छह साल से तबादला आदेश के बावजूद पुरानी जगह पर डटे व्याख्याता? कलेक्टर से शिक्षा सचिव तक की चुप्पी पर उठे सवाल

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नई शाला में ज्वॉइनिंग नहीं होने के आरोप ने प्रशासनिक व्यवस्था पर खड़े किए सवाल, सीएम सचिवालय के कथित प्रभाव की चर्चा ने मामले को बनाया और गंभीर

तबादला आदेश के बावजूद छह साल से ज्वॉइनिंग नहीं होने का दावा

बिलासपुर। सरकारी सेवा में तबादला आदेश जारी होने के बाद संबंधित कर्मचारी का नई पदस्थापना वाली जगह पर कार्यभार ग्रहण करना प्रशासनिक प्रक्रिया का अहम हिस्सा होता है। लेकिन बिलासपुर से सामने आए इस मामले में एक व्याख्याता के संबंध में दावा किया जा रहा है कि तबादला आदेश के बावजूद वह करीब छह साल से पुरानी जगह पर ही कार्यरत है और नई शाला घुटकु में ज्वॉइन नहीं किया। यदि यह तथ्य दस्तावेजों से पुष्ट होता है, तो मामला केवल एक शिक्षक के तबादले तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आदेश के अनुपालन और विभागीय निगरानी पर भी गंभीर सवाल खड़े करेगा।

कलेक्टर की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल

मामले को लेकर सबसे बड़ा सवाल जिला प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर उठ रहा है। शिकायत और उपलब्ध दावों के मुताबिक, यदि संबंधित व्याख्याता लंबे समय से तबादला आदेश के बावजूद नई पदस्थापना पर नहीं पहुंचा, तो जिला शिक्षा विभाग और प्रशासन के स्तर पर इसकी जानकारी किस तरह ली गई, यह जांच का विषय है। शिक्षा विभाग की नियमित समीक्षा प्रक्रिया में इस मामले की स्थिति सामने आई या नहीं, यह भी स्पष्ट किया जाना बाकी है।

शिक्षा सचिव और संचालनालय की भूमिका पर उठे प्रश्न

मामले में शिक्षा सचिव और संचालनालय स्तर की निगरानी को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि यदि संबंधित शिक्षक के पक्ष में किसी न्यायिक आदेश या स्थगन का लाभ नहीं है, तो तबादला आदेश के अनुपालन की स्थिति पर विभागीय स्तर पर क्या कार्रवाई की गई। हालांकि, इस संबंध में संबंधित विभाग की आधिकारिक स्थिति सामने आना आवश्यक है।

कथित राजनीतिक संरक्षण को लेकर चर्चा

मामले को लेकर अब यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि आखिर ऐसा कौन-सा प्रभाव है, जिसके कारण छह साल पुराने बताए जा रहे मामले में कार्रवाई नहीं हुई। कुछ लोगों की ओर से स्थानीय प्रभाव से लेकर मुख्यमंत्री सचिवालय तक के कथित हस्तक्षेप की चर्चा की जा रही है। हालांकि, मुख्यमंत्री सचिवालय या किसी अधिकारी की ओर से इस मामले में संरक्षण अथवा हस्तक्षेप की पुष्टि करने वाली कोई आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है। इसलिए इन दावों की स्वतंत्र जांच और दस्तावेजी पुष्टि जरूरी है।

‘सीएम हेल्पलाइन’ की कार्यप्रणाली पर भी सवाल

मामले ने जनशिकायत निवारण व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े किए हैं। यदि इस संबंध में पहले शिकायतें की गई हैं, तो उन शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई और संबंधित विभाग ने क्या रिपोर्ट प्रस्तुत की, यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना महत्वपूर्ण होगा। छह साल से लंबित बताए जा रहे इस मामले में शिकायत निवारण की प्रक्रिया का रिकॉर्ड सामने आने से स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।

दस्तावेज सामने आए तो तय होगी वास्तविक स्थिति

पूरे मामले में तबादला आदेश, ज्वॉइनिंग रिपोर्ट, संबंधित विभाग की पत्राचार फाइल, न्यायालय से किसी स्थगन आदेश की स्थिति और अब तक हुई विभागीय कार्रवाई जैसे दस्तावेज सबसे महत्वपूर्ण होंगे। इन्हीं के आधार पर यह स्पष्ट किया जा सकेगा कि वास्तव में आदेश का पालन हुआ या नहीं और यदि नहीं हुआ तो इतने लंबे समय तक विभागीय स्तर पर क्या कदम उठाए गए।

अब कार्रवाई और जवाब का इंतजार

छह साल पुराने बताए जा रहे इस मामले में अब निगाहें जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग की आधिकारिक कार्रवाई पर हैं। यदि जांच में तबादला आदेश की अवहेलना की पुष्टि होती है, तो संबंधित नियमों के तहत कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। साथ ही यदि शिकायत में लगाए गए अन्य आरोप तथ्यहीन पाए जाते हैं, तो उसकी स्थिति भी आधिकारिक रूप से सामने आनी चाहिए। फिलहाल यह मामला प्रशासनिक पारदर्शिता, विभागीय जवाबदेही और शिकायत निवारण व्यवस्था की परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है।

अभिषेक कुमार पाण्डेय, रिपोर्टर, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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