तीजन बाई : एक जीवंत महाभारत थीं — जयंत थोरात

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गनियारी की बेटी से विश्व मंच तक का सफर, पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई के निधन से कला जगत में शोक की लहर

रायगढ़। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्व पटल पर पहचान दिलाने वाली पंडवानी की महान लोकगायिका पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई के निधन पर पूरे कला जगत में शोक की लहर है। उनके निधन पर भूतपूर्व डीआईजी एवं वरिष्ठ साहित्यकार जयंत कुमार थोरात ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि “तीजन बाई एक जीवंत महाभारत थीं। उनके जाने से छत्तीसगढ़ ने अपनी सबसे बड़ी सांस्कृतिक पहचान खो दी है। यह क्षति अपूरणीय है।”

संघर्ष से शिखर तक पहुंचने की प्रेरक कहानी

जयंत थोरात ने कहा कि सफलता केवल साधन-संपन्न लोगों की नहीं होती, बल्कि प्रतिभा, संघर्ष और दृढ़ इच्छाशक्ति रखने वाला व्यक्ति हर ऊंचाई हासिल कर सकता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण डॉ. तीजन बाई थीं।

8 अगस्त 1956 को पारधी जनजाति के एक साधारण परिवार में ग्राम गनियारी में जन्मी तीजन बाई के पिता चुनुक पारधी और माता सुखवती पारधी थे। बचपन से ही उन्हें पंडवानी गायन में रुचि थी। उनके नाना बृजलाल पारधी उनके पहले गुरु बने, जबकि बाद में उन्होंने उमेश सिंह देशमुख से विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त किया।

हबीब तनवीर ने दिलाई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान

जयंत थोरात ने बताया कि प्रख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर ने तीजन बाई की असाधारण प्रतिभा को पहचानकर उन्हें राष्ट्रीय मंच दिलाया। उनके प्रयासों से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समक्ष उनकी प्रस्तुति हुई, जिसके बाद उनका सफर लगातार आगे बढ़ता गया।

इसके बाद उन्होंने इंग्लैंड, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, ट्यूनीशिया, रोमानिया सहित अनेक देशों में पंडवानी की प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।

सम्मानों से सजा गौरवपूर्ण जीवन

डॉ. तीजन बाई को उनके अतुलनीय योगदान के लिए अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया—

  • 1988 – पद्मश्री
  • 1995 – संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
  • 2003 – पद्मभूषण एवं बिलासपुर विश्वविद्यालय से डी.लिट.
  • 2007 – नृत्य शिरोमणि पुरस्कार
  • 2016 – एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी पुरस्कार
  • 2019 – पद्म विभूषण

“उनकी आवाज हमेशा गूंजती रहेगी”

जयंत थोरात ने कहा कि महान कलाकार शारीरिक रूप से भले इस दुनिया से विदा हो जाते हैं, लेकिन उनकी कला अमर रहती है। उन्होंने कहा, “डॉ. तीजन बाई आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी पंडवानी, उनकी आवाज और उनकी अमूल्य सांस्कृतिक विरासत सदैव आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेगी। कला जगत हमेशा उनका ऋणी रहेगा।”

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