एक राष्ट्र, एक शिक्षा की टीस: क्या सत्ताओं की प्राथमिकता में है देश का भविष्य?

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तिरंगे से लेकर शिक्षा तक—राष्ट्रीय एकता, वैचारिक बहस और समान अवसरों के सवालों के बीच उठता बड़ा प्रश्न

प्रस्तावना: साझा पहचान से समान अवसर तक

राष्ट्र केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं बनता। उसकी पहचान साझा इतिहास, संवैधानिक मूल्यों, लोकतांत्रिक संस्थाओं और उन प्रतीकों से भी निर्मित होती है, जिनमें करोड़ों नागरिक अपनी सामूहिक पहचान देखते हैं। भारत का तिरंगा ऐसा ही एक राष्ट्रीय प्रतीक है, जो स्वतंत्रता संग्राम, लोकतंत्र और विविधता की भावना का प्रतिनिधित्व करता है।

इसी व्यापक संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और तिरंगे को लेकर अतीत में हुई बहसें भी भारतीय सार्वजनिक जीवन का हिस्सा रही हैं। नागपुर स्थित संघ मुख्यालय पर लंबे समय तक राष्ट्रीय ध्वज फहराए जाने को लेकर विवाद और उसके पीछे दिए गए तर्कों ने संगठन की वैचारिक दृष्टि तथा भारतीय गणराज्य की संवैधानिक पहचान को लेकर चर्चा को जन्म दिया।

लेकिन आज एक अलग सवाल भी उतनी ही गंभीरता से सामने है—यदि हम ‘एक राष्ट्र’ की अवधारणा को मजबूत करना चाहते हैं, तो क्या देश के हर बच्चे के लिए गुणवत्तापूर्ण और समान अवसर वाली शिक्षा व्यवस्था को भी राष्ट्रीय प्राथमिकता नहीं बनाया जाना चाहिए?

‘वन नेशन, वन एजुकेशन’ की जरूरत क्यों महसूस होती है?

‘वन नेशन, वन टैक्स’ और ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ जैसी अवधारणाओं पर देश में व्यापक राजनीतिक चर्चा होती रही है। ऐसे में शिक्षा को लेकर भी यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या भारत में ऐसा न्यूनतम राष्ट्रीय शिक्षा मानक नहीं होना चाहिए, जिसके तहत हर बच्चे को समान गुणवत्ता, बेहतर शिक्षक और आवश्यक बुनियादी सुविधाएं मिल सकें?

यहां ‘एक राष्ट्र, एक शिक्षा’ का अर्थ भाषाई या सांस्कृतिक विविधता समाप्त करना नहीं होना चाहिए। भारत की ताकत उसकी विविधता में है। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जिसमें राज्यों की भाषाई और सांस्कृतिक विशेषताओं का सम्मान करते हुए शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षक उपलब्धता, बुनियादी सुविधाओं और सीखने के स्तर के लिए समान राष्ट्रीय मानक सुनिश्चित किए जा सकें।

नीति की चुनौती: शिक्षा समवर्ती सूची का विषय

भारत में शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है। इसका अर्थ है कि शिक्षा से जुड़े मामलों में केंद्र और राज्यों दोनों की भूमिका है। देश की भौगोलिक, भाषाई और सामाजिक विविधता को देखते हुए यह व्यवस्था अपने आप में महत्वपूर्ण है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षा व्यवस्था में कई व्यापक सुधारों की दिशा निर्धारित की है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा और अन्य पहलों के माध्यम से देश में शिक्षा के स्तर को बेहतर बनाने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि, राज्यों की अलग-अलग परिस्थितियों, संसाधनों और नीतिगत प्राथमिकताओं के कारण पूरे देश में शिक्षा का स्तर एक जैसा बनाना अभी भी बड़ी चुनौती है।

घोषणाओं से आगे बढ़कर बजट में दिखे शिक्षा की प्राथमिकता

शिक्षा को लेकर राजनीतिक घोषणाएं लंबे समय से होती रही हैं, लेकिन वास्तविक बदलाव के लिए पर्याप्त और निरंतर निवेश जरूरी है।

कोठारी आयोग की सिफारिशों से लेकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति तक शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया जाता रहा है। लंबे समय से सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का करीब 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने का लक्ष्य चर्चा में रहा है, लेकिन वास्तविक सार्वजनिक व्यय इससे कम रहा है।

शिक्षा में निवेश का परिणाम तत्काल चुनावी लाभ के रूप में दिखाई नहीं देता। स्कूलों का निर्माण, प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति और बच्चों की सीखने की क्षमता में सुधार ऐसे काम हैं, जिनका वास्तविक प्रभाव वर्षों बाद दिखाई देता है। यही कारण है कि शिक्षा को तत्काल राजनीतिक लाभ से आगे दीर्घकालिक राष्ट्रीय निवेश के रूप में देखने की आवश्यकता है।

सरकारी स्कूलों की स्थिति क्यों चिंता का विषय है?

सरकारी विद्यालय देश के गरीब, ग्रामीण और वंचित तबकों के बच्चों के लिए शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं। ऐसे में सरकारी स्कूलों में नामांकन, शिक्षक उपलब्धता और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े आंकड़े गंभीर आत्ममंथन की मांग करते हैं।

देश के कई हिस्सों में एकल-शिक्षक विद्यालयों की मौजूदगी बताती है कि शिक्षकों की उपलब्धता अब भी बड़ी चुनौती है। एक शिक्षक पर कई कक्षाओं की जिम्मेदारी होने से बच्चों को व्यक्तिगत शैक्षणिक सहायता देना कठिन हो जाता है।

इसी तरह अनेक राज्यों में शिक्षक पद रिक्त हैं। इससे विद्यालयों की नियमित शैक्षणिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं और शिक्षकों पर अतिरिक्त भार पड़ता है।

स्कूल हैं, लेकिन आगे की पढ़ाई का रास्ता कितना मजबूत?

