(आलेख : बादल सरोज)
वे जब भी सामने आते हैं, कुछ ऐसा करते हैं जो चौंकाने वाला हो। कभी किसी नए अंदाज में दिखाई देते हैं, कभी किसी नए प्रतीक के साथ। कभी तालियां बजवाते हैं, कभी थालियां, कभी मोमबत्ती जलवाते हैं और कभी ऐसे फैसले सामने रखते हैं जो सीधे देश की जनता के जीवन को प्रभावित करते हैं। नोटबंदी से शुरू हुई राजनीतिक और आर्थिक प्रयोगों की यह यात्रा अब जनता के दैनिक जीवन और उपभोग तक पहुंच चुकी है।
लेखक का कहना है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव खत्म होते ही केंद्र सरकार की ओर से आर्थिक बोझ बढ़ाने वाले संकेत मिलने लगे। कमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमतों में भारी बढ़ोतरी के बाद अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जनता से पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग बढ़ाने, वर्क फ्रॉम होम अपनाने, सोना खरीदने से बचने, विदेश यात्रा कम करने, खाद और उर्वरकों का सीमित उपयोग करने तथा स्वदेशी वस्तुओं के इस्तेमाल पर जोर देने की अपील को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है।

जनता से संयम की अपील और दूसरी ओर लगातार रोड शो पर उठे सवाल
लेख में प्रधानमंत्री के हालिया रोड शो और सार्वजनिक कार्यक्रमों का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया गया है कि एक ओर जनता से ईंधन बचाने की अपील की जा रही है, वहीं दूसरी ओर बड़े पैमाने पर रोड शो, सुरक्षा काफिले और सार्वजनिक आयोजनों में भारी मात्रा में संसाधनों का उपयोग हो रहा है। लेखक ने हैदराबाद, जामनगर, सोमनाथ और वडोदरा के कार्यक्रमों का जिक्र करते हुए कहा है कि इन आयोजनों में बड़ी संख्या में वाहन, सुरक्षा संसाधन और सार्वजनिक व्यवस्था का इस्तेमाल हुआ।
लेख में यह भी कहा गया है कि सोमनाथ मंदिर की 75वीं वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रमों और एयर शो जैसे आयोजनों के दौरान हजारों लोगों की मौजूदगी रही, जबकि आम नागरिकों को ईंधन बचत और खर्च में कटौती की सलाह दी जा रही है।
विदेशी दौरों और सरकारी खर्चों को लेकर भी उठाए गए सवाल
लेखक ने प्रधानमंत्री की प्रस्तावित विदेश यात्राओं का उल्लेख करते हुए कहा है कि जब जनता से विदेश यात्रा कम करने और खर्च नियंत्रित करने की अपील की जा रही है, तब शीर्ष स्तर पर सरकारी यात्राएं और बड़े आयोजन जारी हैं। लेख में इसे आम जनता और सत्ता प्रतिष्ठान के बीच बढ़ती दूरी का उदाहरण बताया गया है।
तेल संकट, विदेश नीति और रणनीतिक भंडारण पर सरकार की आलोचना
आलेख में ईरान और रूस से तेल आयात से जुड़े मुद्दों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय दबावों के कारण सस्ते तेल आपूर्ति विकल्पों को सीमित किया। लेखक का आरोप है कि इसका असर देश की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिति पर पड़ा है।
रणनीतिक तेल भंडारण क्षमता को लेकर भी लेख में चिंता व्यक्त की गई है। चीन, अमेरिका और जापान जैसे देशों के मुकाबले भारत की सीमित भंडारण क्षमता का जिक्र करते हुए लेखक ने कहा है कि देश की जरूरतों के हिसाब से पर्याप्त तैयारी नहीं की गई। लेख में यह भी आरोप लगाया गया है कि बीते वर्षों में निजी कॉर्पोरेट हितों को प्राथमिकता दी गई, जबकि राष्ट्रीय भंडारण क्षमता बढ़ाने पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया।
‘वर्क फ्रॉम होम’ और खेती से जुड़े सुझावों पर भी सवाल
लेख में प्रधानमंत्री द्वारा वर्क फ्रॉम होम और प्राकृतिक खेती जैसे सुझावों को लेकर भी आलोचना की गई है। लेखक का कहना है कि भारत की बड़ी आबादी प्रत्यक्ष श्रम आधारित कार्यों में लगी हुई है, जहां घर से काम करना व्यावहारिक नहीं है। छोटे व्यापार, उत्पादन, परिवहन और खेती जैसे क्षेत्रों में प्रत्यक्ष उपस्थिति अनिवार्य होती है।
प्राकृतिक खेती और उर्वरकों के सीमित उपयोग की सलाह को लेकर लेखक ने श्रीलंका के उदाहरण का उल्लेख करते हुए कहा है कि बिना पर्याप्त तैयारी के ऐसे प्रयोग कृषि क्षेत्र को प्रभावित कर सकते हैं।
बढ़ते असंतोष, मजदूर आंदोलनों और राजनीतिक माहौल पर टिप्पणी
लेख में यह भी कहा गया है कि आर्थिक दबाव और बढ़ती महंगाई के बीच जनता में असंतोष बढ़ सकता है। लेखक ने मजदूर आंदोलनों, हड़तालों और राजनीतिक विरोध की संभावनाओं का जिक्र करते हुए कहा है कि सरकार आलोचना और विरोध के प्रति अधिक असहज दिखाई देती है।
लेख के अंत में प्रधानमंत्री की कार्यशैली पर तीखी टिप्पणी
आलेख के अंतिम हिस्से में लेखक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली और सार्वजनिक बयानों पर तीखी राजनीतिक टिप्पणी की है। लेख में ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों की तुलना पूर्व शासकों से की गई है।
लेखक का निष्कर्ष है कि मौजूदा आर्थिक और राजनीतिक हालात में जनता पर बढ़ते बोझ, महंगाई और संसाधनों की चुनौतियों के बीच सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।)


