बंडामुंडा पुलिस पर झूठे मामलों में फंसाने और शिकायतों पर कार्रवाई नहीं करने के आरोप, NHRC ने मामले को सिविल विवाद मानकर किया बंद
नई दिल्ली/राउरकेला। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के समक्ष बंडामुंडा थाना पुलिस की कार्रवाई और कथित निष्क्रियता को लेकर दायर दो शिकायतों को एक साथ जोड़कर सुनवाई की गई। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उसे चार आपराधिक मामलों में झूठा फंसाया, जबकि इनमें से तीन FIR में उसका नाम दर्ज नहीं था। शिकायतकर्ता के अनुसार, एक मामले में उसे गिरफ्तार कर जेल भी भेजा गया।
दूसरी शिकायत में आरोप लगाया गया कि शिकायतकर्ता की ओर से दर्ज कराई गई कई FIR और शिकायतों पर बंडामुंडा थाना पुलिस ने अपेक्षित कार्रवाई नहीं की। शिकायतकर्ता का दावा है कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के समक्ष शिकायत किए जाने के बावजूद जांच के दौरान ऐसी रिपोर्ट प्रस्तुत की जाती रहीं, जिनसे कथित आरोपियों को राहत मिलती रही।
दो शिकायतों को जोड़कर हुई सुनवाई
शिकायतकर्ता के अनुसार, उसकी दोनों शिकायतों को NHRC ने एक ही प्रकरण के रूप में जोड़कर सुनवाई की। अंततः आयोग ने मामले को मूल रूप से सिविल प्रकृति का विवाद मानते हुए शिकायत बंद कर दी। आयोग की ओर से यह भी माना गया कि उपलब्ध परिस्थितियों में मानवाधिकार उल्लंघन का मामला स्थापित नहीं होता।
हालांकि, शिकायतकर्ता की ओर से आयोग के इस निष्कर्ष को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
अगर विवाद सिविल था तो आपराधिक मामलों का आधार क्या था?
इस मामले में सबसे प्रमुख सवाल यह उठता है कि यदि विवाद की प्रकृति सिविल थी, तो शिकायतकर्ता के खिलाफ चार आपराधिक मामलों की परिस्थितियों की स्वतंत्र और विस्तृत जांच किस स्तर पर हुई?
शिकायतकर्ता का दावा है कि तीन FIR में उसका नाम तक दर्ज नहीं था। हालांकि, केवल FIR में नाम नहीं होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि जांच के दौरान संबंधित व्यक्ति को आरोपी नहीं बनाया जा सकता। पुलिस जांच के दौरान सामने आए अन्य साक्ष्यों के आधार पर किसी व्यक्ति का नाम आरोपी के रूप में जोड़ा जा सकता है।
ऐसे में महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि संबंधित मामलों में शिकायतकर्ता को आरोपी बनाने के पीछे क्या साक्ष्य और जांच का आधार था और बाद की कानूनी कार्रवाई किस प्रक्रिया के तहत हुई।
गिरफ्तारी और चार्जशीट को लेकर भी सवाल
शिकायतकर्ता के अनुसार, एक मामले में उसे गिरफ्तार कर जेल भेजा गया और बाद में न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ी। ऐसे में गिरफ्तारी के आधार, केस डायरी, जांच में जुटाए गए साक्ष्य, आरोपपत्र और संबंधित न्यायालय के आदेश महत्वपूर्ण दस्तावेज बन जाते हैं।
इन दस्तावेजों की स्वतंत्र समीक्षा के बिना यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि गिरफ्तारी या आपराधिक कार्रवाई गलत थी। वहीं, यदि शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच करनी है तो इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर पुलिस कार्रवाई की वैधानिकता और निष्पक्षता की समीक्षा की जा सकती है।
एक ओर कार्रवाई का आरोप, दूसरी ओर शिकायतों पर निष्क्रियता का दावा
पूरे प्रकरण में शिकायतकर्ता की दोनों शिकायतें एक-दूसरे से जुड़ी हुई नजर आती हैं। एक तरफ आरोप है कि पुलिस ने उसके खिलाफ लगातार आपराधिक कार्रवाई की, जबकि दूसरी ओर दावा है कि उसके द्वारा दर्ज कराई गई शिकायतों और FIR पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई।
ऐसी स्थिति में मुख्य सवाल पुलिस की कार्रवाई की निष्पक्षता और समान व्यवहार से जुड़ जाता है। हालांकि, यह निर्धारित करने के लिए कि पुलिस ने वास्तव में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया या नहीं, दोनों पक्षों के रिकॉर्ड और जांच दस्तावेजों की समीक्षा आवश्यक होगी।
मानवाधिकार उल्लंघन का सवाल
यदि किसी व्यक्ति को जानबूझकर झूठे आपराधिक मामले में फंसाया गया हो, गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया हो या कानून के विपरीत उसके खिलाफ कार्रवाई की गई हो और यह सक्षम जांच या न्यायिक प्रक्रिया में साबित हो, तो मामला मानवाधिकारों से जुड़ सकता है।
लेकिन केवल शिकायतकर्ता के आरोपों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पुलिस ने मानवाधिकारों का उल्लंघन किया। इसके लिए स्वतंत्र जांच, दस्तावेजी साक्ष्य और संबंधित न्यायिक रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होंगे।
NHRC के फैसले को लेकर पारदर्शिता का सवाल
इस मामले में अब यह सवाल भी चर्चा में है कि शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए पुलिस कार्रवाई और कथित निष्क्रियता से जुड़े प्रत्येक आरोप का किस स्तर तक परीक्षण किया गया। यदि मामला सिविल प्रकृति का पाया गया, तो उसके साथ जुड़े आपराधिक मामलों और पुलिस कार्रवाई के पहलुओं पर आयोग के निष्कर्ष किस आधार पर पहुंचे, यह भी महत्वपूर्ण है।
वहीं, यदि संबंधित आपराधिक मामलों में पुलिस की कार्रवाई कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के अनुरूप थी, तो FIR, केस डायरी, चार्जशीट और न्यायालयीन रिकॉर्ड से इसकी पुष्टि की जा सकती है।
दस्तावेजों की स्वतंत्र समीक्षा से ही सामने आएगी पूरी तस्वीर
इस पूरे प्रकरण में शिकायतकर्ता के आरोपों और NHRC के निष्कर्ष के बीच उठ रहे सवालों का अंतिम उत्तर संबंधित दस्तावेजों की स्वतंत्र समीक्षा से ही मिल सकता है। चार आपराधिक मामलों में कार्रवाई, तीन FIR में नाम नहीं होने का दावा, एक मामले में गिरफ्तारी तथा शिकायतकर्ता की अपनी शिकायतों पर कथित कार्रवाई न होने जैसे बिंदुओं को अलग-अलग जांचना आवश्यक होगा।
फिलहाल उपलब्ध दावों के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि पुलिस या किसी अन्य पक्ष ने कानून का उल्लंघन किया है। लेकिन मामले से जुड़े FIR, आरोपपत्र, गिरफ्तारी रिकॉर्ड, न्यायालयीन आदेश, पुलिस जांच रिपोर्ट और NHRC के विस्तृत आदेश सार्वजनिक रूप से सामने आने पर पूरे घटनाक्रम की स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती है।
