अभिषेक कुमार पाण्डेय
रिपोर्टर, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
वर्धा शिक्षा योजना से संविधान सभा की बहस तक—हिंदी के स्वरूप और दर्जे को लेकर चली लंबी बहस आज भी प्रासंगिक
हर वर्ष 14 सितंबर को देशभर में हिंदी दिवस मनाया जाता है। सरकारी कार्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों और विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक मंचों पर हिंदी के महत्व को लेकर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। हिंदी के प्रचार-प्रसार और उसके अधिकाधिक प्रयोग का संकल्प भी लिया जाता है। हालांकि, हिंदी दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि भाषा के इतिहास, उसके विकास और स्वतंत्र भारत में उसकी संवैधानिक स्थिति पर विचार करने का अवसर भी है।
हिंदी को लेकर स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से ही यह बहस रही कि देश की साझा भाषा कैसी होनी चाहिए और उसका स्वरूप किस प्रकार विकसित किया जाए। इसी क्रम में ‘हिंदुस्तानी’ की अवधारणा, वर्धा शिक्षा योजना और बाद में संविधान सभा में भाषा को लेकर हुए तीखे मतभेद भारतीय भाषाई इतिहास के महत्वपूर्ण अध्याय बन गए।
वर्धा योजना और ‘हिंदुस्तानी’ की अवधारणा
1937 में वर्धा शिक्षा सम्मेलन के दौरान राष्ट्रीय शिक्षा के लिए एक ऐसी भाषा की कल्पना सामने आई, जिसे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संपर्क का माध्यम बनाया जा सके। महात्मा गांधी हिंदी और उर्दू के बीच एक सहज संपर्क भाषा के रूप में ‘हिंदुस्तानी’ के विचार के समर्थक थे। उनका मानना था कि राष्ट्र की साझा भाषा अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ या अत्यधिक फारसी-अरबी प्रभाव वाली न होकर जनसामान्य के लिए सहज और स्वीकार्य होनी चाहिए।
इस विचार को लेकर बाद के वर्षों में व्यापक बहस हुई। आलोचकों का तर्क था कि भाषा का निर्माण राजनीतिक प्रयोगों या ऊपर से तय किए गए मानकों के आधार पर नहीं, बल्कि समाज और उसकी सांस्कृतिक परंपराओं के स्वाभाविक विकास के साथ होना चाहिए।
साहित्यकारों ने भी जताई असहमति
हिंदी का स्वरूप केवल प्रशासन या शिक्षा की जरूरतों से निर्धारित नहीं हुआ। इसके विकास में साहित्य, लोकभाषाओं और भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसी कारण भाषा के स्वरूप को लेकर होने वाली बहस साहित्य जगत तक भी पहुंची।
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, राहुल सांकृत्यायन, किशोरीदास वाजपेयी और पं. नारायण चतुर्वेदी जैसे विद्वानों ने भाषा की प्रकृति और उसके सांस्कृतिक आधार को लेकर अपने विचार व्यक्त किए। उनका मूल आग्रह यह था कि हिंदी का विकास भारतीय समाज की भाषाई और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा होना चाहिए।
उस दौर की भाषा संबंधी बहसों में स्वामी रामचंद्र वीर महाराज की रचनाएं भी चर्चित रहीं। उनके व्यंग्यात्मक काव्य में हिंदी के स्वरूप में अत्यधिक बाहरी प्रभाव को लेकर असहमति दिखाई देती है। यह साहित्यिक प्रतिक्रिया उस समय चल रही व्यापक भाषाई बहस का हिस्सा थी।
आजादी के बाद संविधान सभा में भाषा पर टकराव
स्वतंत्रता के बाद भाषा का प्रश्न और अधिक महत्वपूर्ण हो गया। संविधान सभा में यह तय करना था कि स्वतंत्र भारत की संघीय शासन व्यवस्था में किस भाषा को आधिकारिक दर्जा दिया जाए।
