ड्यूटी का दबाव, छुट्टियों की कमी, पारिवारिक चिंता और मानसिक तनाव को बताया संभावित कारण; सरकार से जवानों की समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान देने की अपील
नई दिल्ली। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में जवानों के बीच बढ़ती आत्महत्या और आपसी गोलीबारी की घटनाओं को लेकर अलायंस ऑफ ऑल एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस वेलफेयर एसोसिएशन ने चिंता जताई है। एसोसिएशन के महासचिव रणबीर सिंह ने दावा किया कि लंबे समय से ड्यूटी का दबाव, पर्याप्त आराम और छुट्टी का अभाव, परिवार से दूरी तथा मानसिक तनाव जैसी परिस्थितियां जवानों के सामने गंभीर चुनौती बन रही हैं।
आत्महत्या और आपसी गोलीबारी के आंकड़ों का किया उल्लेख
महासचिव रणबीर सिंह के अनुसार, वर्ष 2018 से 2022 के बीच आपसी गोलीबारी की घटनाओं में 29 जवानों की जान गई, जबकि इसी अवधि में 654 जवानों ने आत्महत्या की। उन्होंने वर्ष 2023 से 2025 के बीच भी केंद्रीय बलों में आपसी गोलीबारी के कई मामलों का उल्लेख किया। उनके मुताबिक इस अवधि में सीआरपीएफ में 15, बीएसएफ में 9 और सीआईएसएफ में 2 मामले सामने आए।
उन्होंने 29 सितंबर 2026 को जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में हाईडल प्रोजेक्ट में तैनात एक हेड कांस्टेबल द्वारा कथित तौर पर अपने साथियों पर गोली चलाने की घटना का भी जिक्र किया, जिसमें कमान अधिकारी समेत चार जवानों की मौत होने की बात कही गई है।
काम का दबाव और परिवार से दूरी भी बड़ी चुनौती
रणबीर सिंह ने कहा कि अर्धसैनिक बलों के जवानों की कार्य परिस्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण हैं। लंबे समय तक ड्यूटी, पर्याप्त नींद नहीं मिलना, समय पर छुट्टी न मिलना और घर-परिवार से सैकड़ों-हजारों किलोमीटर दूर रहना उनके मुताबिक तनाव बढ़ाने वाले कारक हो सकते हैं।
उन्होंने जवानों की कमी, पदोन्नति में देरी, मनचाही पोस्टिंग नहीं मिलना और कुछ मामलों में वरिष्ठ अधिकारियों के व्यवहार को लेकर असंतोष जैसी समस्याओं का भी उल्लेख किया। एसोसिएशन का कहना है कि लंबे समय तक पदोन्नति का इंतजार करने वाले कर्मचारियों में भी निराशा की स्थिति पैदा हो सकती है।
मोबाइल के जरिए घर की समस्याओं की जानकारी भी बढ़ाती है चिंता
एसोसिएशन के मुताबिक, डिजिटल दौर में मोबाइल फोन के माध्यम से जवानों को घर-परिवार की हर छोटी-बड़ी समस्या की जानकारी तुरंत मिल जाती है। बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्ग माता-पिता की बीमारी, जमीन-जायदाद से जुड़े विवाद या परिवार की सुरक्षा जैसी चिंताएं ड्यूटी के दौरान जवानों पर मानसिक दबाव बढ़ा सकती हैं।
रणबीर सिंह का कहना है कि जब जवान स्वयं इन समस्याओं के बीच मौजूद नहीं रह पाता तो उसे अकेलेपन, असहायता और मानसिक थकान का सामना करना पड़ सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर भी उठाए सवाल
