छत्तीसगढ़

कोठीखोल में सूखे की दस्तक , प्यासे खेत और किसानों की आंखें नम

Advertisement

किसानों की सूखती उम्मीदों पर कब पड़ेगी सरकार की नज़र?

कैलाश आचार्य (स्वतंत्र पत्रकार)
मो.7225850466

बरमकेला। बरमकेला तहसील के अंतर्गत सुदूर ओडिशा बार्डर से लगे 46 गांवों का इलाका, जिसे कोठीखोल के नाम से जाना जाता है, इस समय सूखे की मार से जूझ रहा है। 12 ग्राम पंचायतों के इस क्षेत्र में करीब एक महीने से बारिश नहीं हुई। कहीं-कहीं चिटपुट बूंदाबांदी हुई भी, तो वह फसलों की प्यास बुझाने के लिए नाकाफी रही। मिर्च, धान, मूंग, मूंगफली जैसी फसलें सूखने लगी हैं और खेतों में हरियाली की जगह पीली पत्तियां और मुरझाहट फैल रही है।


किसानों का बयान हालात की गंभीरता और सरकार की उदासीनता दोनों को उजागर करते हैं। किसानों का कहना है कि हालात दिन-ब-दिन खराब होते जा रहे हैं। किसान वीरेंद्र कुमार सिदार ने चिंता जाहिर करते हुए कहा — “अगर आज से पानी गिरना भी शुरू हो जाए तो भी जिस किसान के पास बोरवेल नहीं है, उसकी उपज और आमदनी इस साल बहुत घट जाएगी।”

किसान चित्रसेन बरिहा ने बेबसी में कहा — “क्या ही कर सकते हैं, इंद्र देवता से लड़ तो नहीं सकते।” यह वाक्य केवल मौसम की मजबूरी नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की विफलता पर भी चोट करता है।

किसान सम्राट पटेल ने सरकारी लापरवाही पर सवाल उठाया — “ओडिशा में 8 हजार के मामूली शुल्क लेकर सरकार ने हर किसान को बोरवेल दिया है, काश हमारी सरकार भी किसानों के लिए इतना सोचती।” यह बयान सीधा इस ओर इशारा करता है कि किसानों के लिए राहत योजनाएं केवल कागजों में सीमित हैं, जमीन पर उनका कोई ठोस असर नहीं दिखता।

किसान शंकर लाल चौहान ने वर्तमान स्थिति को लेकर भावुक होते हुए कहा — “स्थिति काफी खराब है… किसान की आंखें गीली हैं और खेत सूख रहे हैं।” ये शब्द केवल सूखे का वर्णन नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी की मेहनत के खोखले होते सपनों का सजीव चित्र हैं।


कोठीखोल का यह सूखा सिर्फ खेतों की मिट्टी नहीं सुखा रहा, बल्कि किसानों की उम्मीद और साल भर की मेहनत को भी चुपचाप निगल रहा है। किसानों की चिंता दिन-ब-दिन बढ़ रही है। जिनके पास सिंचाई के लिए बोरवेल नहीं है, उनका नुकसान तय माना जा रहा है। हालात ऐसे ही रहे, तो कोठीखोल के खेतों में आने वाले दिनों में न फसलें लहलहाएंगी, न ही किसानों के चेहरों पर मुस्कान लौट पाएगी क्योंकि धान की फसलें अब मरने लगी है, अगर आसमान ने जल्द ही रहमत नहीं बरसाई, तो आने वाले दिनों में यह इलाका और गहरी आर्थिक मार झेलेगा।

प्रशासन और नीति-निर्माताओं के लिए यह समय चेतावनी की घंटी है। अगर अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए — जैसे कि बोरवेल, सिंचाई साधन, आपातकालीन मुआवजा और वैकल्पिक फसल योजना — तो कोठीखोल का सूखा सिर्फ इस सीजन की फसल नहीं, बल्कि आने वाले सालों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को भी बर्बाद कर देगा। सरकार के दफ्तरों में बैठकर फाइलें पलटने से न बारिश आएगी, न खेतों में हरियाली लौटेगी। अब जरूरत है कि प्रशासन गांव-गांव जाकर किसानों के साथ खड़ा हो, वरना इतिहास में यह लापरवाही एक और कृषि-त्रासदी के रूप में दर्ज होगी।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button