिता की जिम्मेदारी छोटी क्यों?

परिवारों में बुजुर्ग माता-पिता की स्थिति इस बदलाव का सबसे संवेदनशील पक्ष है। जिन माता-पिता ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने में लगा दी, वृद्धावस्था में वही माता-पिता कई बार अकेलेपन और उपेक्षा का सामना करते दिखाई देते हैं।

संपत्ति और विरासत पर अधिकार की अपेक्षा तो रहती है, लेकिन माता-पिता की सेवा और देखभाल को जिम्मेदारी मानने की भावना हर जगह समान रूप से दिखाई नहीं देती। वृद्धाश्रमों की मौजूदगी और वहां पहुंचने वाले बुजुर्गों की पीड़ा समाज को आत्ममंथन के लिए मजबूर करती है।

औलाद के लिए त्याग करने वाले माता-पिता आखिर क्यों हो रहे अकेले?

माता-पिता बच्चों के जन्म से लेकर उनके भविष्य तक अपनी इच्छाओं और जरूरतों का त्याग करते हैं। शिक्षा, रोजगार, विवाह और जीवन की अन्य आवश्यकताओं में वे अपनी क्षमता से अधिक योगदान देने का प्रयास करते हैं।

लेकिन जीवन के अंतिम पड़ाव पर यदि उन्हें अपने ही घर में भावनात्मक सहारे की कमी महसूस हो, तो यह केवल एक परिवार की समस्या नहीं रह जाती। यह समाज की बदलती संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़ा करती है।

विवाह के बाद बदलते समीकरण

विवाह के बाद परिवारों में रिश्तों का संतुलन बदलना स्वाभाविक है। पति-पत्नी के बीच नए दायित्व आते हैं और दोनों परिवारों के बीच सामंजस्य की आवश्यकता बढ़ जाती है। समस्या तब पैदा होती है, जब किसी एक पक्ष के प्रति अत्यधिक झुकाव के कारण दूसरे रिश्तों में दूरी बढ़ने लगे।

अधिवक्ता निशी कान्त शुक्ला का मानना है कि माता-पिता और भाई-बहनों के साथ संवाद बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है, जितना नए रिश्तों को सम्मान देना। परिवार तभी मजबूत रह सकता है, जब उसमें सभी रिश्तों के लिए सम्मान और संवाद की जगह बनी रहे।

सगे भाई-बहनों से दूरी, रिश्तों में बढ़ती औपचारिकता

बदलती जीवनशैली और अलग-अलग पारिवारिक प्राथमिकताओं के कारण भाई-बहनों के बीच पहले जैसी निकटता कई परिवारों में कम हुई है। छोटी-छोटी बातों पर मनमुटाव, संपत्ति संबंधी विवाद और अहं का टकराव रिश्तों में लंबे समय तक दूरी पैदा कर सकता है।

वहीं दूसरी ओर सामाजिक और पारिवारिक दायरे में नए रिश्तों को अधिक महत्व मिलने से जन्म से जुड़े रिश्ते कभी-कभी पीछे छूट जाते हैं। यह स्थिति संयुक्त परिवार की अवधारणा के कमजोर होने की बड़ी वजहों में से एक मानी जा सकती है।

धन सुख-सुविधाएं खरीद सकता है, रिश्तों की गर्माहट नहीं

धन जीवन को सुविधाजनक बना सकता है। बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और अन्य जरूरतों को पूरा करने में पैसा महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन धन से विश्वास, अपनापन, सम्मान और सच्चा भावनात्मक जुड़ाव खरीदा नहीं जा सकता।

एक व्यक्ति के पास कितना भी धन क्यों न हो, जीवन के कठिन समय में उसे ऐसे लोगों की जरूरत होती है जो बिना किसी स्वार्थ के उसके साथ खड़े हों। यही रिश्तों की वास्तविक पूंजी है।

समय का चक्र हर व्यक्ति को देता है जवाब

अधिवक्ता निशी कान्त शुक्ला ने समाज को आत्ममंथन का संदेश देते हुए कहा कि व्यक्ति को अपने वर्तमान व्यवहार के भविष्य पर पड़ने वाले प्रभाव को समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार हम अपने माता-पिता और परिवार के बुजुर्गों के साथ व्यवहार करते हैं, आने वाली पीढ़ियां उसी व्यवहार को देखकर सीखती हैं।

उन्होंने कहा कि यदि आज माता-पिता और सगे रिश्तों को बोझ समझकर किनारे किया जाएगा, तो भविष्य में वही व्यवहार अगली पीढ़ी से मिलने की आशंका बनी रहेगी। इसलिए समय रहते रिश्तों की अहमियत समझना जरूरी है।

रिश्ते बचाने के लिए फिर लौटना होगा संवेदनाओं की ओर

आधुनिकता का अर्थ रिश्तों से दूरी बनाना नहीं है। आधुनिक जीवन में आर्थिक सफलता जरूरी है, लेकिन उसके साथ मानवीय संवेदनाओं को जीवित रखना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।

माता-पिता को सम्मान, भाई-बहनों को अपनापन, जीवनसाथी को विश्वास और बच्चों को संस्कार—यही किसी परिवार की वास्तविक संपत्ति है। यदि इन मूल्यों को बचाए रखा गया तो आधुनिकता परिवारों को मजबूत बनाएगी, कमजोर नहीं।

अंततः सवाल यह नहीं कि हमारे पास कितनी दौलत है, बल्कि यह है कि उस दौलत और सफलता के बीच हमारे अपने कितने लोग हमारे साथ खड़े हैं।

अभिषेक कुमार पाण्डेय
रिपोर्टर, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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