एसोसिएशन ने केंद्रीय बलों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी व्यवस्थाओं को लेकर भी सवाल उठाए हैं। रणबीर सिंह के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता और काउंसलिंग के लिए योजनाएं बनाई जाती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनका प्रभावी क्रियान्वयन जरूरी है।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि पर्याप्त संख्या में मनोचिकित्सक और प्रशिक्षित विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हैं तो जवानों की मानसिक स्वास्थ्य जांच और काउंसलिंग किस प्रकार प्रभावी ढंग से की जाएगी। उन्होंने 24 घंटे उपलब्ध काउंसलिंग हेल्पलाइन के बारे में भी जवानों को पर्याप्त जानकारी नहीं होने का दावा किया।
वरिष्ठ अधिकारियों के साथ संवाद को बताया जरूरी
एसोसिएशन का कहना है कि जवानों की समस्याओं को समझने के लिए केवल औपचारिक बैठकों और लेक्चर से काम नहीं चलेगा। इसके लिए अधिकारियों और जवानों के बीच नियमित एवं सहज संवाद की जरूरत है।
रणबीर सिंह ने कहा कि जवानों को अपनी समस्याएं खुलकर रखने का अवसर मिलना चाहिए, ताकि तनाव और विवाद की स्थिति गंभीर होने से पहले ही उसका समाधान किया जा सके।
सीआरपीएफ के कोर ग्रुप में निचले रैंक और सेवानिवृत्त कर्मियों को शामिल करने की मांग
रणबीर सिंह के अनुसार, अगस्त 2026 में सीआरपीएफ महानिदेशक की ओर से बल में आत्महत्या और आपसी गोलीबारी की घटनाओं की रोकथाम के लिए एक कोर ग्रुप गठित किया गया है। इसमें वरिष्ठ स्तर के स्पेशल डीजी, आईजी और डीआईजी रैंक के अधिकारियों को शामिल किए जाने की जानकारी उन्होंने दी।
एसोसिएशन का सुझाव है कि ऐसे समूह में सिपाही, हवलदार, उपनिरीक्षक और सहायक कमांडेंट स्तर के वर्तमान कर्मियों के साथ-साथ सेवानिवृत्त जवानों को भी शामिल किया जाना चाहिए, क्योंकि वे जमीनी स्तर की समस्याओं और सेवा के व्यावहारिक अनुभव से जुड़े सुझाव दे सकते हैं।
लगातार अतिरिक्त ड्यूटी का भी उठाया मुद्दा
एसोसिएशन ने कहा कि चुनाव ड्यूटी, धार्मिक यात्राओं, राजनीतिक रैलियों, कानून-व्यवस्था की स्थिति और बाढ़-भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान केंद्रीय बलों के जवानों की तैनाती बढ़ जाती है। संगठन का कहना है कि लगातार बदलती तैनाती और लंबे समय तक ड्यूटी के कारण जवानों के आराम और पारिवारिक जीवन पर भी असर पड़ता है।
नौकरी छोड़ने के आंकड़ों का भी किया उल्लेख
रणबीर सिंह ने दावा किया कि वर्ष 2018 से 2023 के बीच करीब 50,155 अर्धसैनिक बलों के जवानों ने नौकरी छोड़ी। उन्होंने कहा कि पिछले कई वर्षों से समय से पहले सेवा छोड़ने की प्रवृत्ति को भी गंभीरता से समझने की आवश्यकता है।
एसोसिएशन ने बिना पेंशन, समयबद्ध पदोन्नति और सेवा से जुड़ी अन्य समस्याओं को भी जवानों के कल्याण से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे बताया है।
सरकार से जवानों की समस्याओं पर संवाद की अपील
अलायंस ऑफ ऑल एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस वेलफेयर एसोसिएशन ने केंद्र सरकार और संबंधित मंत्रालय से केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के जवानों की समस्याओं पर गंभीरता से विचार करने की मांग की है। एसोसिएशन का कहना है कि आत्महत्या और आपसी गोलीबारी जैसी घटनाओं को रोकने के लिए केवल घटना के बाद कार्रवाई करने के बजाय ड्यूटी की परिस्थितियों, मानसिक स्वास्थ्य, छुट्टी, पदोन्नति, पारिवारिक समस्याओं और कर्मचारियों की कमी जैसे मूल मुद्दों पर भी ध्यान देना जरूरी है।
