15 साल बाद भी रहस्य बना गरियाबंद पत्रकार उमेश राजपूत हत्याकांड: परिजन उठाते हैं CBI पर गंभीर सवाल, गिरफ्तारी नहीं

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उमेश राजपूत हत्याकांड: वर्षों बीत गए, न्याय अभी भी अधूरा, परिवार में गहरा रोष

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के छुरा नगर के युवा पत्रकार उमेश राजपूत की 23 जनवरी 2011 की हत्या के 15 साल बाद भी कोई आरोपी गिरफ्तारी नहीं हो सका है। रायपुर स्थित विशेष CBI कोर्ट में 2 मार्च को हुई अंतिम सुनवाई के बाद परिजन और पत्रकार समुदाय में गंभीर असंतोष है। परिवार का आरोप है कि जांच एजेंसियों और प्रभावशाली लोगों के दबाव में केस अब तक अनसुलझा है।


घर में घुसकर हुई थी गोली मारकर हत्या, जांच में संदिग्ध का जिक्र ही नहीं

घटना के समय उमेश अपने घर में मौजूद थे। जैसे ही वे दरवाजे की ओर बढ़े, संदिग्ध व्यक्ति ने उन पर गोली चला दी और फरार हो गया। घटना के गवाहों में शामिल घर की नौकरानी ने संदिग्ध की पहचान कराई, लेकिन उसका उल्लेख केस डायरी में नहीं किया गया, जिससे जांच की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठते हैं।


स्थानीय जांच चार साल, फिर CBI के पास मामला सौंपा गया

हत्या के बाद स्थानीय पुलिस ने करीब चार साल तक जांच की, लेकिन कोई ठोस सफलता नहीं मिली। इसके बाद परिजनों ने हाईकोर्ट में याचिका देकर CBI जांच की मांग की। 2015 में मामला CBI को सौंपा गया, लेकिन जांच की गति अब भी धीमी बनी रही।


साक्ष्यों में छेड़छाड़ और महत्वपूर्ण दस्तावेज गायब: परिजन जताते हैं आरोप

परिवार का कहना है कि हत्या स्थल से मिले साक्ष्यों में छेड़छाड़ की गई। धमकी भरे पर्चे को बदल दिया गया, केस डायरी में डुप्लीकेट दस्तावेज संलग्न किए गए।
इसके अलावा, फायरिंग से प्रभावित कपड़े, मोबाइल, कंप्यूटर हार्ड डिस्क जैसे महत्वपूर्ण सबूत गायब हो गए। इन गंभीर लापरवाहियों के बावजूद किसी अधिकारी के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं हुई।


ब्रेन मैपिंग रिपोर्ट में प्रभावशाली लोगों का नाम सामने आया

जांच के दौरान कुछ संदिग्धों की पूछताछ और ब्रेन मैपिंग टेस्ट में पता चला कि हत्या सुपारी देकर कराई गई थी। इसमें कथित रूप से कुछ प्रभावशाली लोगों और राजनीतिक दल से जुड़े पूर्व विधायक के परिवार के लोगों की भूमिका सामने आई, लेकिन इस दिशा में गंभीर कार्रवाई नहीं हुई।


CBI जांच में विवाद: पत्रकार की हिरासत और कथित आत्महत्या

CBI जांच के दौरान मामले की दिशा अचानक बदल गई। इसी दौरान एक पत्रकार को हिरासत में लिया गया, जिसके रिमांड दौरान कथित आत्महत्या का मामला विवादों में आया। इस घटना ने जांच की पारदर्शिता पर और सवाल खड़े कर दिए।


15 साल बाद भी गिरफ्तारी नहीं, परिजन सुप्रीम कोर्ट जाने को तैयार

हत्या के 15 साल बाद भी किसी आरोपी को गिरफ्तार न करना न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है। परिजन अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में हैं। उनका कहना है कि जब तक सच्चाई सामने नहीं आती और दोषियों को सजा नहीं मिलती, तब तक न्याय की लड़ाई जारी रहेगी


निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर: क्या मिल पाएगी परिजनों को न्याय और सच्चाई

अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं। आने वाले दिन तय करेंगे कि क्या यह बहुचर्चित हत्याकांड नई दिशा पाएगा और वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे परिवार को राहत मिलेगी

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