अलवर में जलेस की राष्ट्रीय कहानी कार्यशाला संपन्न, जन सरोकारों और सामाजिक चेतना से जोड़ने पर जोर

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कहानी वही, जो समाज और जन सरोकारों से जुड़े और झूठ के खिलाफ बोले; देशभर से पहुंचे लेखकों, चिंतकों और नई पीढ़ी के 30 से अधिक छात्र प्रतिभागियों ने लिया हिस्सा

अलवर। जनवादी लेखक संघ (जलेस) की ओर से राजस्थान के अलवर में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कहानी लेखन कार्यशाला 6 और 7 सितंबर को संपन्न हुई। कार्यशाला में बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली सहित विभिन्न राज्यों से आए लेखकों एवं चिंतकों ने कहानी लेखन की प्रक्रिया, संरचना और अंतर्वस्तु जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार साझा किए।

कार्यशाला में रचनात्मक लेखन के माध्यम से सामाजिक भेदभाव को रोकने, समाज में पैदा हुई दूरियों को कम करने, सामाजिक चेतना और इंसानियत को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया। कार्यशाला की खास बात यह रही कि इसमें वरिष्ठ साहित्यकारों के साथ नई पीढ़ी यानी जेन-जी और जेन-अल्फा से जुड़े 30 से अधिक छात्र प्रतिभागियों ने भी सक्रिय भागीदारी की।

उद्घाटन सत्र में कहानी और सामाजिक जिम्मेदारी पर चर्चा

राष्ट्रीय कार्यशाला का उद्घाटन जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंचल चौहान और राष्ट्रीय महासचिव नलिन रंजन सिंह के वक्तव्य से हुआ। चंचल चौहान ने कहानी लेखन में कल्पना की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि राजनीति से प्रेरित कल्पना कई बार झूठ का रूप ले सकती है। ऐसे झूठ का लेखकों को रचनात्मक तरीके से मुकाबला करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि राजनीति के समाज पर अधिक हावी होने से साहित्य पीछे छूटा है और सामाजिक मूल्यों में गिरावट आई है। ऐसे समय में कहानी लेखन के माध्यम से सही और गलत की पहचान को मजबूत करने के साथ सामाजिक एकता और इंसानियत की भावना को जागृत करने का प्रयास होना चाहिए।

125 वर्षों की हिंदी कहानी पर नलिन रंजन सिंह ने रखी बात

जनवादी लेखक संघ के केंद्रीय महासचिव नलिन रंजन सिंह ने कहा कि आधुनिक हिंदी कहानी के 125 वर्ष पूरे होने के अवसर पर यह कार्यशाला आयोजित की गई है। उन्होंने हिंदी कहानी के इतिहास पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि हिंदी कहानी ने अनेक यादगार चरित्र दिए हैं। उन्होंने ‘दोपहर का भोजन’ कहानी की सिद्धेश्वरी को इसका उदाहरण बताया।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में हिंदी कहानी विभिन्न विमर्शों के माध्यम से लगातार समृद्ध हो रही है। उनके अनुसार जलेस की यह कार्यशाला केवल कहानी लेखन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य लेखकों को जन सरोकारों से जोड़ना भी है। लेखक स्वयं जन सरोकारों से जुड़ेगा, तभी वह समाज को मानवीय गुणों से जोड़ने वाला साहित्य रच सकेगा।

अलवर की साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत पर भी हुई चर्चा

स्वागत वक्तव्य में कवि, आलोचक एवं कथाकार जीवन सिंह मानवी ने अलवर की भाषिक विविधता, सांस्कृतिक साझेपन और साहित्यिक अतीत को उदाहरणों के साथ सामने रखा। उन्होंने बताया कि अलवर रियासत के राजा ने यहां हिंदी पढ़ाने के लिए प्रेमचंद और आचार्य रामचंद्र शुक्ल को आमंत्रित किया था। प्रेमचंद ने आमंत्रण अस्वीकार कर दिया था, जबकि आचार्य रामचंद्र शुक्ल अलवर आए और कुछ समय यहां ठहरे।

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता जलेस राजस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष प्रोफेसर सूरज पालीवाल ने की। धन्यवाद ज्ञापन जलेस अलवर के अध्यक्ष नीलाभ पंडित ने किया, जबकि संचालन जलेस अलवर के सचिव डॉ. भरत मीना ने किया।

