अभिषेक कुमार पाण्डेय, रिपोर्टर
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
टीकाकरण और नसबंदी की जानकारी होगी डिजिटल, मालिकों की पहचान और पशुओं की निगरानी से व्यवस्था मजबूत करने की तैयारी
नई दिल्ली। सड़कों पर घूमने वाले आवारा पशुओं और कुत्तों की पहचान, टीकाकरण, नसबंदी तथा निगरानी को अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए तकनीक के इस्तेमाल पर जोर बढ़ रहा है। प्रस्तावित डिजिटल व्यवस्था में पशुओं को यूनिक डिजिटल पहचान से जोड़ने की दिशा में काम किया जा सकता है। माइक्रोचिप, क्यूआर कोड और स्मार्ट कॉलर जैसी तकनीकों के जरिए संबंधित पशु का रिकॉर्ड डिजिटल रूप से उपलब्ध कराने की अवधारणा सामने आई है।
एक स्कैन पर सामने आ सकेगा पशु का रिकॉर्ड
डिजिटल पहचान व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी पशु के टीकाकरण, नसबंदी और उपचार जैसी जानकारियों का रिकॉर्ड एक जगह उपलब्ध रहे। स्कैनर या मोबाइल के माध्यम से पहचान होने पर संबंधित पशु की मेडिकल हिस्ट्री और किए गए उपचार का विवरण देखा जा सकेगा।
ऐसी व्यवस्था लागू होने से एक ही पशु के नाम पर बार-बार टीकाकरण या नसबंदी दर्शाकर रिकॉर्ड तैयार करने जैसी अनियमितताओं पर निगरानी मजबूत हो सकती है।
डॉग बाइट और आक्रामक व्यवहार की निगरानी में मदद
डिजिटल रिकॉर्ड के जरिए ऐसे कुत्तों की पहचान और निगरानी में भी मदद मिल सकती है, जिनके आक्रामक व्यवहार या लोगों को काटने की शिकायतें सामने आती हैं। शिकायतों और उपचार संबंधी जानकारी को रिकॉर्ड से जोड़कर संबंधित प्रशासनिक एजेंसियां आगे की कार्रवाई तय कर सकती हैं।
सड़क पर छोड़े गए पशुओं के मालिकों तक पहुंचने में मदद
अक्सर पालतू या दुधारू पशुओं को किसी कारण से सड़कों पर छोड़ दिए जाने की शिकायतें सामने आती हैं। यदि पशु की पहचान उसके मालिक से डिजिटल रूप से जुड़ी हो, तो ऐसे मामलों में मालिक तक पहुंचना आसान हो सकता है। नियमों के तहत कार्रवाई और जुर्माने की प्रक्रिया में भी यह व्यवस्था सहायक साबित हो सकती है।
हाईवे पर मवेशियों की निगरानी की उम्मीद
सड़कों और हाईवे पर मवेशियों की मौजूदगी दुर्घटनाओं का कारण बनती है। स्मार्ट कॉलर या अन्य निगरानी तकनीक का इस्तेमाल उन क्षेत्रों की पहचान में मदद कर सकता है, जहां पशु बार-बार सड़क पर पहुंचते हैं। इससे स्थानीय प्रशासन और पशु संरक्षण दल समय रहते उन्हें सुरक्षित स्थान या शेल्टर तक पहुंचाने की कार्रवाई कर सकते हैं।
असली चुनौती जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन
तकनीक आधारित व्यवस्था से पशु प्रबंधन में पारदर्शिता बढ़ाने की उम्मीद है, लेकिन इसकी सफलता बड़े पैमाने पर प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। बड़ी संख्या में आवारा पशुओं की पहचान करना, रिकॉर्ड को लगातार अपडेट रखना, तकनीकी ढांचे को सुचारु बनाए रखना और स्थानीय स्तर पर निगरानी सुनिश्चित करना बड़ी चुनौती होगी।
यदि डिजिटल पहचान और निगरानी व्यवस्था को पारदर्शी तरीके से लागू किया जाता है, तो इससे पशु कल्याण के साथ-साथ सड़क सुरक्षा और नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्थाओं को भी मजबूती मिल सकती है।




