रायपुर/बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में Right to Education (RTE) के तहत गरीब बच्चों के दाखिले में हो रही देरी और लापरवाही पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शनिवार को छुट्टी के बावजूद विशेष सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने स्वतः संज्ञान लिया और शिक्षा विभाग से जवाब तलब किया।
हजारों आवेदन लंबित, बच्चों का भविष्य अधर में
कोर्ट ने कहा कि नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने के बाद भी बड़ी संख्या में आवेदन लंबित हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार—
- कुल आवेदन: 38,438
- सत्यापित: 23,766 (करीब 62%)
- लंबित: 16,000 से अधिक
कई जिलों में सत्यापन की स्थिति 10% से भी कम बताई गई, जिसे अदालत ने गंभीर चिंता का विषय माना।
तय समयसीमा खत्म, प्रक्रिया अधूरी
लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) ने 16 फरवरी से 31 मार्च तक पंजीकरण और सत्यापन की समयसीमा तय की थी, लेकिन समय बीतने के बाद भी प्रक्रिया अधूरी है।
नोडल प्राचार्यों की धीमी कार्यप्रणाली के कारण पूरी एडमिशन प्रक्रिया प्रभावित हो रही है, जिससे 13 से 17 अप्रैल के बीच प्रस्तावित लॉटरी प्रक्रिया में भी देरी की आशंका बढ़ गई है।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, विभाग को निर्देश
अदालत ने टिप्पणी की कि सत्यापन में देरी से अभिभावकों को बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, जो बेहद परेशान करने वाला है।
कोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग के संयुक्त सचिव को निर्देश दिए हैं कि—
- अब तक की कार्रवाई की पूरी जानकारी दें
- स्थिति स्पष्ट करें
- नया हलफनामा प्रस्तुत करें
अगली सुनवाई 8 अप्रैल को
हालांकि मामला पहले से 8 अप्रैल 2026 को सूचीबद्ध था, लेकिन बच्चों के भविष्य को देखते हुए कोर्ट ने पहले ही सुनवाई की। अब इस मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 8 अप्रैल को होगी।
क्या है बड़ा संदेश
हाईकोर्ट की इस सख्ती ने साफ कर दिया है कि RTE Admission Process में लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि सरकार कितनी तेजी से प्रक्रिया पूरी कर पाती है और हजारों बच्चों का भविष्य सुरक्षित होता है।