‘मेरी रचना प्रक्रिया’ में लेखकों ने साझा किए अनुभव

कार्यशाला के दौरान चार सत्र आयोजित किए गए। पहले सत्र का विषय ‘मेरी रचना प्रक्रिया’ था। इसमें कथाकार हरियश राय, सूर्यनाथ सिंह, टेकचंद, ज्योति कुमारी और गंगाधर चाटे ने अपनी रचना प्रक्रिया और लेखन अनुभव साझा किए। सत्र का संचालन राघवेन्द्र रावत ने किया।

गंगाधर चाटे ने कहा कि कहानी में संवेदना और कहानीपन दोनों का होना जरूरी है। अनुभव की परिपक्वता और अनुभूति की ईमानदारी कहानी को सार्थक बनाती है। उन्होंने कहानीकार के लिए निरीक्षण की क्षमता और अध्ययन को भी महत्वपूर्ण बताया।

कहानीकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता ज्योति कुमारी ने कहा कि लड़कियों के भीतर अपनी बात कहने की इच्छा सदियों पुरानी है और कहानी उनकी बेचैनियों को अभिव्यक्ति देने का माध्यम बनती है। उन्होंने लैंगिक भेदभाव और लड़के-लड़की की अलग-अलग परवरिश के अनुभवों को सामने रखते हुए पहचान के सवाल को महत्वपूर्ण बताया।

राजनीति, यथार्थ और कल्पना के संतुलन पर विमर्श

कथाकार सूर्यनाथ सिंह ने अपनी रचना प्रक्रिया पर चर्चा करते हुए कहा कि उनकी अधिकांश कहानियों में राजनीति का रंग दिखाई देता है, लेकिन राजनीति पर आधारित कहानी लिखना जोखिम भरा होता है। उन्होंने कहानी में यथार्थ और कल्पना के संतुलित मिश्रण को आवश्यक बताया।

उन्होंने वर्ष 1991 में एक सॉफ्टवेयर कंपनी में करीब दो हजार इंजीनियरों की छंटनी से जुड़े अपने अनुभव का उल्लेख करते हुए अपनी कहानी ‘मशीन’ के संदर्भ में युक्तियों के प्रयोग, परिवेश की समझ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बात रखी।

कहानीकार टेकचंद ने मुख्यधारा और फिल्म की कहानी के लेखन के अंतर को समझाया। उन्होंने कहा कि कहानीकार के लिए अनुभव, शिक्षा और पढ़ना जरूरी है। कहानीकार की नजर अपने आसपास के समाज और समय पर होनी चाहिए। कहानी में रोचकता के साथ ऐसा कहने का अंदाज होना चाहिए कि पाठक उसे अपनी आपबीती और जगबीती के रूप में महसूस कर सके।

उपन्यासकार हरियश राय ने कहानी लेखन के कई महत्वपूर्ण सूत्र साझा करते हुए अपने समय को देखने और समझने पर जोर दिया। उन्होंने विभिन्न कहानियों के उदाहरण देते हुए संवाद के महत्व को रेखांकित किया और कहा कि कहानी लिखते समय कहानीकार की मन:स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है।

‘संरचना के सवाल’ पर छात्र प्रतिभागियों ने किया अभ्यास

दूसरे सत्र में ‘संरचना के सवाल’ विषय पर जवरीमल्ल पारख, संजीव कुमार और मनोज कुलकर्णी ने अपने विचार रखे। इसके बाद छात्र प्रतिभागियों ने कहानी लेखन का अभ्यास किया और रेखा अवस्थी, हीरा लाल नागर, प्रेम तिवारी, मजकूर आलम, ज्योति नंदा, राजीव प्रकाश गर्ग ‘साहिर’ तथा अलखदेव प्रसाद ‘अचल’ के साथ समूह चर्चा में हिस्सा लिया।

विशेषज्ञों ने छात्र प्रतिभागियों के अभ्यास कार्यों पर प्राप्त फीडबैक के आधार पर उनकी साहित्यिक समझ और जिज्ञासा के अनुरूप समीक्षा एवं सुझाव प्रस्तुत किए।

