नंदिता माजी शर्मा की कलम से निकले जीवन दर्शन और सामाजिक सरोकारों से जुड़े दोहे

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मुंबई की साहित्यकार नंदिता माजी शर्मा ने नौ दोहों के माध्यम से कर्म, मित्रता, अहंकार, शांति और जीवन की क्षणभंगुरता पर रखे विचार

मुंबई। साहित्यकार नंदिता माजी शर्मा ने अपनी रचनात्मक लेखनी के माध्यम से जीवन के विभिन्न पहलुओं को सहज और सारगर्भित दोहों में अभिव्यक्त किया है। “दोहे – नंदिता की कलम से” शीर्षक से प्रस्तुत उनकी रचनाओं में मानवीय व्यवहार, सच्ची मित्रता, सामाजिक सोच, कर्म, अहंकार, शांति और जीवन की नश्वरता जैसे विषयों को प्रभावी ढंग से उठाया गया है।

दूसरों की बातों पर निर्णय न लेने का संदेश

नंदिता माजी शर्मा अपने पहले दोहे में बिना पूरी सच्चाई जाने किसी व्यक्ति के बारे में राय बनाने से बचने का संदेश देती हैं। वह लिखती हैं—
“औरों की सुनकर कभी, लोगों को मत तोल।
हर पहलू को जाँच ले, तब जाकर कुछ बोल।।“

सच्ची मित्रता की पहचान

उनके दोहों में सच्ची मित्रता के महत्व को भी रेखांकित किया गया है। उनके अनुसार सच्चा मित्र सुख-दुख में साथ खड़ा रहता है और सही कर्म में सहयोग देने के साथ गलत कार्य पर रोकने और समझाने का साहस भी रखता है।

“सच्ची मैत्री बोलती, सुख-दुख मिलकर बांट।
सही कर्म पर साथ दे, गलत कर्म पर डांट।।“

समाज के डर से आगे बढ़ने की सीख

नंदिता ने समाज क्या कहेगा, इस चिंता को भी अपने दोहे का विषय बनाया है। उन्होंने लिखा कि संसार ने अनेक प्रकार की समस्याएं और रोग देखे हैं, लेकिन आज भी लोगों की सबसे बड़ी चिंता अक्सर यह रहती है कि दूसरे क्या कहेंगे।

जीवन की क्षणभंगुरता का बोध

रचनाकार ने जीवन और सांसारिक इच्छाओं की नश्वरता को भी बेहद सहज शब्दों में प्रस्तुत किया है। वह कहती हैं कि व्यक्ति, उसकी इच्छाएं और सांसारिक भोग सभी क्षणभंगुर हैं। साथ ही उन्होंने पाठकों को अपने भीतर जीवन के उद्देश्य को खोजने की प्रेरणा दी है।

“खोजो अपने आप में, जीवन का अभिप्रेत।
दिन-प्रतिदिन जीवन सदा, फिसले बनकर रेत।।“

अहंकार और कर्मों पर आत्ममंथन

दोहों में अहंकार को लेकर भी गंभीर संदेश दिया गया है। रचनाकार के अनुसार जिन लोगों के मन में अहंकार भरा होता है, वे अक्सर अपनी गलतियों और कर्मों के दोष दूसरों पर थोपने लगते हैं। यह दोहा व्यक्ति को आत्ममंथन करने की प्रेरणा देता है।

शांति को पहला विकल्प बनाने का संदेश

नंदिता माजी शर्मा ने सद्भावना और शांति को प्राथमिकता देने का आह्वान करते हुए लिखा—

“मन में हो सद्भावना, बसे मनन में बुद्ध।
प्रथम चयन बस शांति हो, अंतिम विकल्प युद्ध।।“

यह दोहा मानव जीवन में शांति, सद्भाव और विवेक के महत्व को रेखांकित करता है।

कर्मों का परिणाम सामने आने की बात

उन्होंने पाप और गलत कर्मों के बढ़ते संचय की तुलना पानी से भरती गगरी से की है। उनके अनुसार जब गलत कर्म चरम बिंदु तक पहुंच जाते हैं तो उनका परिणाम स्वयं सामने आ जाता है।

रील संस्कृति पर भी टिप्पणी

नंदिता के अंतिम दोहे में आधुनिक सोशल मीडिया और रील संस्कृति को लेकर विचार व्यक्त किया गया है। उन्होंने इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभावों की ओर संकेत करते हुए सावधानी बरतने का संदेश दिया है।

“घातक दुनिया रील की, बाँध रही निज खूँट।
सही रहे तो है सुधा, गलत विषैले घूँट।।“

नंदिता माजी शर्मा के ये दोहे सरल भाषा में जीवन के गहरे अनुभवों और सामाजिक सरोकारों को सामने रखते हैं। उनकी रचनाएं पाठकों को आत्ममंथन करने के साथ-साथ सही कर्म, सच्ची मित्रता, शांति और सकारात्मक सोच की ओर प्रेरित करती हैं।

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