पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर कानून बनाने की उठी मांग, कहा—सुरक्षित पत्रकार ही बिना भय के सवाल पूछ सकता है
नई दिल्ली। लोकतंत्र में पत्रकार को अक्सर चौथा स्तंभ कहा जाता है। पत्रकार सत्ता, प्रशासन, पुलिस, भ्रष्टाचार और व्यवस्था से जुड़े सवालों को जनता के सामने रखने का काम करता है। ऐसे में पत्रकार की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होने पर लोकतांत्रिक जवाबदेही की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष जिग्नेश कलावडिया ने पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि देश में पत्रकारों की सुरक्षा के लिए एक व्यापक और प्रभावी राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है। उन्होंने कहा कि यह केवल पत्रकार संगठनों का मुद्दा नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़ा विषय है।
2025 में पत्रकारों पर 33 हमले और 8 गिरफ्तारियां
राष्ट्रीय संगठन महासचिव महफ़ूज़ खान ने फ्री स्पीच कलेक्टिव की फ्री स्पीच इन इंडिया 2025 रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 2025 में भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े 14,875 मामले दर्ज किए गए। इनमें 40 हमले शामिल थे, जिनमें 33 हमले पत्रकारों के खिलाफ बताए गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार पत्रकारों के खिलाफ कम से कम 14 उत्पीड़न और 12 धमकी के मामले दर्ज किए गए। इसी अवधि में 8 पत्रकारों की गिरफ्तारी का भी उल्लेख किया गया है।
मुकेश चंद्राकर की हत्या ने उठाए गंभीर सवाल
अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति के राष्ट्रीय महासचिव राकेश सिंह परिहार ने पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या का उल्लेख करते हुए कहा कि पत्रकारों के सामने खतरा केवल हत्या तक सीमित नहीं है। धमकी, मारपीट, गिरफ्तारी, कानूनी कार्रवाई, ऑनलाइन उत्पीड़न और दबाव जैसे माध्यम भी स्वतंत्र पत्रकारिता को प्रभावित कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि जनवरी 2025 में छत्तीसगढ़ के पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या ने देशभर में पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए। चंद्राकर स्थानीय प्रशासन और भ्रष्टाचार से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते थे। उनके मामले में पुलिस ने हत्या, साजिश और सबूत नष्ट करने से जुड़े आरोपों में कार्रवाई की थी।
छोटे शहरों और ग्रामीण पत्रकारों की सुरक्षा पर जोर
पत्रकार संगठनों का कहना है कि छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकारों को स्थानीय प्रभावशाली लोगों, ठेकेदारों, अपराधियों और राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे पत्रकारों के पास बड़े मीडिया संस्थानों की तरह कानूनी और सुरक्षा संसाधन हमेशा उपलब्ध नहीं होते।
2025 में दुनियाभर में 129 पत्रकारों की मौत का दावा
कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि वर्ष 2025 में दुनियाभर में 129 पत्रकार और मीडिया कर्मी मारे गए। इनमें 47 मौतों को पत्रकारिता से संबंधित लक्षित हत्याओं के रूप में दर्ज किया गया। वहीं 1 दिसंबर 2025 तक दुनिया में 335 पत्रकारों के जेल में होने की जानकारी दी गई।
भारत में इसी अवधि में दो पत्रकारों के जेल में होने का उल्लेख किया गया है। हालांकि, किसी पत्रकार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई को अपने आप पत्रकारिता के कारण की गई कार्रवाई नहीं माना जा सकता।
भारत की प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग पर भी चर्चा
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) के 2026 वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स का उल्लेख करते हुए वक्ताओं ने कहा कि भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर रहा और उसका स्कोर 31.96 बताया गया। रिपोर्ट में पत्रकारों के खिलाफ हिंसा, मीडिया स्वामित्व के केंद्रीकरण और राजनीतिक दबाव जैसी चुनौतियों का उल्लेख किया गया है।
मौजूदा कानूनों के साथ विशेष सुरक्षा तंत्र की मांग
रत्नाकर त्रिपाठी ने कहा कि पत्रकारों को सामान्य आपराधिक कानूनों के तहत सुरक्षा और न्याय पाने का अधिकार है। हत्या, मारपीट, धमकी और संपत्ति को नुकसान जैसे अपराधों के लिए कानून पहले से मौजूद हैं। लेकिन पत्रकारिता के कारण होने वाले हमले या प्रतिशोध से सुरक्षा के लिए विशेष और त्वरित तंत्र पर विचार किया जाना चाहिए।
महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ का उदाहरण
छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष गोविंद शर्मा ने बताया कि महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में मीडिया कर्मियों एवं मीडिया संस्थानों के खिलाफ हिंसा तथा संपत्ति को नुकसान से संबंधित कानून लागू हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर समान कानून होने से पत्रकार सुरक्षा के लिए राज्यों की अलग-अलग व्यवस्थाओं पर निर्भरता कम हो सकती है।
राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून में क्या हो?
वक्ताओं के अनुसार प्रस्तावित कानून में पत्रकारों के पेशेवर काम से जुड़े हमलों की तत्काल जांच, धमकी मिलने पर सुरक्षा मूल्यांकन, गंभीर मामलों में समयबद्ध जांच और अभियोजन, पत्रकारिता के कारण किए गए हमले को गंभीर परिस्थिति मानने तथा प्रतिशोधात्मक कार्रवाई की समीक्षा जैसे प्रावधानों पर विचार किया जा सकता है।
इसके अलावा डिजिटल सुरक्षा और फ्रीलांस, ग्रामीण एवं स्वतंत्र पत्रकारों को भी सुरक्षा के दायरे में शामिल करने की जरूरत पर जोर दिया गया।
पत्रकार की सुरक्षा जनता की सुरक्षा से जुड़ी
अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष अजय प्रताप नारायण सिंह ने कहा कि पत्रकार को धमकी मिलने का असर केवल उस पत्रकार तक सीमित नहीं रहता। भ्रष्टाचार, अवैध खनन, भूमाफिया, सरकारी अस्पतालों की अव्यवस्था, पुलिस की लापरवाही और जनता के अधिकारों से जुड़े मुद्दों को सामने लाने में पत्रकार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
उन्होंने कहा कि पत्रकार सुरक्षा का सवाल केवल पत्रकारों का नहीं, बल्कि जनता के सूचना के अधिकार, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही का भी सवाल है।
कानून पत्रकारों को विशेषाधिकार नहीं, सुरक्षा दे
रत्नाकर त्रिपाठी ‘सामवेदी’ ने कहा कि पत्रकार सुरक्षा कानून का उद्देश्य पत्रकारों को कानून से ऊपर रखना नहीं होना चाहिए। यदि कोई पत्रकार कानून तोड़ता है तो उसके खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन पत्रकारिता के कारण किसी पत्रकार को धमकी, हिंसा या प्रतिशोध का सामना करना पड़े, यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है।
उन्होंने कहा कि “पत्रकार सुरक्षित होगा, तभी वह बिना भय के सवाल पूछ सकेगा। वह सवाल पूछ सकेगा, तभी सत्ता जवाब देगी और सत्ता जवाबदेह रहेगी, तभी लोकतंत्र मजबूत रहेगा।”




