झूठी मुखबिरी से धान ज़ब्ती की कार्रवाई, असफल रहा षड्यंत्र

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पुसौर । राज्य शासन ने अवैध धान आवक को रोकने के लिए तहसीलदार, खाद्य विभाग, मंडी विभाग, कृषि विभाग सहित अन्य सहायक अधिकारियों को जिम्मेदारी दी है। इसी कड़ी में हाल ही में बडेहरदी के कुछ किसानों के घरों में रखे धान को जांच दल द्वारा ज़ब्त किया गया। किसानों का कहना है कि इस कार्रवाई के दौरान बिना सही मिलान किए ही धान को ज़ब्त कर लिया गया।

किसानों ने मांग की कि ज़ब्त किए गए धान का उनके खेतों और घर में रखे धान से मिलान किया जाए, लेकिन जांच दल ने शाम का समय होने का हवाला देकर कार्रवाई अधूरी छोड़ दी और अपनी कार्रवाई को सही ठहराने के लिए समाचार प्रकाशित करवा दिया।

इस घटना से आहत किसान चैनसिंह पटेल, मुकुंद साव, योगेश साव और मुक्तेश्वर पंडा ने उच्चाधिकारियों के समक्ष शिकायत दर्ज कराई। मुक्तेश्वर पंडा, जो ग्राम पंचायत बडेहरदी के सरपंच, जनपद सदस्य, मंडल उपाध्यक्ष और सोसायटी अध्यक्ष रह चुके हैं, ने इस कार्रवाई को उनकी छवि खराब करने का षड्यंत्र बताया।

गौरतलब है कि ज़ब्त किए गए धान को बाद में पंचनामा के जरिए किसानों को लौटा दिया गया। यह घटना न केवल जांच दल की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है, बल्कि झूठी मुखबिरी के कारण प्रशासन की साख को भी ठेस पहुंचाती है।

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पुसौर  : 19 आंगनबाड़ी केंद्र कच्चे मकानों में संचालित, भवन निर्माण अधूरा

पुसौर क्षेत्र में महिला एवं बाल विकास परियोजना के तहत 19 आंगनबाड़ी केंद्र कच्चे मकानों में संचालित हो रहे हैं। इनमें 5 केंद्र पुसौर के शहरी क्षेत्र में और 14 रायगढ़-छातामुरा क्षेत्र में स्थित हैं। संबंधित अधिकारियों को भवन निर्माण के लिए कई बार आवेदन दिए गए, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

जानकारों के अनुसार, शहरी क्षेत्र में आंगनबाड़ी भवन निर्माण की जिम्मेदारी नगरीय निकाय की होती है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह कार्य मनरेगा या अन्य फंड से किया जाता है। इसी वजह से पुसौर के ग्राम पंचायतों में लगभग सभी आंगनबाड़ी केंद्र शासन द्वारा निर्मित भवनों में संचालित हैं।

पुसौर नगर अध्यक्ष रितेश थवाईत ने बताया कि सारथी मोहल्ला और जगन्नाथ मंदिर परिसर के आंगनबाड़ी भवनों के लिए 16 बार आवेदन किया गया, जिसमें स्थान भी उपलब्ध करवाया गया, लेकिन फंड की कमी के कारण भवन निर्माण नहीं हो पाया।

इस समस्या पर परियोजना अधिकारी कश्यप का कहना है कि शहरी क्षेत्र के लिए अलग से फंड नहीं आता, इसलिए भवन निर्माण रुका हुआ है। यह स्थिति शासन के सुशासन पर सवाल खड़े करती है, क्योंकि जहां जिले में नालंदा परिसर और बड़ी लाइब्रेरी का निर्माण हो रहा है, वहीं बच्चों के लिए आंगनबाड़ी भवनों का न बन पाना चिंताजनक है।

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