लगातार बारिश: वरदान को आफत बनने से कौन रोकेगा?

Advertisement
Advertisement

बारिश प्रकृति का वरदान है। खेतों में हरियाली, जलाशयों में पानी, भूजल स्तर में सुधार और तपती धरती को राहत—इन सबके पीछे बारिश की महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन जब बारिश लगातार और जरूरत से अधिक होने लगे तथा हमारी व्यवस्थाएं उसकी रफ्तार के सामने कमजोर पड़ जाएं, तो यही वरदान देखते ही देखते आफत में बदल जाता है।

लगातार हो रही बारिश ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि क्या हम बारिश के लिए वास्तव में तैयार हैं?

किसान के लिए बारिश सौगात भी, संकट भी

किसानों के लिए पर्याप्त बारिश किसी सौगात से कम नहीं है। खासकर धान जैसी खरीफ फसलों के लिए पानी बेहद जरूरी है। तालाब, कुएं और जलाशय भरते हैं, भूजल रिचार्ज होता है और आने वाले गर्मी के मौसम में पानी की समस्या कुछ हद तक कम हो सकती है।

लेकिन यही बारिश जब लगातार होती है तो किसान की महीनों की मेहनत पर पानी फेरने का खतरा भी पैदा हो जाता है। खेतों में लंबे समय तक पानी जमा रहने से फसल खराब हो सकती है और पहले से आर्थिक दबाव झेल रहे किसानों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

शहरों में जलभराव आखिर क्यों?

बारिश के दौरान शहरों की सबसे बड़ी समस्या जलभराव बन जाती है। थोड़ी देर की तेज बारिश के बाद सड़कें तालाब में बदल जाती हैं, नालियां जाम हो जाती हैं और कई स्थानों पर पानी घरों एवं दुकानों में घुसने लगता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है। कच्ची सड़कें खराब होने, पुल-पुलियों के प्रभावित होने और संपर्क मार्गों पर पानी भरने से गांवों का मुख्य मार्गों से संपर्क तक बाधित हो सकता है।

सवाल यह है कि हर साल बारिश आने के बावजूद हम स्थायी जल निकासी व्यवस्था क्यों नहीं बना पा रहे हैं?

स्वास्थ्य व्यवस्था की भी परीक्षा

लगातार बारिश के बाद जगह-जगह पानी जमा होना केवल यातायात और आवागमन की समस्या नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन सकता है। जमा पानी मच्छरों के प्रजनन का कारण बनता है, जिससे डेंगू, मलेरिया जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

ऐसे समय में साफ-सफाई और स्वास्थ्य विभाग की सक्रियता केवल कागजी अभियान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। प्रभावित क्षेत्रों में नियमित निगरानी, सफाई और आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी है।

समस्या बारिश नहीं, हमारी तैयारी भी है

दरअसल, समस्या केवल बारिश की नहीं है। समस्या हमारी तैयारी और जल प्रबंधन की भी है।

शहरों में प्राकृतिक जल निकासी के रास्ते संकरे होते गए। तालाबों और जलस्रोतों की उपेक्षा हुई। नालियों की नियमित सफाई कई जगह गंभीर प्राथमिकता नहीं बन सकी। कई स्थानों पर पर्याप्त ड्रेनेज व्यवस्था के बिना निर्माण कार्य भी होते रहे।

नतीजा यह है कि बारिश का पानी जिस रास्ते से जलस्रोतों तक पहुंचना चाहिए, वह सड़क और बस्तियों की ओर बहने लगता है।

बारिश के पानी को संकट नहीं, संसाधन बनाएं

अब समय आ गया है कि बारिश को केवल आपदा के रूप में देखने के बजाय जल संरक्षण के अवसर के रूप में भी देखा जाए।

बारिश के अतिरिक्त पानी को तालाबों, जलाशयों और रिचार्ज सिस्टम तक पहुंचाने की व्यवस्था की जाए तो आज का यही अतिरिक्त पानी आने वाले समय में जीवनदायी साबित हो सकता है।

शहरों में वर्षाजल संचयन को बढ़ावा देना, पुराने जलस्रोतों को संरक्षित करना और प्राकृतिक नालों के रास्ते सुरक्षित रखना भविष्य की जरूरत है।

प्रशासन और नागरिक दोनों की जिम्मेदारी

प्रशासन को जलभराव वाले स्थानों की पहचान कर स्थायी समाधान की दिशा में काम करना होगा। नालियों और नालों की नियमित सफाई, कमजोर पुल-पुलियों की निगरानी और आपदा की स्थिति में त्वरित राहत व्यवस्था पहले से तैयार रखनी होगी।

वहीं नागरिकों की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। नालियों और जल निकासी के रास्तों में कचरा डालने से बचना होगा और बारिश के पानी के संरक्षण में प्रशासन का सहयोग करना होगा।

अगली बारिश से पहले तैयारी का सवाल

बारिश को हम नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन बारिश से होने वाले नुकसान को निश्चित रूप से कम कर सकते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हर बारिश के बाद केवल नुकसान का आंकड़ा गिनने के बजाय यह भी पूछा जाए कि अगली बारिश से पहले हमने क्या तैयारी की?

क्योंकि बारिश हर साल आएगी—कभी कम, कभी ज्यादा।

फैसला हमें करना है कि वह हमारे लिए वरदान बनेगी या हमारी अव्यवस्था का आईना।

— हरहर शम्भू चौधरी (एमजे)
मुख्य संपादक, सारांश दैनिक

Advertisement
Share This Article