देश में प्राथमिक स्तर पर विद्यालयों की संख्या बड़ी है, लेकिन जैसे-जैसे बच्चे उच्च कक्षाओं की ओर बढ़ते हैं, विद्यालयों की उपलब्धता कम होती जाती है। ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में यह समस्या और गंभीर हो सकती है।

विद्यालयों के विलय या समेकन का उद्देश्य संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है, लेकिन यदि इससे बच्चों को स्कूल तक पहुंचने के लिए अधिक दूरी तय करनी पड़े, तो विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों की बालिकाओं और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों पर इसका प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका रहती है।

डिजिटल युग में इंटरनेट और प्रयोगशालाओं की कमी

आज शिक्षा केवल किताब और ब्लैकबोर्ड तक सीमित नहीं है। विज्ञान प्रयोगशालाएं, कंप्यूटर, इंटरनेट और डिजिटल संसाधन आधुनिक शिक्षा के महत्वपूर्ण हिस्से बन चुके हैं।

इसके बावजूद कई सरकारी विद्यालयों में विज्ञान प्रयोगशाला और इंटरनेट जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी बनी हुई है। ऐसे में डिजिटल और तकनीकी शिक्षा की बात तभी सार्थक होगी, जब देश के दूरदराज के स्कूलों तक भी आवश्यक संसाधन पहुंचेंगे।

नामांकन से ज्यादा महत्वपूर्ण है सीखने का स्तर

किसी बच्चे का स्कूल में दाखिला होना शिक्षा की सफलता का अंतिम पैमाना नहीं है। असली सवाल यह है कि बच्चा स्कूल से क्या सीख रहा है।

यदि आठवीं कक्षा का विद्यार्थी अपेक्षित स्तर का पाठ नहीं पढ़ पाता या बुनियादी गणितीय सवाल हल करने में कठिनाई महसूस करता है, तो यह केवल उस बच्चे की समस्या नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था के लिए चेतावनी है।

स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या भी चिंता का विषय है। प्राथमिक स्तर से उच्च माध्यमिक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते नामांकन में कमी यह संकेत देती है कि माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा तक बच्चों को बनाए रखने के लिए अधिक प्रभावी रणनीति की जरूरत है।

शिक्षा में असमानता, सामाजिक न्याय के लिए बड़ी चुनौती

भारत में निजी और सरकारी शिक्षा संस्थानों के बीच सुविधाओं और संसाधनों का अंतर लंबे समय से बहस का विषय रहा है। आर्थिक रूप से सक्षम परिवार बेहतर संसाधनों वाले स्कूलों का विकल्प चुन सकते हैं, जबकि गरीब परिवारों के बच्चे अक्सर सरकारी व्यवस्था पर निर्भर रहते हैं।

यहीं से शिक्षा और सामाजिक न्याय का संबंध सामने आता है। यदि बच्चे के परिवार की आर्थिक स्थिति ही उसकी शिक्षा की गुणवत्ता तय करने लगे, तो समान अवसर की संवैधानिक भावना कमजोर पड़ती है।

‘एक शिक्षा’ का मतलब एक जैसा भारत बनाना नहीं

‘वन नेशन, वन एजुकेशन’ की चर्चा में यह स्पष्ट करना जरूरी है कि समान शिक्षा का अर्थ देश की भाषाओं, लोक परंपराओं और क्षेत्रीय इतिहास को खत्म करना नहीं है।

राष्ट्रीय स्तर पर समान गुणवत्ता मानक हो सकते हैं, जबकि स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक संदर्भों को पाठ्यक्रम में उचित स्थान दिया जा सकता है। एक मजबूत शिक्षा व्यवस्था वह होगी, जो बच्चे को स्थानीय जड़ों से जोड़ते हुए राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर की प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करे।

सवाल सरकार से नहीं, पूरे समाज से भी

शिक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। शिक्षक, अभिभावक, समाज, स्थानीय प्रशासन और नागरिक संस्थाएं भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन सरकार की भूमिका सबसे बड़ी इसलिए है क्योंकि विद्यालयों की आधारभूत संरचना, शिक्षक नियुक्ति, पाठ्यक्रम, वित्तीय संसाधन और नीतिगत दिशा बड़े पैमाने पर सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी होती है।

इसलिए शिक्षा को चुनावी घोषणाओं से आगे ले जाकर दीर्घकालिक राष्ट्रीय मिशन बनाना होगा।

निष्कर्ष: देश का भविष्य कक्षाओं में तैयार होता है

भारत यदि ज्ञान, विज्ञान और नवाचार के क्षेत्र में विश्व की अग्रणी शक्तियों में शामिल होना चाहता है, तो शिक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के केंद्र में रखना होगा।

‘एक राष्ट्र, एक शिक्षा’ का सार एकरूपता नहीं, बल्कि समान अवसर, समान गुणवत्ता और न्यूनतम राष्ट्रीय मानकों में खोजा जाना चाहिए।

देश का कोई बच्चा केवल इसलिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित न रहे क्योंकि वह किसी गरीब परिवार, छोटे गांव

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