पुराने FDR मामले के बाद अब नए भुगतान को लेकर चर्चाएं तेज, कार्य की गुणवत्ता और भौतिक सत्यापन पर सवाल
बिलासपुर। स्मार्ट सिटी और नगर निगम से जुड़े ठेका कार्यों में वित्तीय प्रक्रियाओं को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। करीब 1.40 करोड़ रुपये के FDR, सिक्योरिटी डिपॉजिट (SD) और रॉयल्टी से जुड़े भुगतान को लेकर यह सवाल सामने आया है कि वर्षों से लंबित मामला अचानक जुलाई के अंतिम दिनों और अगस्त के शुरुआती दौर में किस प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ा।

मामले को लेकर आरोप लगाए जा रहे हैं कि संबंधित ठेका फर्म के भुगतान से पहले कार्यों की गुणवत्ता, पूर्णता और भौतिक सत्यापन की प्रक्रिया किस स्तर पर हुई। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है और पूरे मामले की वास्तविक स्थिति संबंधित दस्तावेजों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
पैकेज टेंडर और पेटी ठेकेदारी को लेकर भी सवाल
मामला पूर्व कार्यकाल में शुरू हुए विभिन्न विकास कार्यों के पैकेज टेंडर से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोप है कि बड़े पैकेज एक फर्म को दिए गए और बाद में काम पेटी ठेकेदारों के माध्यम से कराया गया।

स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप सामने आए हैं कि कुछ कार्यों में निर्माण की गुणवत्ता को लेकर शिकायतें हुईं और सड़क तथा नाली जैसे कार्यों में निर्माण के बाद ही खराबी दिखाई देने लगी। इन दावों की पुष्टि के लिए संबंधित कार्यों की तकनीकी जांच और भुगतान से जुड़े दस्तावेजों का परीक्षण आवश्यक है।
1.40 करोड़ के भुगतान को लेकर सबसे बड़ा सवाल
मामले में सबसे अहम सवाल यह है कि यदि किसी ठेकेदार के कार्य को निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं माना गया था अथवा कार्य समय पर पूरा नहीं हुआ था, तो उसकी FDR और अन्य जमानत राशि को लेकर क्या कार्रवाई की गई?
यदि भुगतान नियमों के अनुरूप हुआ है तो संबंधित विभाग के पास उसकी पूरी प्रक्रिया, सक्षम अधिकारी की स्वीकृति, तकनीकी रिपोर्ट और भौतिक सत्यापन के दस्तावेज मौजूद होने चाहिए। यही दस्तावेज इस पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकते हैं।
वर्षों बाद किस आधार पर हुआ सत्यापन?
मामले से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण प्रश्न कार्यों के भौतिक सत्यापन को लेकर है। वर्षों पुराने कार्यों के संबंध में अधिकारियों और इंजीनियरों द्वारा दी गई रिपोर्ट किस आधार पर तैयार की गई, यह जांच का विषय है।
यदि कार्य स्थल पर दोबारा निरीक्षण किया गया तो उसकी तारीख, निरीक्षण करने वाले अधिकारी, तकनीकी रिपोर्ट और मौके की स्थिति से संबंधित रिकॉर्ड सार्वजनिक होने पर स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।
पुराने FDR मामले के बाद फिर उठे सवाल
बिलासपुर नगर निगम और स्मार्ट सिटी से जुड़े पूर्व FDR प्रकरण को लेकर पहले भी राजनीतिक और सार्वजनिक स्तर पर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में करीब 1.40 करोड़ रुपये के नए भुगतान की चर्चा ने एक बार फिर निगम की वित्तीय कार्यप्रणाली और ठेका प्रबंधन को लेकर बहस तेज कर दी है।
जनता के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि किसी पुराने मामले में जांच की मांग की गई थी, तो संबंधित मामलों में प्रशासनिक स्तर पर क्या कार्रवाई हुई और वर्तमान में भुगतान से पहले किन नियमों का पालन किया गया।
नगर निगम आयुक्त ने कहा—दस्तावेज देखकर ही बता पाऊंगा
इस मामले में नगर निगम आयुक्त प्रकाश कुमार सर्वे से भुगतान और वर्षों से लंबित फाइल को लेकर सवाल किया गया। इस पर उन्होंने कहा कि वे दस्तावेज देखने के बाद ही इस संबंध में जानकारी दे पाएंगे।
आयुक्त का यह बयान मामले में दस्तावेजों की भूमिका को महत्वपूर्ण बनाता है। अब यह देखना होगा कि संबंधित फाइल में भुगतान की स्वीकृति, तकनीकी परीक्षण, भौतिक सत्यापन और FDR/SD से जुड़ी पूरी प्रक्रिया क्या दर्ज है।
जांच और दस्तावेज सार्वजनिक होने से साफ होगी तस्वीर
करीब 1.40 करोड़ रुपये के भुगतान से जुड़े सवालों का जवाब आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड और तकनीकी दस्तावेजों से ही सामने आ सकता है। यदि भुगतान नियमानुसार हुआ है तो उसकी प्रक्रिया स्पष्ट रूप से सामने आनी चाहिए और यदि किसी स्तर पर अनियमितता हुई है तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
अब निगाह इस बात पर है कि संबंधित विभाग इस मामले में दस्तावेजों की जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाता है या नहीं।
अभिषेक कुमार पाण्डेय
रिपोर्टर, बिलासपुर छत्तीसगढ़