‘अंतर्वस्तु के सवाल’ पर जन सरोकारों को केंद्र में रखने की अपील

कार्यशाला के दूसरे दिन ‘अंतर्वस्तु के सवाल’ विषय पर दो सत्र आयोजित किए गए। इनमें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर सगीर अफ़राहिम, दिल्ली के देशबंधु कॉलेज के प्रोफेसर बजरंग बिहारी तिवारी, आकाशवाणी लखनऊ की संवाददाता समीना खान, कथा आलोचक राजाराम भादू, शंभूशरण सत्यार्थी और गजेंद्र रावत ने कहानी की अंतर्वस्तु के विभिन्न पक्षों पर विचार रखे।

सत्रों का संचालन योगमाया सैनी और पीसी रथ ने किया, जबकि धन्यवाद उद्बोधन देशराज वर्मा ने दिया।

प्रोफेसर सगीर अफ़राहिम ने उर्दू साहित्य के संदर्भ में हिंदी कहानी को जीवन-संदर्भों का दस्तावेज बताते हुए कहा कि कहानी लेखन में सबसे जरूरी मनुष्य और उसके मुद्दे होने चाहिए। उन्होंने कहानी के अंत को लेकर अनावश्यक दबाव न लेने की बात कही और हिंदी-उर्दू रचनाकारों से जुड़े अपने अनुभव भी साझा किए।

साहित्य की अंतर्वस्तु को भटकाने पर समीना खान ने जताई चिंता

समीना खान ने कहा कि भौतिक सत्ता किसी मुद्दे को भटकाने के लिए घटना की अंतर्वस्तु को बदल सकती है। उन्होंने लखनऊ के उदाहरण के माध्यम से कहा कि आज शहर की समृद्ध संस्कृति और साहित्य की चर्चा के बजाय केवल खानपान तक सीमित चर्चा होने लगी है।

उन्होंने साहित्य में दया और प्रेम की भावना के महत्व पर भी बात रखी तथा कहा कि आज साहित्य से इन मानवीय संवेदनाओं को कमजोर करने की कोशिश दिखाई देती है।

जन आंदोलनों और वंचित वर्गों के मुद्दों को कहानी से जोड़ने पर जोर

कथा आलोचक राजाराम भादू ने कथ्य के विस्तार की बात करते हुए सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा जन आंदोलनों को दबाने के संदर्भ में कहानी को समाज से जोड़ने पर जोर दिया। उन्होंने लेखकों से जन सरोकारों के साथ निडरता से जुड़े रहने का आह्वान किया।

प्रोफेसर बजरंग बिहारी तिवारी ने जीवन के विभिन्न संदर्भों से विमर्श मूलक साहित्य रचने की आवश्यकता बताई और दलित साहित्य में हिंसा के विभिन्न रूपों पर चर्चा की।

गजेंद्र रावत ने वर्ग विभाजित समाज में अंतर्वस्तु के सवाल को जंतर-मंतर के जेन-जी आंदोलन और नोएडा के मजदूर आंदोलन के संदर्भ में समझाया। उन्होंने कहा कि मजदूर और किसानों से जुड़े मुद्दों पर मीडिया का ध्यान अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है।

समापन सत्र में कार्यशाला का प्रस्तुत किया गया प्रतिवेदन

समापन सत्र में जलेस के राष्ट्रीय महासचिव नलिन रंजन सिंह, कुमार विनीताभ, जलेस राजस्थान के सचिव एवं कार्यशाला के संयोजक संदीप मील तथा जलेस अलवर इकाई के सचिव एवं कार्यशाला के स्थानीय संयोजक भरत मीना ने कार्यशाला का समीक्षात्मक लेखा-जोखा और प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।

इस अवसर पर कार्यशाला में शामिल प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र और स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

दो दिनों तक चली इस राष्ट्रीय कहानी कार्यशाला में कहानी लेखन की तकनीक और संरचना के साथ-साथ साहित्य की सामाजिक भूमिका, मानवीय संवेदना, सामाजिक भेदभाव, जन आंदोलनों और बदलते राजनीतिक-सामाजिक परिवेश जैसे मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई। कार्यशाला का मूल संदेश यही रहा कि साहित्य और कहानी को समाज तथा जन सरोकारों से जोड़ते हुए मानवीय मूल्यों और सच के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।

रिपोर्ट : भरत मीना

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