प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक ऐसे “कर्मठ साहब” की खूब चर्चा है, जिन्होंने सरकारी सेवा को ‘कुबेर की चाबी’ में बदल दिया है। सड्डू के बंगलों से शुरू होकर नवनिर्मित जिले तक फैले उनके रसूख और वैभव का खाका कुछ इस तरह बैठता है:
सड्डू का ‘ट्विन पैलेस’ और ठाठ-बाठ
बंगलों का ‘डबल डोज’: रायपुर के पॉश इलाके सड्डू के ’अविनाश कैपिटल होम्स (फेज-2)’ में साहब का जलवा है। वहाँ उनका ग्राउंड प्लस वन (G+1) का आलीशान बंगला तो है ही, लेकिन साहब को आस-पड़ोस की दखलंदाज़ी बिल्कुल पसंद नहीं थी। इसलिए “निजता और सुकून” का ध्यान रखते हुए उन्होंने बगल वाला बंगला भी खुद (परिवार के नाम) खरीद कर अपने साम्राज्य में मिला लिया है। अब वहां सिर्फ साहब का ही एकछत्र राज है।
सफेद ‘रथ’: साहब के रुतबे को सूट करने वाली चमचमाती सफेद रंग की XUV 700 (टॉप मॉडल)
हमेशा उनके दरवाजे पर तैनात रहती है, जिसकी कीमत लगभग 25 लाख रुपये है। यह सरकारी गाड़ी से इतर उनकी निजी पारिवारिक सवारी है।
सैलरी बनाम स्कूल फीस का ‘चमत्कार’:
साहब के दो लाडले रायपुर के दो अलग-अलग बेहद नामी और महंगे स्कूलों में पढ़ते हैं। गणितज्ञ आज तक हैरान हैं कि इन दोनों बच्चों की सालाना स्कूल फीस, साहब के पूरे साल के आधिकारिक वेतन (सैलरी) के बराबर बैठती है। अब बिना सैलरी के घर का खर्च और बाकी ऐशो-आराम कैसे चलता है, यह तो साहब का ‘ऊपरी ज्ञान’ ही बता सकता है।
रायपुर से विदाई और नए जिले में ‘जैकपॉट’
लॉटरी सी पोस्टिंग: रायपुर में मलाईदार पोस्टिंग काटने के बाद, साहब की सीधे राज्य के एक नवनिर्मित (नए बने) जिले में बड़ी जिम्मेदारी के साथ रवानगी हुई। नया जिला क्या मिला, मानो साहब को ‘अलादीन का चिराग’ ही मिल गया।
जमीन प्रेम का नया अध्याय:
नए जिले में कदम रखते ही साहब का ‘लैंड-लव’ (जमीन प्रेम) फिर जाग उठा। उन्होंने वहां आते ही अपने रसूख का इस्तेमाल कर करोड़ों की महंगी-महंगी जमीनें और बेनामी संपत्तियां अपने और परिवार के नाम पर जमा करना शुरू कर दिया।
‘महान कारनामा’: नवनिर्मित जिले में भर्ती घोटाला
यह साहब की कहानी का सबसे ‘चमकीला’ अध्याय है। नए जिले में प्रशासनिक व्यवस्था बनाने के बजाय, साहब ने उसे अपनी ‘कमाई का नया कुरुक्षेत्र’ बना लिया।
भर्ती फैक्ट्री: साहब ने जिले की कमान संभालते ही वहां एक बहुत बड़ा भर्ती घोटाला अंजाम दे डाला! बेरोजगार युवाओं की उम्मीदों और मजबूरी का भरपूर “फायदा” उठाया गया।
नियमों की बलि: सरकारी नौकरियों की बंदरबांट की गई, सभी नियमों और कायदों को ताक पर रख दिया गया।
अयोग्यता को ‘इनाम’: “चमकीले लिफाफों” और “मोटी रकम” के बदले अयोग्य लोगों को सरकारी कुर्सियां बांट दी गईं, जबकि योग्य उम्मीदवार अपनी डिग्रियां लेकर दर-दर भटकते रह गए।
साहब पर एक तीखा और करारा कटाक्ष (व्यंग्य)
“वाह रे साहब का अर्थशास्त्र! अब जाकर समझ में आया कि जब सालभर की पूरी आधिकारिक तनख्वाह बच्चों की स्कूल फीस में ही स्वाहा हो जाती है, तो फिर सड्डू के दो-दो बंगलों का मेंटेनेंस कैसे होता है, दरवाजे पर 25 लाख की सफेद XUV कैसे खड़ी होती है और नए जिले में करोड़ों की जमीनें कैसे खरीदी जाती हैं!
दरअसल, साहब के लिए नवनिर्मित जिला कोई प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि ‘भर्ती सेल’ और ‘रियल एस्टेट’ का एक सुनहरा अवसर साबित हुआ। वहां जाते ही साहब ने बेरोजगार युवाओं के सपनों का ऐसा क्रूर सौदा किया कि नियम-कायदे भी शर्म से पानी-पानी हो गए।
एक तरफ योग्य युवाओं की उम्मीदों का गला घोंटकर ‘भर्ती घोटाला’ अंजाम दिया जा रहा था, तो दूसरी तरफ उसी पाप की कमाई से नए जिले की महंगी जमीनों पर साहब का बेनामी साम्राज्य खड़ा हो रहा था।
धन्य हैं ऐसे अफसर और धन्य है उनकी ये ‘लीला’! नया जिला तो जनता की सहूलियत के लिए बना था, पर साहब ने उसे अपनी तिजोरी भरने का ‘लॉन्चिंग पैड’ बना लिया। सच है, जब रक्षक ही भक्षक बनकर ‘भर्ती सेल’ खोल दे, तो फिर साहब की किस्मत को ‘टॉप गियर’ में जाने से भला कौन रोक सकता है!”


