प्रदेशभर में ‘आशीर्वाद’ कार्यक्रम पर व्यंग्य, सवाल—दीयों की रोशनी से बदलेगी तस्वीर या बुनियादी जरूरतों पर भी होनी चाहिए चर्चा?
रायपुर। 17 सितंबर की शाम छत्तीसगढ़ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर आयोजित ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम ने प्रदेशभर में अलग-अलग तस्वीरें पेश कीं। राजधानी रायपुर से लेकर बस्तर और सरगुजा तक दीप जलाए गए। सरकारी स्तर पर इसे जनभागीदारी और सेवा-संकल्प से जोड़कर प्रस्तुत किया गया।
लेकिन व्यंग्य की नजर से देखें तो सवाल यह भी उठता है कि क्या हजारों-लाखों दीयों की रोशनी उन घरों तक पहुंच सकती है, जहां आज भी पक्की छत, बेहतर सड़क, स्वास्थ्य सुविधा और दूसरी बुनियादी जरूरतों का इंतजार है?
डेढ़ करोड़ दीये और खर्च का सवाल
कार्यक्रम से जुड़े आंकड़ों में प्रदेशभर में करीब डेढ़ करोड़ दीये जलाए जाने की बात सामने आई। इतनी बड़ी संख्या में दीयों के लिए तेल, बाती, दीये और आयोजन से जुड़ी व्यवस्थाओं पर खर्च हुआ होगा।
सोशल मीडिया पर घूम रहे कुछ आकलनों में तेल और अन्य सामग्री की कीमतों को जोड़कर कई करोड़ रुपये का अनुमान लगाया जा रहा है। हालांकि इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि अलग से जरूरी है।
यही वह जगह है जहां व्यंग्य अपना सवाल पूछता है—अगर करोड़ों रुपये के बराबर संसाधन किसी बड़े आयोजन में खर्च होते हैं, तो क्या उसी ऊर्जा और संसाधन का कुछ हिस्सा उन परिवारों तक नहीं पहुंचना चाहिए, जिनके लिए आज भी पक्की छत एक सपना है?
एक दीया बनाम एक पक्की छत
एक तरफ चौराहों पर रोशनी से जगमगाते आयोजन हैं और दूसरी तरफ बारिश में टपकती छतों वाले घर।
यही विरोधाभास इस पूरे आयोजन को व्यंग्य का विषय बना देता है। दीया कुछ घंटों में बुझ जाता है, जबकि एक मजबूत छत किसी परिवार को वर्षों तक बारिश, धूप और आंधी से बचा सकती है।
सवाल यह नहीं कि दीया क्यों जलाया गया। सवाल यह है कि क्या उत्सव की रोशनी के साथ विकास की रोशनी भी उन घरों तक पहुंच रही है, जहां उसकी सबसे ज्यादा जरूरत है?
‘जनभागीदारी’ पर भी उठता सवाल
कार्यक्रम को जनभागीदारी से जोड़ना एक सकारात्मक पहल के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन व्यंग्यकार के लिए यहां भी एक सवाल खड़ा होता है—अगर आम नागरिक खुद दीया, तेल और बाकी सामग्री जुटाकर सरकारी अभियान में हिस्सा ले रहा है, तो क्या उसके जीवन की मूल समस्याओं पर भी उतनी ही सामूहिक ऊर्जा दिखाई दे रही है?
जिस परिवार के पास घर की मरम्मत के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है, उसके सामने एक तरफ उत्सव में योगदान देने की अपेक्षा और दूसरी तरफ रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च—यह विरोधाभास अपने आप में बड़ा सवाल है।
ड्रोन कैमरे की रोशनी और गांव की अंधेरी गली
आज के दौर में किसी भी बड़े आयोजन की सफलता सिर्फ मैदान में मौजूद भीड़ से नहीं, बल्कि कैमरे और सोशल मीडिया की तस्वीरों से भी मापी जाने लगी है।
डेढ़ करोड़ दीयों का दृश्य निश्चित तौर पर कैमरे के लिए शानदार हो सकता है। ड्रोन से लिया गया दृश्य सोशल मीडिया पर आकर्षण पैदा कर सकता है। लेकिन कैमरा जब आसमान से नीचे उतरकर किसी गरीब के घर की टपकती छत पर ठहरेगा, तब तस्वीर शायद उतनी चमकदार नहीं होगी।
दीया कुछ घंटे की रोशनी देता है, मकान वर्षों की सुरक्षा।
यही अंतर इस व्यंग्य की सबसे बड़ी विडंबना है।
असली ‘संकल्प’ किसे कहा जाए?
अगर किसी अभियान का नाम ‘सेवा संकल्प’ है, तो व्यंग्य का अगला सवाल स्वाभाविक है—संकल्प सिर्फ रोशनी फैलाने का हो या उन समस्याओं को दूर करने का भी, जिनके कारण लाखों लोगों का जीवन अब भी कठिन है?
गरीब परिवार के लिए पक्की छत, बच्चों की अच्छी शिक्षा, इलाज की सुविधा, रोजगार और सुरक्षित सड़कें भी उतनी ही जरूरी हैं जितनी किसी आयोजन में जलने वाला दीपक।
इसलिए सवाल दीयों के खिलाफ नहीं है। सवाल प्राथमिकताओं का है।
रोशनी रहे, लेकिन सवाल भी जलते रहें
उत्सव मनाना, दीप जलाना और सामूहिक कार्यक्रम आयोजित करना लोकतांत्रिक समाज में सामान्य सामाजिक गतिविधियां हैं। लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछना भी उतना ही जरूरी है।
चौराहों पर जलते डेढ़ करोड़ दीयों की रोशनी अगर प्रदेश की तस्वीर बदलने का प्रतीक है, तो उम्मीद यही होनी चाहिए कि यह रोशनी उन घरों तक भी पहुंचे जहां आज पक्की छत का इंतजार है।
क्योंकि आखिरकार—
दीये की लौ कुछ घंटे चमकती है, लेकिन अच्छी व्यवस्था की रोशनी पीढ़ियों तक दिखाई देती है।
क्रमशः… भाग-2 में इसी अभियान के दावों, खर्च और जमीनी तस्वीर के बीच के अंतर पर सवालों की पड़ताल।


