छत्तीसगढ़ की धरती पर गोंडवाना की विरासत, राजा रघुराज सिंह स्टेडियम से बूढ़ातालाब तक इतिहास की कहानी

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ऐतिहासिक धरोहरों में दर्ज है गोंड राजवंश की भूमिका, संरक्षण और पहचान को लेकर उठ रहे सवाल

रायपुर/बिलासपुर। छत्तीसगढ़ का इतिहास केवल राजमहलों और युद्धों तक सीमित नहीं है। यहां मौजूद पुराने तालाब, किले, मंदिर और अन्य संरचनाएं भी बीते दौर की सामाजिक व्यवस्था, जल प्रबंधन और सांस्कृतिक परंपराओं की कहानी कहती हैं। ऐसी ही ऐतिहासिक विरासतों में बिलासपुर का राजा रघुराज सिंह स्टेडियम और रायपुर का बूढ़ातालाब प्रमुख हैं, जिन्हें गोंडवाना कालीन इतिहास से जोड़कर देखा जाता है।

हालांकि इन स्थलों से जुड़े कई ऐतिहासिक दावों पर अलग-अलग मत मिलते हैं। ऐसे में इनके इतिहास को दस्तावेजों, स्थानीय परंपराओं और उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर समझना जरूरी है।

राजा रघुराज सिंह स्टेडियम: खेल के साथ जुड़ी रियासत की पहचान

बिलासपुर शहर में स्थित राजा रघुराज सिंह स्टेडियम लंबे समय से खेल गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। इस मैदान का नाम पंडरिया क्षेत्र के राजा रघुराज सिंह जगत से जोड़ा जाता है। स्थानीय इतिहास में जगत राजवंश को क्षेत्र के पुराने राजघरानों में गिना जाता है।

इस मैदान ने क्रिकेट के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यहां 1978 से 1990 के बीच रणजी ट्रॉफी के मुकाबले आयोजित हुए। समय के साथ खेल सुविधाओं के आधुनिकीकरण की मांग उठती रही और फ्लड लाइट की आवश्यकता भी लंबे समय से महसूस की जाती रही।

अब हाई-मास्ट लाइटों जैसी सुविधाओं के जुड़ने से इस ऐतिहासिक खेल मैदान को आधुनिक रूप देने की दिशा में कदम बढ़ाए गए हैं।

जगत राजवंश का ऐतिहासिक संदर्भ

पंडरिया-कवर्धा क्षेत्र के जगत राजवंश को लेकर स्थानीय इतिहास और परंपराओं में अलग-अलग विवरण मिलते हैं। इनमें राय सिंह जगत और उनके वंश की भूमिका का उल्लेख किया जाता है। इसी परंपरा में आगे चलकर पंडरिया और कवर्धा क्षेत्र में राजपरिवार के प्रभाव का विस्तार बताया जाता है।

जगत परिवार से जुड़े कई नाम क्षेत्रीय इतिहास और सार्वजनिक जीवन में उल्लेखित रहे हैं। इनमें रानी मानकुमारी देवी जगत और महाराज विश्वराज प्रताप सिंह जगत जैसे नाम प्रमुख हैं।

बूढ़ातालाब: रायपुर के इतिहास में जल संरचना की पहचान

राजधानी रायपुर का बूढ़ातालाब यानी बूढ़ापारा क्षेत्र का ऐतिहासिक जलाशय शहर की पुरानी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्थानीय इतिहास और जनश्रुतियों में इस तालाब के निर्माण को गोंड शासक रायसिंह जगत से जोड़ा जाता है।

मान्यता है कि पुराने समय में यह जल संरचना केवल पानी के स्रोत के रूप में नहीं, बल्कि स्थानीय आबादी और सैन्य जरूरतों के लिए भी महत्वपूर्ण थी। तालाब के निर्माण से जुड़ी कथाओं में बड़ी संख्या में लोगों के श्रम का उल्लेख मिलता है।

बूढ़ादेव से जुड़ी आस्था

बूढ़ातालाब के नाम को लेकर स्थानीय गोंडी परंपरा में बूढ़ादेव या बड़ादेव की आस्था का उल्लेख मिलता है। आदिवासी समाज में बड़ादेव को महत्वपूर्ण आराध्य माना जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार तालाब और आसपास के क्षेत्र के नाम का संबंध इसी धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा से जोड़ा जाता है।

इसी वजह से कुछ सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों का मानना है कि बूढ़ातालाब की पहचान को केवल आधुनिक नाम तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इससे जुड़ी पुरानी स्थानीय और आदिवासी परंपराओं को भी सामने लाया जाना चाहिए।

नाम और विरासत को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण

बूढ़ातालाब को वर्तमान समय में स्वामी विवेकानंद सरोवर के नाम से भी जाना जाता है। वहीं स्थानीय इतिहास और गोंडवाना समाज से जुड़े लोगों का एक वर्ग इसके पुराने नाम और सांस्कृतिक इतिहास को अधिक प्रमुखता देने की मांग करता रहा है।

यह बहस केवल नाम की नहीं, बल्कि ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने और आने वाली पीढ़ियों तक स्थानीय इतिहास पहुंचाने से भी जुड़ी है।

इतिहास को दस्तावेजों के साथ समझने की जरूरत

रायपुर, बिलासपुर और कवर्धा सहित छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में प्राचीन जल संरचनाएं और सांस्कृतिक स्थल मौजूद हैं। इनमें से कई स्थलों के निर्माण और इतिहास को लेकर स्थानीय परंपराएं और जनश्रुतियां प्रचलित हैं।

ऐसे में इन धरोहरों के इतिहास को प्रमाणित अभिलेखों, पुरातात्विक अध्ययन और स्थानीय मौखिक परंपराओं के समन्वय से सामने लाना जरूरी है। इससे न केवल छत्तीसगढ़ के इतिहास की बेहतर समझ विकसित होगी, बल्कि गोंडवाना और आदिवासी समाज के सांस्कृतिक योगदान को भी उचित स्थान मिल सकेगा।

अभिषेक कुमार पाण्डेय
रिपोर्टर, बिलासपुर छत्तीसगढ़

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