सारंडा को वर्ल्ड लाइफ सेंचुरी बनाने की कवायद में उपेक्षित आदिवासी आवाजें

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सारंडा : झारखंड की पहचान रहे एशिया के सबसे बड़े साल वन सारंडा को वर्ल्ड लाइफ सेंचुरी घोषित करने की कवायद तेज हो गई है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सरकार ने इस दिशा में कदम उठाना शुरू कर दिया है. इसी क्रम में , आज छोटानगरा मैदान में झारखंड सरकार के कई मंत्री, विधायक और सांसद पहुंचे. मंच से बड़े-बड़े वादे किए गए, लेकिन जिस मुद्दे के लिए यह सभा बुलाई गई थी—यानी पीड़ स्तरीय ग्राम सभा और जनता की राय—वह हाशिए पर रह गई.

सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि सारंडा क्षेत्र के मनकी श्री लगुड़ा देवगम, जो इस क्षेत्र की ग्रामसभा और आदिवासी परंपराओं के मान्य संरक्षक हैं, उन्हें मंच पर जगह तक नहीं दी गई. यह केवल एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरे सारंडा क्षेत्र की अस्मिता का अपमान माना जा रहा है. स्थानीय ग्रामीणों ने इसे “आदिवासी अस्मिता के साथ खिलवाड़” करार दिया.

60 गांवों का भविष्य अंधेर में
सारंडा क्षेत्र में लगभग 60 गांव बसे हुए हैं. इनमें से  गांव सीधे तौर पर प्रभावित होंगे अगर इसे वर्ल्ड लाइफ सेंचुरी घोषित कर दिया गया. ग्रामीणों ने मंच से सवाल दागे—”हम कहां जाएंगे? हमारा रोजगार कहां से चलेगा?”

आज भी 60 में से 10 गांव वन ग्राम है . कई दशकों से यह मांग उठती रही है कि इन्हें राजस्व ग्राम घोषित किया जाए, ताकि यहां सरकारी योजनाओं और सुविधाओं का लाभ मिल सके.लेकिन आजादी से लेकर झारखंड अलग राज्य बनने तक किसी भी सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया. न सड़क बनी, न पीने का उचित पानी पहुंचा.

ग्रामीणों का कहना है, “जब तक हमारी बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ, तब तक वर्ल्ड लाइफ सेंचुरी जैसी योजनाओं का क्या मतलब? सरकार केवल कागजों पर हमें विस्थापित कर देगी, लेकिन हमें पुनर्वास और आजीविका का क्या मिलेगा?”
सरकार पर सवालों की बौछार



सभा में उपस्थित पंचायत समिति सदस्यों और ग्रामीणों ने सरकार से तीखे सवाल किए— आजादी के 75 साल बाद भी सारंडा अंधेरे में क्यों है? पीने का पानी और स्वास्थ्य सुविधा क्यों नहीं?
सड़कें आज भी खस्ताहाल क्यों हैं? अगर वर्ल्ड लाइफ सेंचुरी बनेगा तो हजारों लोग उजड़ेंगे, उनका ठिकाना कहां होगा?
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि जब भी चुनाव आता है तो नेता वादे करते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही सारी बातें हवा हो जाती हैं.

आदिवासी अस्मिता पर आघात
सभा में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की रही कि मंच पर आदिवासी परंपरा और ग्रामसभा की आवाज को जगह नहीं दी गई. मनकी श्री लगुड़ा देवगम का नाम इस क्षेत्र में सम्मान से लिया जाता है. उन्हें अपमानित कर बाहर रखना न सिर्फ परंपरा का अनादर है बल्कि यह साफ संदेश देता है कि सरकार केवल औपचारिकता निभा रही है, जनता की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित करने में उसकी कोई रुचि नहीं है.
स्थानीय आदिवासी नेताओं ने कहा, “अगर ग्रामसभा को दरकिनार किया गया तो यह सीधा-सीधा संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून का उल्लंघन है.”



विकास का खोखला नारा
यह कटु सत्य है कि सारंडा में आज भी विकास की बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच पाई हैं. जंगल के बीच बसे गांवों में बच्चे आज भी मिट्टी की झोपड़ियों में पढ़ते हैं. महिलाएं मीलों पैदल चलकर पानी ढोती हैं. इलाज के लिए मरीजों को खाट पर उठाकर सड़कों तक लाना पड़ता है.
ऐसे में जब सरकार “वर्ल्ड लाइफ सेंचुरी” के नाम पर यहां की जनता को विस्थापन की ओर धकेल रही है, तो ग्रामीण इसे विकास नहीं बल्कि “विनाश” की संज्ञा दे रहे हैं.

सवालों से घिरा सरकार का मंसूबा
ग्रामीणों का आरोप है कि सरकार और मंत्री केवल फोटो खिंचवाने और दिखावा करने पहुंचे थे. असली मुद्दे—जनता की भागीदारी, विस्थापन, पुनर्वास, और आजीविका—पर कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया गया.
यहां तक कि अब तक जिन गांवों को राजस्व ग्राम बनाना था, उस पर भी सरकार चुप है. ग्रामीणों ने कहा, “जब हमारे गांवों की मान्यता तक पूरी नहीं हुई, तब हमें उजाड़ने की योजना क्यों बनाई जा रही है?”
जनता का ऐलान: विरोध तेज होगा

सभा के बाद ग्रामीणों ने ऐलान किया कि अगर सरकार ने बिना ग्रामसभा की सहमति के वर्ल्ड लाइफ सेंचुरी बनाने की कोशिश की तो आंदोलन तेज किया जाएगा. स्थानीय पंचायत समिति के मुखियाओं ने स्पष्ट कहा कि आदिवासी जनता अपने अस्तित्व और पहचान के लिए संघर्ष करेगी.

सारंडा का मुद्दा केवल एक जंगल का नहीं है, यह आदिवासी अस्मिता, अस्तित्व और विकास का सवाल है. जब तक सरकार ग्रामीणों की बुनियादी समस्याओं का हल नहीं निकालती, तब तक वर्ल्ड लाइफ सेंचुरी की घोषणा केवल दिखावा और विस्थापन का प्रतीक बनकर रह जाएगी.
सवाल साफ है—क्या सारंडा के 60 गांवों के हजारों लोग अपने घर-बार, आजीविका और परंपरा से वंचित होकर सिर्फ कागजों पर “वाइल्ड लाइफ सेंचुरी” का तमगा देखेंगे? या सरकार सचमुच जनता की आवाज सुनेगी?

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