दिवाली के दीये या कानफोड़ू पटाखे? प्रकाश का उत्सव मनाएं, प्रदूषण और भय का नहीं

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लेखक हुलेश्वर प्रसाद जोशी ने दीपावली पर पर्यावरण संरक्षण और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता का दिया संदेश, हर परिवार से एक फलदार पेड़ लगाने की अपील

दीपावली के वास्तविक संदेश को समझने की जरूरत

दीपावली भारतीय संस्कृति का ऐसा महापर्व है, जिसकी रोशनी देश की सीमाओं को पार कर दुनिया के अनेक देशों तक पहुंच चुकी है। यह पर्व केवल घरों को सजाने, मिठाइयां बांटने और खुशियां मनाने का अवसर नहीं, बल्कि अंधकार से प्रकाश, अज्ञान से ज्ञान और निराशा से आशा की ओर बढ़ने का संदेश भी देता है। लेकिन बदलते समय में दीपावली मनाने के तरीके को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा हो रहा है। क्या त्योहार की असली खुशी मिट्टी के दीयों की मनमोहक रोशनी में है या फिर आसमान को धुएं से भरने वाले और लोगों के साथ बेजुबान जीवों को डराने वाले तेज आवाज के पटाखों में?

कुछ पलों की खुशी के लिए दूसरों को परेशानी क्यों?

दीपावली का मूल भाव प्रकाश और सकारात्मकता है। मिट्टी के छोटे से दीये की लौ हमें सिखाती है कि सीमित संसाधनों में भी अंधकार को चुनौती दी जा सकती है। एक दीया दूसरे दीये को रोशन करता है, लेकिन अपना प्रकाश नहीं खोता। यह सहयोग, सद्भाव और सकारात्मकता का सुंदर प्रतीक है।

इसके विपरीत, तेज आवाज वाले पटाखे कुछ क्षणों का रोमांच देने के बाद वातावरण में धुआं और हानिकारक कण छोड़ जाते हैं। उनका प्रभाव ध्वनि और वायु प्रदूषण के रूप में लंबे समय तक महसूस किया जा सकता है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि अपनी खुशी मनाने का अधिकार किसी दूसरे की शांति, स्वास्थ्य और सहज जीवन को प्रभावित करने का अधिकार नहीं देता।

पटाखों के शोर से इंसानों के साथ बेजुबान जीव भी परेशान

दीपावली पर होने वाले तेज धमाकों का असर केवल आम लोगों पर ही नहीं, बल्कि नवजात बच्चों, बुजुर्गों, बीमार व्यक्तियों और अस्पतालों में उपचार करा रहे मरीजों पर भी पड़ सकता है। अचानक होने वाली तेज आवाज उनके लिए परेशानी और भय का कारण बन सकती है।

वहीं, कुत्ते, बिल्लियां और पक्षियों जैसे बेजुबान जीव भी पटाखों की आवाज से बुरी तरह डर सकते हैं। कई बार वे घबराकर इधर-उधर भागने लगते हैं और घायल भी हो जाते हैं। पक्षियों के लिए रात का समय विश्राम का होता है, लेकिन आतिशबाजी का शोर उनके प्राकृतिक व्यवहार को प्रभावित कर सकता है।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कुछ क्षणों की खुशी किसी दूसरे जीव के भय और पीड़ा से अधिक महत्वपूर्ण है? संवेदनशील समाज की पहचान यही है कि वह अपनी खुशियों के साथ दूसरों की परेशानियों का भी ध्यान रखे।

पर्यावरण संरक्षण के प्रति भी निभानी होगी जिम्मेदारी

आज दुनिया जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, जैव विविधता के नुकसान और जल संकट जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। पटाखों से निकलने वाला धुआं और सूक्ष्म कण वायु गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। वहीं, आतिशबाजी से निकलने वाले रासायनिक और धात्विक कण पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं।

शहरों में पहले से ही यातायात, निर्माण कार्य और औद्योगिक गतिविधियों के कारण प्रदूषण की समस्या बनी हुई है। ऐसे में त्योहारों को पर्यावरण के अनुकूल मनाना समय की आवश्यकता है। स्वच्छ हवा, शांत वातावरण और सुरक्षित प्रकृति केवल किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की साझा विरासत है।