पुरुषोत्तम दास टंडन, सेठ गोविंद दास, काका कालेलकर सहित कई नेता हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की प्रमुख भाषा बनाए जाने के पक्ष में थे। दूसरी ओर, देश की भाषाई विविधता, प्रशासनिक आवश्यकताओं और तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए अंग्रेजी के निरंतर प्रयोग तथा भाषा संबंधी व्यापक सहमति की जरूरत पर भी जोर दिया गया।
जवाहरलाल नेहरू सहित कई नेताओं का मानना था कि भाषा के प्रश्न पर जल्दबाजी देश में राजनीतिक और सामाजिक तनाव पैदा कर सकती है। इसी पृष्ठभूमि में संविधान सभा में लंबे विचार-विमर्श और मतभेदों के बाद एक समझौते का रास्ता निकाला गया।
‘मुंशी-आयंगर फॉर्मूला’ और हिंदी की संवैधानिक स्थिति
भाषा विवाद को सुलझाने के लिए तैयार किए गए समझौते को सामान्यतः ‘मुंशी-आयंगर फॉर्मूला’ के नाम से जाना जाता है। इसके आधार पर संविधान में हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया।
संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी निर्धारित की गई। साथ ही अंग्रेजी के प्रयोग को एक संक्रमणकाल के लिए जारी रखने का प्रावधान किया गया। बाद में कानूनों और राजनीतिक परिस्थितियों के कारण अंग्रेजी का आधिकारिक कामकाज में प्रयोग जारी रहा।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भारतीय संविधान ने हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ का दर्जा नहीं दिया। संविधान में ‘राष्ट्रभाषा’ के रूप में किसी भी भाषा को घोषित नहीं किया गया है। हिंदी को संघ की ‘राजभाषा’ का संवैधानिक दर्जा प्राप्त है।
हिंदी और भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता
हिंदी का विकास केवल खड़ी बोली तक सीमित नहीं रहा। अवधी, ब्रज, बुंदेली, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी और अन्य अनेक लोकभाषाओं तथा बोलियों ने हिंदी के शब्द संसार और साहित्य को समृद्ध किया है। संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश के साथ-साथ फारसी, अरबी, अंग्रेजी और अन्य भाषाओं से भी हिंदी ने अनेक शब्द ग्रहण किए हैं।
यही हिंदी की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है—समय और समाज के साथ बदलने तथा नए शब्दों को आत्मसात करने की क्षमता।
लेकिन भाषा में परिवर्तन और भाषा के मूल सांस्कृतिक स्वरूप के बीच संतुलन को लेकर बहस आज भी जारी है। सवाल यह है कि किसी भाषा को आधुनिक और सर्वग्राह्य बनाने के नाम पर उसके स्वाभाविक विकास को कितना बदला जाना चाहिए और उसकी सांस्कृतिक पहचान को किस तरह सुरक्षित रखा जाए।
हिंदी दिवस का वास्तविक अर्थ
हिंदी दिवस केवल सरकारी समारोह, भाषण और प्रतियोगिताओं तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह दिन हिंदी के इतिहास, साहित्य, लोकभाषाओं और भारतीय समाज में उसकी भूमिका को समझने का अवसर भी है।
भाषा किसी आदेश से जीवित नहीं रहती। वह समाज के व्यवहार, साहित्य, संस्कृति और दैनिक जीवन से निरंतर विकसित होती है। हिंदी ने सदियों के दौरान अनेक भाषाओं और बोलियों से शब्द ग्रहण कर स्वयं को समृद्ध किया है। इसलिए हिंदी की शक्ति उसकी व्यापकता, सहजता और भारतीय सांस्कृतिक स्मृति से जुड़े उसके लंबे सफर में है।
हिंदी दिवस का सार इसी बात में है कि हिंदी को केवल एक प्रशासनिक भाषा के रूप में नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की अभिव्यक्ति, साहित्य और सांस्कृतिक चेतना की महत्वपूर्ण भाषा के रूप में समझा जाए। भाषा का सम्मान तभी सार्थक होगा, जब उसके विकास में स्वाभाविकता, विविधता और सांस्कृतिक गरिमा—तीनों के लिए पर्याप्त स्थान हो।




