अभिषेक कुमार पाण्डेय
रिपोर्टर, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
स्थानांतरण आदेश के बावजूद पुरानी जगह पर कार्यरत रहने के आरोप, शिकायतकर्ताओं ने प्रशासनिक कार्रवाई पर उठाए सवाल
बिलासपुर। सरकारी कर्मचारी के स्थानांतरण आदेश के बाद नई पदस्थापना पर कार्यभार ग्रहण करने को लेकर बिलासपुर में एक मामला अब प्रशासनिक व्यवस्था और विभागीय निगरानी पर सवाल खड़े कर रहा है। आरोप है कि एक व्याख्याता स्थानांतरण आदेश जारी होने के बावजूद करीब छह वर्षों से पुरानी पदस्थापना पर ही बने हुए हैं। इस मामले को लेकर शिकायतकर्ताओं ने जिला प्रशासन से लेकर शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।

छह साल बाद भी स्थानांतरण आदेश के पालन पर सवाल
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि संबंधित व्याख्याता का स्थानांतरण घुटकु स्थित नई शाला के लिए किया गया था, लेकिन कथित तौर पर उन्होंने वहां कार्यभार ग्रहण नहीं किया। उनका सवाल है कि यदि स्थानांतरण आदेश प्रभावी था और उसे न्यायालय से कोई स्थगन प्राप्त नहीं था, तो इतने लंबे समय तक आदेश का पालन क्यों नहीं कराया गया।
मामले में जिला स्तर पर शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। शिकायतकर्ताओं ने पूछा है कि नियमित विभागीय समीक्षा और प्रशासनिक बैठकों के बावजूद यह मामला अधिकारियों के संज्ञान में आने के बाद भी लंबित क्यों रहा।
कलेक्टर और शिक्षा विभाग की भूमिका पर उठे सवाल
शिकायतकर्ताओं ने जिला प्रशासन से यह स्पष्ट करने की मांग की है कि स्थानांतरण आदेश के पालन की जिम्मेदारी तय होने के बावजूद छह साल तक स्थिति में बदलाव क्यों नहीं आया। उनका कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच कर यह पता लगाया जाना चाहिए कि आदेश के पालन में देरी के लिए कौन जिम्मेदार है।
वहीं शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और मंत्रालय स्तर पर भी मामले की जानकारी तथा अब तक हुई कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ताओं की मांग है कि यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो संबंधित अधिकारी-कर्मचारी की जिम्मेदारी निर्धारित कर विभागीय प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की जाए।
आखिर किसके दबाव में रुका मामला? उठ रही जांच की मांग
मामले को लेकर अब यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि क्या किसी प्रभावशाली व्यक्ति के दबाव के कारण स्थानांतरण आदेश का पालन नहीं कराया गया। हालांकि, किसी राजनीतिक व्यक्ति या मुख्यमंत्री सचिवालय से संरक्षण मिलने के संबंध में फिलहाल कोई ठोस तथ्य सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।
ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष जांच ही यह स्पष्ट कर सकती है कि छह वर्षों तक आदेश का पालन क्यों नहीं हुआ और इसके पीछे प्रशासनिक लापरवाही थी या किसी स्तर पर हस्तक्षेप।
सीएम हेल्पलाइन और शिकायत निवारण व्यवस्था की भी परीक्षा
शिकायतकर्ताओं ने इस मामले को मुख्यमंत्री की शिकायत निवारण व्यवस्था से जोड़ते हुए कहा है कि यदि लगातार शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होती है, तो इससे सरकारी शिकायत निवारण प्रणाली की प्रभावशीलता पर सवाल उठेंगे।
अब निगाह इस बात पर है कि जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग मामले में क्या कदम उठाते हैं। छह साल पुराने इस प्रकरण में दस्तावेजों, स्थानांतरण आदेश, कार्यभार ग्रहण की स्थिति और न्यायालयीन रिकॉर्ड की जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।