इस दीपावली एक फलदार पेड़ लगाने का लें संकल्प

लेखक हुलेश्वर प्रसाद जोशी ने देशवासियों और प्रकृति प्रेमियों से अपील की है कि इस दीपावली कम से कम एक फलदार पेड़ अवश्य लगाएं। इसके लिए आम, अमरूद, जामुन, आंवला, नींबू, कटहल, मुनगा, सीताफल और अनार जैसे पौधों का चयन किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि पौधा लगाने के साथ उसकी देखभाल और सुरक्षा की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी चाहिए। यदि एक करोड़ परिवार हर साल एक फलदार पेड़ लगाकर उसका संरक्षण करें, तो आने वाले वर्षों में बड़ी हरित संपदा तैयार हो सकती है।

एक फलदार पेड़ केवल फल ही नहीं देता, बल्कि छाया प्रदान करता है, कार्बन को संचित करने में मदद करता है, पक्षियों और अन्य जीवों को आश्रय देता है तथा मिट्टी के संरक्षण में भी योगदान करता है। बच्चों के लिए अपने हाथों से लगाए गए पौधे को बड़ा होते देखना और भविष्य में उसी पेड़ के फल खाना प्रकृति से जुड़ने का अनमोल अनुभव हो सकता है।

परंपराओं के साथ विवेक और जिम्मेदारी भी जरूरी

भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है कि वह समय के साथ बेहतर बदलावों को अपनाती रही है। परंपराओं का उद्देश्य मानव जीवन को आनंदमय और समृद्ध बनाना है। इसलिए यदि किसी परंपरा के किसी स्वरूप से समाज, जीव-जंतुओं या प्रकृति को अनावश्यक नुकसान पहुंचता है, तो उस पर विचार करना जरूरी है।

इसका अर्थ किसी की आस्था या त्योहार मनाने की स्वतंत्रता का विरोध करना नहीं है, बल्कि अपनी खुशियों के साथ दूसरों के अधिकारों और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाना है। मिट्टी के दीयों, पारंपरिक सजावट, सामूहिक दीपोत्सव, जरूरतमंदों की सहायता और प्रकृति संरक्षण के माध्यम से भी दीपावली को यादगार बनाया जा सकता है।

बच्चों को शोर नहीं, संवेदनशीलता की विरासत दें

आज के बच्चे ही भविष्य के नागरिक और समाज के निर्माता हैं। उन्हें यह सिखाना जरूरी है कि खुशी का अर्थ केवल अधिक शोर, प्रदर्शन और उपभोग नहीं होता। किसी भूखे को भोजन कराना, किसी निराश व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान लाना, पौधा लगाना और किसी बेजुबान जीव को भय से बचाना भी उत्सव का हिस्सा है।

बच्चे उपदेशों से अधिक अपने परिवार और समाज के व्यवहार से सीखते हैं। इसलिए बड़ों को अपने आचरण से यह उदाहरण प्रस्तुत करना होगा कि दूसरों की खुशी, स्वास्थ्य और प्रकृति का सम्मान करना भी अच्छे संस्कारों का हिस्सा है।

दीपावली का प्रकाश हमारे व्यवहार में भी दिखना चाहिए

लेखक के अनुसार, दीपावली का वास्तविक उत्सव केवल आसमान को धमाकों से गूंजाने में नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में प्रकाश, प्रेम, शांति और खुशहाली लाने में है। ऐसी दीपावली होनी चाहिए, जिसमें किसी बच्चे की नींद न टूटे, किसी मरीज की परेशानी न बढ़े, किसी बुजुर्ग को भय का सामना न करना पड़े और किसी बेजुबान जीव को अनावश्यक पीड़ा न पहुंचे।

एक दीया प्रकाश का, एक पौधा भविष्य का और एक संकल्प मानवता के नाम

अंत में हुलेश्वर प्रसाद जोशी ने संदेश दिया कि इस दीपावली एक दीया अपने घर में जलाएं, एक दीया किसी जरूरतमंद के जीवन में खुशियों का जलाएं और एक फलदार पेड़ धरती के नाम लगाएं। पटाखों की आवाज कुछ क्षणों में समाप्त हो जाती है, लेकिन एक पेड़ की छाया, उसके फल और उससे मिलने वाला पर्यावरण वर्षों तक मानवता के काम आता है।

दीपावली का संदेश धमाकों से नहीं, प्रकाश से दीजिए। प्रदूषण से नहीं, प्रकृति से प्रेम कीजिए और अपने उत्सव को केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समूची सृष्टि के लिए आनंदमय बनाइए।

— हुलेश्वर प्रसाद जोशी, लेखक, विचारक, दार्शनिक एवं पुलिस अधिकारी

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