15 साल बाद भी रहस्य बना पत्रकार उमेश राजपूत हत्याकांड, क्या हत्या के पीछे थी सुनियोजित साजिश?

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घर के भीतर पांच लोगों की मौजूदगी में मारी गई गोली, धमकी भरी पर्ची से लेकर जांच में साक्ष्य गायब होने के आरोप तक कई सवाल आज भी अनसुलझे

गरियाबंद/छुरा। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के छुरा नगर में वर्ष 2011 में हुई पत्रकार उमेश राजपूत की हत्या को 15 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन इस मामले से जुड़े कई सवाल आज भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाए हैं। स्थानीय स्तर पर शुरू हुई जांच के बाद मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) तक पहुंचा, फिर भी परिवार और मामले से जुड़े लोगों के मन में घटना की पूरी सच्चाई को लेकर सवाल कायम हैं। ऐसे में यह चर्चा आज भी होती है कि उमेश राजपूत की हत्या किसी व्यक्तिगत विवाद का परिणाम थी या इसके पीछे कोई बड़ी और सुनियोजित साजिश काम कर रही थी।

गृहग्राम से लौटने के बाद घर में हुई थी वारदात

23 जनवरी 2011 को उमेश राजपूत अपने गृहग्राम हीराबतर गए थे। वहां से लौटने के बाद वे छुरा स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे और नगर में कुछ लोगों से मुलाकात भी की। इसके बाद वे अपने घर लौटे।

परिजनों के मुताबिक, घर से फोन आने के बाद उमेश वहां पहुंचे थे। उस समय घर के भीतर उनके दो परिजनों के अलावा तीन अन्य लोग भी मौजूद थे। इसी दौरान उन्हें गोली मार दी गई। घटना ने पूरे इलाके को झकझोर दिया था।

मौके पर मिली कथित धमकी ने बढ़ाया रहस्य

हत्याकांड के बाद घटनास्थल से एक कथित धमकी भरी पर्ची मिलने की बात सामने आई थी। बताया गया कि उसमें उमेश राजपूत को समाचार लिखना बंद करने और छुरा छोड़कर चले जाने की चेतावनी दी गई थी।

यदि पर्ची वास्तव में हत्या से पहले दिए गए दबाव या धमकी से जुड़ी थी, तो यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि आखिर उमेश की पत्रकारिता में ऐसा कौन-सा विषय था, जिससे किसी व्यक्ति या समूह को आपत्ति थी। क्या उन्हें पहले भी किसी तरह की धमकी दी गई थी और क्या उनकी खबरों या रिपोर्टिंग का हत्या से कोई संबंध था? इन बिंदुओं पर परिवार की ओर से लंबे समय से सवाल उठाए जाते रहे हैं।

जंगल या रास्ते में नहीं, घर के भीतर क्यों हुई हत्या?

मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू हत्या की जगह को लेकर भी है। उमेश राजपूत घटना वाले दिन अपने गृहग्राम हीराबतर गए थे और सुरक्षित छुरा लौटे। इसके बाद उन्होंने नगर में लोगों से मुलाकात की और फिर अपने घर पहुंचे।

परिजनों और मामले पर नजर रखने वालों का सवाल है कि यदि हत्या पहले से तय थी, तो उन्हें रास्ते में या किसी सुनसान स्थान पर निशाना बनाने के बजाय घर के अंदर मौजूद कई लोगों के बीच गोली क्यों मारी गई? क्या हमलावरों को उनके घर पहुंचने के समय की जानकारी थी? क्या वारदात को अंजाम देने के लिए पहले से कोई योजना बनाई गई थी?

इन सवालों का निर्णायक उत्तर आज भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है।

पुलिस जांच और साक्ष्यों को लेकर भी उठते रहे सवाल

हत्याकांड की जांच को लेकर समय-समय पर कई तरह के सवाल सामने आते रहे हैं। परिवार की ओर से आरोप लगाया जाता रहा है कि स्थानीय थाने में जांच के दौरान महत्वपूर्ण साक्ष्य गायब हो गए थे।

हालांकि इन आरोपों की अंतिम पुष्टि संबंधित जांच एजेंसी या न्यायिक प्रक्रिया से ही हो सकती है, लेकिन यदि किसी गंभीर आपराधिक मामले में साक्ष्यों के सुरक्षित संरक्षण में लापरवाही हुई हो, तो उसकी जिम्मेदारी तय करना भी जांच का अहम हिस्सा होना चाहिए। परिवार लंबे समय से इस पहलू पर भी स्पष्टता की मांग करता रहा है।

ब्रेन मैपिंग को लेकर परिवार ने किए थे गंभीर दावे

जांच के दौरान हुई कथित ब्रेन मैपिंग को लेकर भी परिवार की ओर से कई दावे किए जाते रहे हैं। परिजनों का कहना रहा है कि जांच में प्रभावशाली लोगों द्वारा कथित रूप से हत्या करवाए जाने की दिशा में संकेत मिले थे।

हालांकि ऐसे दावों की वास्तविकता, किसी रिपोर्ट की प्रमाणिकता और उसका कानूनी महत्व जांच एजेंसी तथा न्यायालय के निष्कर्षों के आधार पर ही निर्धारित किया जा सकता है। केवल किसी दावे या जांच प्रक्रिया के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।

सीबीआई जांच के बाद भी परिवार को पूरी सच्चाई का इंतजार

उमेश राजपूत हत्याकांड की जांच स्थानीय पुलिस से आगे बढ़कर सीबीआई तक पहुंची। इसके बावजूद परिवार का कहना है कि उन्हें आज भी उन सभी सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं मिले हैं, जिनके साथ वे वर्षों से न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

परिवार यह जानना चाहता है कि हत्या का वास्तविक कारण क्या था, धमकी भरी पर्ची के पीछे कौन था और वारदात में यदि एक से अधिक लोग शामिल थे तो उनकी भूमिका क्या थी।

15 साल बाद भी न्याय की उम्मीद कायम

23 जनवरी 2011 की घटना को अब डेढ़ दशक से अधिक समय गुजर चुका है। समय बीतने के बावजूद उमेश राजपूत के परिवार की न्याय की उम्मीद खत्म नहीं हुई है। परिवार चाहता है कि मामले की हर कड़ी को दोबारा गंभीरता से देखा जाए और यदि किसी बड़ी साजिश या षड्यंत्र की भूमिका थी तो उसे सामने लाया जाए।

उमेश राजपूत हत्याकांड आज भी कई सवाल छोड़ता है—क्या उनकी हत्या पहले से तय थी? क्या उनकी पत्रकारिता किसी के लिए परेशानी का कारण बनी थी? धमकी भरी पर्ची की वास्तविकता क्या थी? जांच के दौरान साक्ष्यों को लेकर लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई थी? और क्या इस मामले में सभी संभावित पहलुओं की पूरी तरह जांच हो पाई?

इन सवालों के अंतिम जवाब जांच एजेंसी और न्यायालय के निष्कर्षों से ही सामने आ सकते हैं। फिलहाल, 15 वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी उमेश राजपूत का परिवार उस दिन की पूरी सच्चाई और न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है।

रिपोर्ट: परमेश्वर राजपूत, गरियाबंद

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