National News: ‘कम्युनिस्ट-इस्लामिक साजिशों का हौवा’ लेख में एम.ए. बेबी ने RSS और सावरकर की विचारधारा पर उठाए सवाल

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अयोध्या विवाद, बाबरी मस्जिद विध्वंस, स्वतंत्रता आंदोलन और दो-राष्ट्र सिद्धांत का किया उल्लेख; लेख में कम्युनिस्टों की ऐतिहासिक भूमिका और धर्मनिरपेक्षता पर रखे विचार

नई दिल्ली। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के महासचिव और केरल के पूर्व शिक्षा मंत्री एम.ए. बेबी ने अपने लेख ‘कम्युनिस्ट-इस्लामिक साजिशों का हौवा’ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की विचारधारा, अयोध्या विवाद और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में विभिन्न संगठनों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। लेख में उन्होंने कम्युनिस्टों पर लगाए जाने वाले आरोपों को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बताते हुए इतिहास, धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक राजनीति के मुद्दों पर अपनी बात रखी है।

यह लेख आरएसएस के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइज़र’ के 11 अक्टूबर 2026 के अंक में प्रकाशित संपादकीय के संदर्भ में लिखा गया है। एम.ए. बेबी का आरोप है कि कम्युनिस्टों को मुस्लिम कट्टरपंथियों का सहयोगी बताने की कोशिश के जरिए आरएसएस अपनी राजनीतिक विचारधारा का बचाव करना चाहता है। ये लेखक के राजनीतिक विचार और दावे हैं।

अयोध्या विवाद और बाबरी मस्जिद विध्वंस का उल्लेख

एम.ए. बेबी ने लेख में कहा है कि कम्युनिस्ट मंदिर निर्माण के विरोधी नहीं रहे, बल्कि उनका विरोध मस्जिद तोड़कर मंदिर बनाने की राजनीति से रहा है। उनके अनुसार, अयोध्या में बाबरी मस्जिद स्थल पर मंदिर निर्माण का आंदोलन धार्मिक भावनाओं के साथ-साथ आरएसएस और भाजपा की राजनीतिक रणनीति से भी जुड़ा था।

लेख में नवंबर 2019 के सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि विवादित भूमि मंदिर निर्माण के लिए सौंपने के निर्णय के साथ अदालत ने 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का विध्वंस कानून का उल्लंघन माना था।

बेबी का तर्क है कि ऐतिहासिक दावों की जांच वैज्ञानिक साक्ष्यों और शोध के आधार पर होनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे शोध को साजिश बताना, इतिहास को किसी खास राजनीतिक विचारधारा के अनुरूप प्रस्तुत करने की कोशिश है।

धार्मिक कट्टरता के विरोध को किसी धर्म से दुश्मनी नहीं बताया

लेख में एम.ए. बेबी ने कहा है कि कम्युनिस्टों ने बहुसंख्यक सांप्रदायिकता के साथ-साथ मुस्लिम धार्मिक कट्टरता और खालिस्तानी अलगाववाद का भी विरोध किया है। उन्होंने पंजाब में खालिस्तानी उग्रवादियों के हाथों कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं और समर्थकों की हत्या तथा कश्मीर में अलगाववादियों के खिलाफ खड़े होने वाले साथियों की शहादत का उल्लेख किया।

शाह बानो मामले का हवाला देते हुए उन्होंने लिखा कि 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने तलाकशुदा मुस्लिम महिला को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता मांगने का अधिकार मान्य किया था। इसके बाद मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 को लेकर हुए विवाद में कम्युनिस्टों ने संकीर्ण धार्मिक नेतृत्व के दबाव का विरोध किया।

लेख में उनका कहना है कि किसी समुदाय के भीतर मौजूद कट्टरता की आलोचना उस पूरे समुदाय के खिलाफ होना नहीं है। इसी तरह जातिगत भेदभाव, अस्पृश्यता और पितृसत्ता का विरोध भी किसी धर्म के प्रति शत्रुता नहीं माना जाना चाहिए।

स्वतंत्रता संग्राम में कम्युनिस्टों की भूमिका पर जोर

एम.ए. बेबी ने लेख में कम्युनिस्ट नेताओं की स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका का उल्लेख किया है। उन्होंने माकपा के संस्थापक नेताओं के जेल जाने, ए.के. गोपालन द्वारा 15 अगस्त 1947 को कन्नूर जेल में राष्ट्रीय ध्वज फहराने और हरकिशन सिंह सुरजीत द्वारा 1932 में तिरंगा फहराने के लिए गिरफ्तारी का जिक्र किया।

इसके विपरीत, लेखक ने आरोप लगाया कि आरएसएस स्वतंत्रता आंदोलन से दूर रहा और उसने सांप्रदायिक लामबंदी पर अधिक ध्यान दिया। उन्होंने सावरकर की दया याचिका तथा 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के संदर्भों का उल्लेख करते हुए आरएसएस और हिंदू महासभा की ऐतिहासिक भूमिका पर सवाल उठाए हैं।

सावरकर, जिन्ना और दो-राष्ट्र सिद्धांत पर बहस

लेख का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हिंदू महासभा के पूर्व अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर और मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना के दो-राष्ट्र सिद्धांत से जुड़े विचारों पर केंद्रित है।

एम.ए. बेबी ने 1937 में सावरकर के उस वक्तव्य का हवाला दिया है, जिसमें भारत में हिंदू और मुस्लिम दो राष्ट्र होने की बात कही गई थी। लेख में 1940 में जिन्ना के समान विचारों और सावरकर की प्रतिक्रिया का भी उल्लेख है।

उन्होंने डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों को उद्धृत करते हुए तर्क दिया कि सावरकर और जिन्ना धार्मिक पहचान के आधार पर दो राष्ट्रों की अवधारणा पर सहमत थे, हालांकि दोनों के बीच उन राष्ट्रों के आपसी संबंधों और राजनीतिक व्यवस्था को लेकर मतभेद थे।

लेख में एम.एस. गोलवलकर की पुस्तक ‘We, or Our Nationhood Defined’ और 1947 में आरएसएस कार्यकर्ताओं को दिए गए उनके कथित संबोधन का भी संदर्भ दिया गया है।

आरएसएस पर धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने का आरोप

एम.ए. बेबी ने लेख के अंतिम हिस्से में आरएसएस और भाजपा की राजनीतिक विचारधारा की आलोचना करते हुए आरोप लगाया है कि यह विचारधारा भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक स्वरूप को बदलना चाहती है। उनके अनुसार, भारतीय संविधान के स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों की रक्षा के लिए धर्म और राज्य के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि भारत की विविधता को किसी एक धार्मिक पहचान के आधार पर परिभाषित करना लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चुनौती है। लेख में बाबरी मस्जिद विध्वंस को धार्मिक लामबंदी और संवैधानिक जिम्मेदारियों के बीच टकराव के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

लेख का निष्कर्ष: एम.ए. बेबी ने अपने लेख में आरएसएस पर कम्युनिस्टों के खिलाफ आरोपों के जरिए राजनीतिक ध्रुवीकरण करने का आरोप लगाया है। उन्होंने इतिहास, धार्मिक कट्टरता, स्वतंत्रता आंदोलन और धर्मनिरपेक्षता से जुड़े मुद्दों पर अपने तर्क रखते हुए भारत के बहुलतावादी और संवैधानिक स्वरूप की रक्षा पर जोर दिया है।

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