नागरिक सुरक्षा की आड़ में नागरिक शक्ति का सैन्यीकरण?

लोकतंत्र में स्वयंसेवा और सत्ता-समर्थित कैडर के बीच की महीन रेखा

लाल किले की प्राचीर से जब कोई प्रधानमंत्री राष्ट्र को संबोधित करता है, तो उसके शब्द केवल भाषण नहीं होते—वे आने वाले समय की नीति और राजनीति की दिशा का संकेत भी देते हैं। स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एक विशाल और आधुनिक सिविल डिफेंस स्वयंसेवी बल खड़ा करने की घोषणा इसी अर्थ में सामान्य प्रशासनिक घोषणा से आगे जाकर विचार की मांग करती है।

सरकार की दृष्टि में यह व्यवस्था देश को युद्ध, आपदा, आतंकवाद और अन्य आंतरिक-बाहरी चुनौतियों के समय तैयार रखने वाली नागरिक शक्ति है। इसमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती। संकट की घड़ी में प्रशिक्षित नागरिक स्वयंसेवकों का नेटवर्क प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण सहारा बन सकता है।

लेकिन लोकतंत्र में हर अच्छी मंशा के साथ एक जरूरी प्रश्न भी चलता है—उस शक्ति का इस्तेमाल कौन करेगा, किस सीमा तक करेगा और उसके ऊपर निगरानी किसकी होगी?

यहीं से बहस शुरू होती है।

सिविल डिफेंस या सत्ता के समानांतर नागरिक शक्ति?

भारत में सिविल डिफेंस की अपनी कानूनी और संस्थागत परंपरा है। 1968 का सिविल डिफेंस अधिनियम नागरिकों और संपत्ति को शत्रुतापूर्ण हमलों से बचाने तथा बाद में आपदा प्रबंधन से संबंधित कार्यों के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करता है।

अर्थात सिविल डिफेंस का मूल दर्शन रक्षा और राहत है, राजनीतिक दमन नहीं।

इसलिए यदि नई व्यवस्था भी इसी संवैधानिक मर्यादा के भीतर रहती है तो वह स्वागत योग्य है। लेकिन यदि “आंतरिक शत्रु” जैसे व्यापक शब्दों का अर्थ सरकार की आलोचना करने वाले नागरिक, आंदोलित किसान, असहमत विद्यार्थी, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता या विपक्षी राजनीतिक कार्यकर्ता तक फैलने लगे, तो मामला नागरिक सुरक्षा से निकलकर नागरिक स्वतंत्रता का हो जाएगा।

क्योंकि लोकतंत्र में सरकार का विरोध देश का विरोध नहीं होता।

इतिहास की धूल में दबे कुछ प्रश्न

भारत का इतिहास हमें यह भी बताता है कि नागरिक समाज के सैन्यीकरण की कल्पना बिल्कुल नई नहीं है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े ऐतिहासिक विमर्श में बी.एस. मुंजे की 1931 की इटली यात्रा का उल्लेख मिलता है। मुंजे ने मुसोलिनी के शासनकाल में सैन्य एवं युवा संगठनों का अध्ययन किया और भारत में सैन्य प्रशिक्षण तथा अनुशासित युवाशक्ति की आवश्यकता पर बल दिया। आगे चलकर केंद्रीय हिंदू मिलिटरी एजुकेशन सोसायटी और भोंसला मिलिटरी स्कूल जैसी संस्थाओं का निर्माण इसी व्यापक सैन्य-प्रशिक्षण की सोच से जुड़ा।

इतिहास को वर्तमान पर हूबहू चिपका देना इतिहास के साथ भी अन्याय होगा और वर्तमान के साथ भी। आज का भारत संविधान से संचालित लोकतांत्रिक गणराज्य है, जबकि 1930 का भारत औपनिवेशिक शासन के अधीन था।

लेकिन इतिहास का काम केवल तारीखें याद कराना नहीं होता।

इतिहास कभी-कभी भविष्य के लिए चेतावनी की घंटी भी बजाता है।

अग्निवीरों की वापसी और नई चुनौती

अग्निवीर योजना इस बहस में एक और आयाम जोड़ती है।

चार वर्ष की सेवा के बाद बड़ी संख्या में प्रशिक्षित युवा सेना से नागरिक जीवन में लौटेंगे। सरकार के अनुसार लगभग 25 प्रतिशत अग्निवीरों को सशस्त्र बलों में स्थायी सेवा का अवसर मिलेगा, जबकि शेष को नागरिक जीवन में लौटना होगा।

यहां सवाल अग्निवीरों की नीयत पर संदेह का नहीं, बल्कि राज्य की जिम्मेदारी का है।

सैन्य अनुशासन और प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं के सामने यदि पर्याप्त रोजगार, शिक्षा और सम्मानजनक पुनर्वास के अवसर नहीं होंगे, तो सरकार को उनकी ऊर्जा को किस दिशा में ले जाना है—यह एक गंभीर नीतिगत प्रश्न होगा।

