अभिषेक कुमार पाण्डेय
रिपोर्टर, बिलासपुर छत्तीसगढ़
कभी प्रसव के बाद जच्चा की देखभाल और सामुदायिक मेल-जोल का हिस्सा थी यह पारंपरिक परंपरा, अब नई पीढ़ी के लिए बनती जा रही अनजान विरासत
रायपुर। छत्तीसगढ़ की पहचान सिर्फ तीज-त्योहारों, लोकगीतों और बड़े सांस्कृतिक आयोजनों तक सीमित नहीं है। प्रदेश की असली सांस्कृतिक विरासत गांवों और घरों में पीढ़ियों से चली आ रही उन छोटी-छोटी परंपराओं में भी रही है, जिनमें स्वाद के साथ सामाजिक जुड़ाव और पारिवारिक अपनापन भी शामिल था। ऐसी ही एक परंपरा थी ‘कांकी पानी’, जो अब कई इलाकों में धीरे-धीरे चलन से बाहर होती दिखाई दे रही है।
कभी बच्चे के जन्म के बाद होने वाले छट्ठी जैसे अवसरों पर इसे विशेष रूप से तैयार किया जाता था। यह सिर्फ एक पारंपरिक पेय नहीं, बल्कि जच्चा की देखभाल और मेहमानों के स्वागत से जुड़ी स्थानीय परंपरा का हिस्सा माना जाता था।
जब घर की खुशी पूरे गांव की खुशी होती थी
पुराने ग्रामीण जीवन में परिवार में बच्चे के जन्म को केवल घर की खुशी नहीं माना जाता था। छट्ठी जैसे अवसरों पर रिश्तेदारों के साथ आसपास के लोग भी शामिल होते थे। पारंपरिक रूप से नाऊ-नवाइन के माध्यम से निमंत्रण पहुंचाने की परंपरा का भी उल्लेख बुजुर्गों की यादों में मिलता है।
ऐसे आयोजनों में पुरुष और महिलाएं अलग-अलग समूहों में बैठकर आपसी सुख-दुख साझा करते थे। महिलाओं के बीच जच्चा और नवजात के स्वास्थ्य को लेकर घरेलू अनुभव और पारंपरिक ज्ञान भी साझा किया जाता था।
इसी सामाजिक माहौल में कांकी पानी जैसे पारंपरिक पेय और प्रसव के बाद दिए जाने वाले स्थानीय खाद्य पदार्थों की भूमिका होती थी।
कांकी पानी में क्या होता था?
स्थानीय परंपरा के अनुसार कांके नामक जड़ी-बूटी को पानी में उबालकर काढ़ा तैयार किया जाता था। इसके बाद इसमें गुड़, जीरा, नारियल का बूच और घी जैसी सामग्री मिलाने की परंपरा बताई जाती है।
हालांकि, इसके औषधीय प्रभावों को लेकर आधुनिक चिकित्सा मानकों के अनुसार वैज्ञानिक प्रमाण अलग से जरूरी हैं। इसलिए इसे किसी बीमारी या प्रसवोत्तर समस्या का प्रमाणित उपचार मानने के बजाय पारंपरिक घरेलू खाद्य-पेय परंपरा के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
छिवारी लड्डू भी था इस परंपरा का हिस्सा
कांकी पानी के साथ ‘छिवारी लड्डू’, जिसे कई जगह जचकी के लड्डू के नाम से भी जाना जाता है, दिए जाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। प्रसव के बाद महिलाओं को पौष्टिक भोजन देने की ग्रामीण परंपरा में ऐसे खाद्य पदार्थों की अपनी जगह थी।
आज भी कुछ पुराने बाजारों और स्थानीय महिला समूहों के माध्यम से ऐसे पारंपरिक खाद्य पदार्थों की मौजूदगी दिखाई देती है। लेकिन घर पर इन्हें तैयार करने और सामूहिक रूप से परोसने की परंपरा पहले की तुलना में कम होती जा रही है।
थाली से पैकेट तक बदल गया खान-पान
बदलती जीवनशैली ने पारंपरिक आयोजनों का स्वरूप भी बदला है। संयुक्त परिवारों की जगह छोटे परिवार, गांव से शहरों की ओर बढ़ता पलायन और बाजार में आसानी से उपलब्ध तैयार खाद्य-पेय ने कई घरेलू परंपराओं को प्रभावित किया है।
छट्ठी और दूसरे पारिवारिक आयोजनों में भी अब पारंपरिक व्यंजनों के साथ चाय, पैकेज्ड ड्रिंक और बाजार से खरीदी गई चीजें ज्यादा आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं।
इस बदलाव को केवल परंपरा के खत्म होने के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। बदलती जीवनशैली ने जहां सुविधा बढ़ाई है, वहीं कई मौखिक और घरेलू परंपराओं के दस्तावेजीकरण की जरूरत भी सामने रखी है।
क्या नई पीढ़ी तक पहुंचेगी यह विरासत?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आने वाली पीढ़ी अपने परिवार और गांव की ऐसी परंपराओं के बारे में कितना जान पाएगी।
कांकी पानी जैसी परंपराओं में सिर्फ एक पेय का स्वाद नहीं, बल्कि सामुदायिक जीवन, आपसी सहभागिता और पीढ़ियों से चले आ रहे स्थानीय ज्ञान की कहानी भी छिपी है।
जरूरत इस बात की है कि ऐसी परंपराओं को अंधविश्वास या केवल पुरानी चीज मानकर भुलाने के बजाय उनके इतिहास और सांस्कृतिक महत्व को दर्ज किया जाए। साथ ही, स्वास्थ्य से जुड़े किसी भी पारंपरिक नुस्खे को अपनाने से पहले उसके वैज्ञानिक और चिकित्सकीय पहलुओं को भी समझा जाए।
आपकी यादों में आज भी जिंदा है कांकी पानी?
क्या आपके गांव या परिवार में बच्चे के जन्म के बाद आज भी कांकी पानी बनाया जाता है? क्या आपने बचपन में कांकी पानी या छिवारी लड्डू की यह परंपरा देखी है?
आपके गांव की ऐसी कौन-सी पुरानी परंपरा है, जो आज धीरे-धीरे गायब हो रही है? अपनी यादें और अनुभव साझा कीजिए। हो सकता है, आपकी एक छोटी-सी याद छत्तीसगढ़ की बड़ी सांस्कृतिक विरासत को बचाने में मदद कर दे।




