गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत से हरिभूमि और आईएनएनएच के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने की खास बातचीत
रायपुर। गांधी जयंती के अवसर पर महात्मा गांधी के विचारों और वर्तमान समय में उनकी प्रासंगिकता को लेकर गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत ने विस्तृत बातचीत की। हरिभूमि और आईएनएनएच के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी के साथ हुए इस संवाद में गांधी के विचार, उनके राजनीतिक-सामाजिक दृष्टिकोण, जिन्ना और आंबेडकर के साथ उनके संबंधों को लेकर बनी धारणाओं, परिवार के संदर्भ में उनकी भूमिका और असहयोग आंदोलन जैसे विषयों पर चर्चा हुई।
कुमार प्रशांत ने कहा कि गांधी जयंती पर महात्मा गांधी को केवल याद करने से समस्याओं का समाधान नहीं होगा। अगर उनके विचारों को आज के समय में उपयोगी बनाना है तो उनके बताए रास्ते पर चलना भी जरूरी है।
इतिहास का हिस्सा नहीं, आज के सवालों में मौजूद हैं गांधी
कुमार प्रशांत के अनुसार गांधी को केवल इतिहास के एक व्यक्ति के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि 157 साल पहले जन्मे किसी व्यक्ति के शारीरिक रूप से आज मौजूद होने की कल्पना नहीं की जा सकती, लेकिन गांधी के विचार आज भी नए संदर्भों में सामने आते हैं।
उन्होंने कहा कि 30 जनवरी 1948 को गोली एक व्यक्ति को लगी थी, लेकिन उसके बाद गांधी का विचार समाप्त नहीं हुआ। इसके उलट गांधी की विचार-यात्रा नए रूप में आगे बढ़ती रही।
उनके मुताबिक गांधी विचार, कर्म, इतिहास और वर्तमान—इन सभी स्तरों पर आज भी मौजूद हैं। जो लोग वर्तमान को लेकर चिंतित हैं और समाज को बेहतर बनाने के बारे में सोचते हैं, उनके बीच गांधी के विचार किसी न किसी रूप में दिखाई देते हैं।
गांधी को किसी एक वर्ग तक सीमित करना सही नहीं
गांधी पर मुस्लिम तुष्टिकरण या किसी विशेष वर्ग को अधिक महत्व देने जैसे आरोपों पर पूछे गए सवाल के जवाब में कुमार प्रशांत ने कहा कि अक्सर समाज किसी बड़े व्यक्तित्व को अपनी सुविधानुसार एक सीमित दायरे में देखने की कोशिश करता है।
उन्होंने जिन्ना के साथ गांधी की बातचीत का उल्लेख करते हुए कहा कि विभाजन से पहले दोनों के बीच हुई बातचीत में जिन्ना ने गांधी से कहा था कि यदि वह हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करें तो बातचीत का रास्ता आसान हो सकता है। गांधी ने इस विचार को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि उनका मानना था कि वह किसी एक समुदाय के प्रतिनिधि नहीं हैं।
कुमार प्रशांत ने कहा कि गांधी का यह दृष्टिकोण उनके जीवन मूल्यों से जुड़ा था। उनका मानना था कि गांधी ने विभिन्न समुदायों के बीच काम करने और सेवा करने के आधार पर लोगों के बीच संवाद का अधिकार अर्जित किया था।
परिवार और राष्ट्र के बीच गांधी की भूमिका पर भी चर्चा
महात्मा गांधी के अपने परिवार, विशेषकर पिता के रूप में उनकी भूमिका को लेकर पूछे गए सवाल पर कुमार प्रशांत ने कहा कि एक व्यक्ति जब केवल अपने बच्चे का पिता होता है तो उसकी जिम्मेदारियां अलग होती हैं, लेकिन जब वही व्यक्ति लाखों लोगों के लिए ‘बापू’ बन जाता है तो उसकी प्राथमिकताएं भी व्यापक हो जाती हैं।
उन्होंने माना कि अपने बच्चों के संदर्भ में गांधी कई स्तरों पर विफल रहे होंगे। उनके अनुसार गांधी के सामने केवल अपने परिवार की आकांक्षाएं नहीं थीं, बल्कि वे स्वयं को समाज के व्यापक दायित्व से जोड़कर देखते थे।
चौरी-चौरा के बाद आंदोलन वापस लेने पर क्या कहा?
असहयोग आंदोलन के दौरान चौरी-चौरा की घटना के बाद आंदोलन वापस लेने के गांधी के फैसले को लेकर भी बातचीत हुई। इस पर कुमार प्रशांत ने कहा कि यह सवाल आज भी उठाया जाता है कि अगर आंदोलन वापस नहीं लिया जाता तो देश शायद पहले आजाद हो जाता।
उन्होंने कहा कि गांधी के लिए आजादी हासिल करने का रास्ता भी उतना ही महत्वपूर्ण था जितना आजादी का लक्ष्य। उनके अनुसार गांधी जिस तरीके से स्वतंत्रता हासिल करना चाहते थे, उसकी अपनी एक नैतिक कीमत थी।
कुमार प्रशांत ने कहा कि गांधी शायद उस रास्ते से देश को पूरी तरह अपनी मंजिल तक न ले जा पाए हों, लेकिन इसी दृष्टिकोण ने गांधी की पहचान को अलग बनाया।
दुनिया में बढ़ रही असहमति में देखते हैं उम्मीद
भविष्य को लेकर कुमार प्रशांत ने सकारात्मक उम्मीद जताई। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई देशों में लोग सत्ता और शासन के फैसलों के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं। उनके अनुसार यह बताता है कि आम लोग अपनी बात रखने और सत्ता से सवाल पूछने की जरूरत महसूस कर रहे हैं।
उन्होंने इसे गांधी के विचारों से जोड़ते हुए कहा कि गांधी भी लोगों को अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज उठाने और असहमति व्यक्त करने का रास्ता दिखाते थे।
कुमार प्रशांत ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद गांधी के सामने भी यही सवाल था कि अब संघर्ष किस तरह होगा। उनका मानना था कि आजादी के बाद भी सत्याग्रह, धरना और शांतिपूर्ण जनआंदोलन जैसे लोकतांत्रिक माध्यम जनता के पास मौजूद रहने चाहिए।
गांधी जयंती के अवसर पर हुए इस संवाद में गांधी के विचारों को केवल स्मृति तक सीमित रखने के बजाय उन्हें वर्तमान सामाजिक और लोकतांत्रिक जीवन से जोड़कर देखने पर जोर दिया गया।
