‘जेन-जी’ शब्द के इस्तेमाल पर रघु ठाकुर ने जताई आपत्ति, बोले- विदेशी प्रभाव से तय हो रहा आंदोलनों का एजेंडा

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लोसपा के राष्ट्रीय संरक्षक ने कहा- जन आंदोलनों में हिंसा नहीं, लोकतांत्रिक और तार्किक विचार जरूरी

बिलासपुर। लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी (लोसपा) के संस्थापक एवं राष्ट्रीय संरक्षक तथा समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर ने मौजूदा दौर के जन आंदोलनों और उनके स्वरूप को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने ‘जेन-जी’ जैसे विदेशी शब्दों के बढ़ते इस्तेमाल पर आपत्ति जताते हुए कहा कि देश के सामाजिक और राजनीतिक विमर्श पर विदेशी प्रभाव तथा पूंजीवादी सोच का असर बढ़ रहा है।

‘आज के आंदोलन पूरी तरह स्वतःस्फूर्त नहीं’

बिलासपुर प्रेस क्लब में ‘जन आंदोलन : दशा और दिशा’ विषय पर पत्रकारों से चर्चा करते हुए ठाकुर ने कहा कि वर्तमान समय में होने वाले कई आंदोलन पूरी तरह स्वतःस्फूर्त नजर नहीं आते। उनके अनुसार आंदोलनों के मुद्दे और लक्ष्य सीमित होने के कारण उनका प्रभाव व्यवस्था में व्यापक बदलाव लाने तक नहीं पहुंच पाता। उन्होंने कहा कि गंभीर सामाजिक और आर्थिक विषयों के बजाय कई बार सतही मुद्दे आंदोलन का केंद्र बन जाते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि हाल के कुछ आंदोलनों ने सरकार को असहज जरूर किया है और नई पीढ़ी के युवाओं की भागीदारी भी बढ़ी है, लेकिन आंदोलन की दिशा और उद्देश्य को लेकर गंभीरता जरूरी है।

गाली-गलौज और हिंसा को बताया गलत

रघु ठाकुर ने दिल्ली में हुए एक आंदोलन के दौरान प्रधानमंत्री के खिलाफ कथित अभद्र भाषा, गाली-गलौज और तोड़फोड़ जैसी घटनाओं पर असहमति जताई। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक आंदोलन में असहमति व्यक्त करने का अधिकार है, लेकिन हिंसा और अमर्यादित भाषा किसी आंदोलन को मजबूत नहीं करती।

पूंजीवाद के बढ़ते प्रभाव पर चिंता

ठाकुर ने कहा कि दुनिया के विभिन्न देशों में नीतियों और राजनीतिक एजेंडे को प्रभावित करने में विदेशी शक्तियों की भूमिका पर सवाल उठते रहे हैं। फ्रांसिस फुकुयामा की पुस्तक ‘द एंड ऑफ हिस्ट्री’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि समाजवाद, समानता और बराबरी के विचारों को कमजोर कर पूंजीवाद को अंतिम विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश की गई।

उनके मुताबिक सामाजिक और आर्थिक असमानता जैसे वास्तविक मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय लोगों को धार्मिक एवं सांस्कृतिक विवादों में उलझाया जा रहा है।

सच्चे जन आंदोलन के लिए बताए पांच आधार

रघु ठाकुर ने कहा कि प्रभावी जन आंदोलन के लिए पांच बुनियादी बातें जरूरी हैं। उनके अनुसार आंदोलन जनता के बीच से स्वतःस्फूर्त रूप से खड़ा होना चाहिए और उसका संचालन जनता के संसाधनों से होना चाहिए। आंदोलन का उद्देश्य केवल तात्कालिक फायदा हासिल करना नहीं, बल्कि व्यापक व्यवस्था परिवर्तन होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आंदोलन में पथराव, तोड़फोड़ और गाली-गलौज जैसी हिंसक गतिविधियों की जगह नहीं होनी चाहिए। साथ ही आंदोलन की भाषा और अभिव्यक्ति तार्किक, संयमित और लोकतांत्रिक होनी चाहिए।

अन्ना आंदोलन और NEET को लेकर उठाए सवाल

ठाकुर ने वर्ष 2010-11 के अन्ना आंदोलन को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने इसे प्रायोजित आंदोलन बताते हुए कहा कि इसके बाद सरकारें बदलीं, लेकिन व्यवस्था में अपेक्षित बदलाव नहीं आया।

NEET पेपर लीक और विद्यार्थियों की समस्याओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जब कोटा में विद्यार्थियों की आत्महत्या की घटनाएं सामने आईं, उस समय बड़े नेताओं की सक्रियता दिखाई नहीं दी। उन्होंने सवाल उठाया कि कई महीने बाद सड़क पर उतरना वास्तविक जनहित का आंदोलन है या इसके पीछे कोई राजनीतिक उद्देश्य है।

महाराष्ट्र के भाषा विवाद पर केंद्र को घेरा

महाराष्ट्र में गैर-मराठी और हिंदी भाषियों के साथ कथित दुर्व्यवहार को लेकर भी ठाकुर ने चिंता जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत हिंदी को लेकर किए गए प्रावधानों का महाराष्ट्र में विरोध होने के बाद राज्य सरकार ने अपना फैसला वापस लिया, जबकि केंद्र सरकार ने इस पर अपेक्षित सख्ती नहीं दिखाई।

उन्होंने तमिलनाडु में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के विरोध और समग्र शिक्षा योजना के कथित वित्तीय आवंटन के मुद्दे की तुलना महाराष्ट्र से करते हुए केंद्र सरकार के रवैये पर सवाल उठाया। पुणे में हिंदी बोलने को लेकर कथित तौर पर प्रताड़ित किए गए एक छात्र की आत्महत्या का उल्लेख करते हुए उन्होंने इसे ‘नया भाषाई साम्राज्यवाद’ बताया।

प्रेसवार्ता में ये रहे मौजूद

प्रेस क्लब में आयोजित चर्चा के दौरान वरिष्ठ साहित्यकार रामकुमार तिवारी, जावेद उस्मानी सहित रघु ठाकुर के समर्थक मौजूद रहे।

अभिषेक कुमार पाण्डेय, रिपोर्टर छत्तीसगढ़

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