क्योंकि प्रशिक्षित युवा राष्ट्र की शक्ति हैं; उन्हें किसी राजनीतिक परियोजना का ईंधन बनाना राष्ट्रहित नहीं हो सकता।

इसलिए सिविल डिफेंस के विस्तार के साथ अग्निवीरों के पुनर्वास और रोजगार नीति पर भी पारदर्शी बहस आवश्यक है।

नाजी जर्मनी की भयावह सीख

नाजी जर्मनी का उदाहरण इस बहस में अक्सर सामने आता है। लेकिन भारत की प्रस्तावित व्यवस्था को सीधे Gestapo या SS कहना न तो ऐतिहासिक रूप से उचित है और न ही उपलब्ध तथ्यों के आधार पर सिद्ध।

फिर भी इतिहास की वह त्रासदी हमें एक बुनियादी सिद्धांत जरूर सिखाती है।

राज्य की शक्ति जब राजनीतिक निष्ठा से जुड़ती है और उसके ऊपर संस्थागत नियंत्रण कमजोर पड़ता है, तब नागरिक सुरक्षा की भाषा भी दमन का औजार बन सकती है।

Gestapo और SS जिस तरह धीरे-धीरे सत्ता की राजनीतिक मशीनरी के महत्वपूर्ण अंग बने, वह लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए हमेशा एक चेतावनी का विषय रहेगा।

भारत को उस इतिहास की नकल करने का आरोप लगाना आसान है; उससे लोकतांत्रिक सबक लेना कहीं अधिक जरूरी है।

असली खतरा हथियार में नहीं, अधिकार के चरित्र में है

किसी भी नागरिक स्वयंसेवी बल का मूल्यांकन उसके नाम से नहीं, उसकी अधिकार-सीमा और जवाबदेही से होना चाहिए।

भर्ती कौन करेगा?

प्रशिक्षण कौन देगा?

कमांड किसके हाथ में होगी?

क्या स्वयंसेवकों को पुलिस जैसी शक्तियां मिलेंगी?

क्या वे किसी नागरिक को रोक, तलाशी या हिरासत में ले सकेंगे?

उनके खिलाफ शिकायत की स्वतंत्र व्यवस्था क्या होगी?

क्या राजनीतिक दलों के सक्रिय कार्यकर्ताओं को इसमें स्थान मिलेगा?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या सरकार की आलोचना करने वाला नागरिक कभी “आंतरिक शत्रु” की श्रेणी में रखा जा सकेगा?

इन प्रश्नों के उत्तर जितने स्पष्ट होंगे, उतना ही लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा।

क्योंकि संविधान ने नागरिक को सरकार का अनुयायी बनने का अधिकार नहीं दिया; उसे असहमति का अधिकार भी दिया है।

लोकतंत्र को प्रहरी चाहिए, पहरेदार नहीं

भारत को मजबूत नागरिक सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है। प्राकृतिक आपदा हो, युद्ध की स्थिति हो, आतंकवादी हमला हो या कोई बड़ा राष्ट्रीय संकट—प्रशिक्षित नागरिकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

लेकिन नागरिक स्वयंसेवा और राजनीतिक कैडर के बीच की दूरी बहुत छोटी होती है। यही वह जगह है जहां संविधान की रोशनी सबसे अधिक जरूरी है।

सरकार यदि इस नई व्यवस्था को वास्तव में राष्ट्रीय नागरिक सुरक्षा का उपकरण बनाना चाहती है, तो उसे शुरुआत से ही इसकी राजनीतिक निष्पक्षता, पारदर्शिता, मानवाधिकार संरक्षण और स्वतंत्र निगरानी सुनिश्चित करनी चाहिए।

क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं होती जब कोई शक्ति बहुत बड़ी हो जाए।

खतरा तब पैदा होता है जब बड़ी शक्ति से सवाल पूछने वाला कोई न बचे।

इसलिए आज सवाल सिविल डिफेंस के गठन का नहीं है।

सवाल यह है कि आने वाला नागरिक सुरक्षा तंत्र—संविधान का प्रहरी बनेगा या सत्ता का पहरेदार?

इस प्रश्न का उत्तर आने वाला समय देगा। लेकिन लोकतंत्र का इतिहास हमें इतना जरूर सिखाता है कि जब भी नागरिक शक्ति को संगठित किया जाए, तो उसके हाथ में दी गई शक्ति से पहले उसके ऊपर रखी गई संवैधानिक लगाम को देखना चाहिए।

क्योंकि राष्ट्र की सुरक्षा केवल सीमा पर खड़े सैनिकों से नहीं होती।

राष्ट्र की असली सुरक्षा तब होती है, जब उसके नागरिक डरे हुए नहीं, स्वतंत्र हों।

राकेश प्रताप सिंह परिहार
राष्ट्रीय महासचिव, अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति
पत्रकार सुरक्षा कानून लागू कराने हेतु संघर्षरत

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